World Blood donation day- 14 June


World Blood Donor Day takes place on 14 June each year. The aim is to raise global awareness of the need for safe blood and blood products for transfusion and of the critical contribution voluntary, unpaid blood donors make to national health systems. The day also provides an opportunity to call to action to governments and national health authorities to provide adequate resources and put into place systems and infrastructures to increase the collection of blood from voluntary, non-remunerated blood donors.

अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा?- मीडिया ट्रायल (सुशांत सिंह राजपूत की पुण्यतिथि पर) – व्यंग

सुना है राम और रावण की राशि एक हीं थी,

पर कर्म अलग।

ऐसा हीं हाल है मीडिया का,

कुछ हैं पर्दाफ़ाश और कुछ सनसनीबाज़।

जनता है हैरान,

कैसे जाने कौन ईमानदार कौन चालबाज़ ?

किसकी खबरें सच मानें ?

किसकी बातें  बेमानी ?

कुछ मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक  जज बन

मिनटों में हत्या-आत्महत्या सुलझाते हैं।

शांत रहने,

सुशांत ना बनने की चेतावनी दे जाते हैं।

कम सुनाते है अपराध,

ड्रग्स, मर्डर, चाइल्ड ट्रैफ़िकिंग या फ़्लेश ट्रेडिंग की खबरें।

सर्वाधिक अख़बारों अौर खबरों वाले हमारे देश का यह हाल क्यों?

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ – मीडिया

टिका है कलम या कि तलवार पर?

शक्ति, धन या राजनेताअों पर?

चैनलों की टीआरपी या  रेटिंग पर?

गर  कलम खो देती है अपनी ताकत,

जागरुकता अौर सच्चाई ।

तब जाने अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा?

यहाँ तो कई शाख़ पर उल्लू बैठे हैं।

मौन

लफ़्ज़

लफ़्ज़ों के वजूद को समझो।

दिल में उतरने के लिए और

दिल से उतारने के लिए

कुछ बोले और अबोले लफ़्ज़

हीं काफ़ी हो

 

ज़िंदगी के रंग- 219

ज़िंदगी के समंदर में उठते तूफ़ानों के मंजर ने कहा ।

ना भागो, ना डरो हम से।

हम जल्द हीं गुजर जाएग़ें।

साथ लें जाएँगे कई मुखौटे।

तब तुम याद करोगी,

 हमने अपने झोकों से कितने नक़ाब हटाए।

कितने नक़ली अपनों औ असली अपनों से तुम्हें भेंट कराए।

 शांति अच्छी है ज़िंदगी की……

लेकिन वह नहीं दिखती जो

हम कुछ हीं पलों में दिखा अौर सीखा जातें है।

तुम्हें मज़बूत बना जातें हैं।

तुम्हारे जीवन से बहुत कुछ बुहाड़ कर साफ़ कर जातें हैं।

कुछ पलों की हमारी जिंदगानी, जीवन भर का सीख दे जाती हैं।

ना डरों हमसे, ना डरो तूफ़ानों से।

कन्यादान महादान – कई प्रश्न

कन्यादान के समय कहा जाने वाला मंत्र –
अद्येति………नामाहं………नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि – अचिर्तां, वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ……… नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पत्नीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे। वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहें- ॐ स्वस्ति।

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अद्येति नामाहं नाम्नीम् इमां कन्यां……तुभ्यं अहं सम्प्रददे।।

कन्या के हाथ वर के हाथों में सौंपनें के लिये,

ना जाने क्यों बनी यह परम्परा?

कन्या को दान क्यों करें?

जन्म… पालन-पोषण कर कन्या किसी और को क्यों दें ?

विवाह के बाद अपनी हीं क्यों ना रहे?

कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परम्परा से नहीं, पति परम्परा से चले? 

अगर पिता ना रहें ता माँ का कन्या दान का हक भी चला जाता है।

गर यह महादान है, तब मददगार

 ता-उम्र अपने एहसान तले क्यों हैं दबाते?

है किसी के पास इनका सही, अर्थपूर्ण व तार्किक जवाब?

जिंदगी के आईने में कई बेहद अपनों के कटु व्यवहार

की परछाईं ने बाध्य कर दिया प्रश्नों  के लिये?

वरना तो बने बनाये स्टीरियोटाइप जिंदगी

 जीते हीं रहते हैं हम सब।

Youth Broke Marriage After Engagement - सगाई के बाद युवक ने व्हाट्सअप पर  शादी तोडऩे का भेजा मैसेज | Patrika News

 

मोम

मेरे अस्तित्व का, मेरे वजूद का सम्मान करो।

हर बार किसी के बनाए साँचें में ढल जाऊँ,

यह तब मुमकिन है, जब रज़ा हो मेरी।

यह मैं हूँ , जलती और गलती हुई मोम नहीं।

दो चाँद

परसों पूर्णिमा की रात,

मानसून से पहले भटकते आ गए बादलों ने

चाँद को ले लिया आग़ोश में।

बादल बरसे, धुल गया गगन  

अौ रात आरसी हो गई ,

और धरा भी आईना।

अब दो चाँद थे,

एक ऊपर एक नीचे।

ज्यों हीं धरा का  चाँद छूने हाथ बढ़ाया,

पानी हिला अौ चाँद  खो गया।

ऐसे ही खो जाते हो तुम भी, हाथ बढ़ाते।

 

 

मीठी गुफ़्तगू

Logorrhoea / logorrhoea/ press speech is a communication disorder that causes excessive wordiness and repetitiveness, which can cause incoherency. Logorrhea is sometimes classified as a mental illness, though it is more commonly classified as a symptom of mental illness or brain injury.

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बेवजह, बेकार बातें क्यों सुननी?

बे-सबब बातें क्यों बढ़ानी?

ऐसा क्यों कि बातें कुछ हो, बयाँ कुछ अौर हो?

अच्छी बातों, सच्ची बातों की कमी है क्या?

मुख़्तसर सी बात…छोटी सी बात

बस इतनी है –

बतकही नहीं, चाहिए मीठी गुफ़्तगू ।

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लॉगोरिया / लॉगोरिया / बोलचाल की समस्या  है, जैसे  ज्यादा बोलना, बातें दोहराना । लॉगोरिया को कभी-कभी मानसिक बीमारी के रुप में भी देखा जाता है। यह मानसिक बीमारी, किसी दवा से या मस्तिष्क की चोट के कारण भी हो सकती है।

तुम हो ना ?

जब कभी जीवन समर से थकान होने लगती है।

तब ख्वाहिश होती है,

आँखे बंद कर  आवाज़ दे कर पूछूँ –

मेरे रथ के सारथी कृष्ण तुम साथ हो ना?

अौर आवाज़ आती है –

सच्चे दिल के भरोसे मैं नही तोड़ता

ख़्वाहिश करो ना करो। 

मैं यहीं हूँ।

डरो नहीं, अकेला नहीं छोड़ूँगा!