ज़िंदगी के रंग – 222

ज़िंदगी की राहों में लोग

रूठते-छूटते रहते हैं।

कुछ अपनों के अपना होने के

भ्रम टूटते रहतें हैं।

अँधेरे पलों में कुछ सच्चे अपने,

दमकते सितारों से,

ज़िंदगी में जुटते रहतें हैं।

17 thoughts on “ज़िंदगी के रंग – 222

  1. हम सभी को विविधता में रहने की जरूरत है
    बाहर से
    और भीतर की दुनिया
    हर दिन
    और एक सपने में
    रास्ता खोजें

    हम अपने अंत में होंगे
    भागों में
    अलग गिर

    भौतिक पदार्थ में वापस
    जिससे हम बने हैं
    जीवन की विदाई में

    उच्च स्व
    पाने के लिए
    आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली के दिमाग से पैदा हुआ है
    के उद्देश्य के साथ
    अपमान संकट पीड़ा
    चारों ओर पाने के लिए इच्छुक

    हमे जरूर
    हर एक चीज़
    करना है कि
    हम क्या
    जगह पर
    बेहतर के लिए
    विनम्रता में ऐसा करने के लिए मजबूर

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  2. सच बात है कि अपनों में कौन सच में अपना हैं, उसकी परख जीवन में दुःख के समय ही होती हैं । सुंदर अभिव्यक्ति 👌🏼👌🏼😊

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    1. हाँ, इसलिए जीवन में आए हर दुःख सबक़ ले कर आते हैं। आभार अनिता।

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      1. बिल्कुल सही है कहाँ आपने ये दुःख सबक के साथ व्यक्तित्व को परिपक्वता प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं 🙏🏼😊

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  3. ठीक कहा आपने। जब अपने-पराए का भेद सही-सही पता न चल रहा हो तो –
    न हम राह पूछें किसी से, न तुम अपनी मंज़िल बताओ

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    1. धन्यवाद जितेंद्र जी। बिलकुल ! पर विश्वास और भरोसा भी करना हमें सिखाया जाता है।
      इसलिए ज़िंदगी हीं सही गुरु है। जिसका सीखना तब तक चलता है जब तक हम सीख नहीं जाते।

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