आप हैं यहीं कहीं! Happy Father’s Day!!

सब कहते हैं आप चले गए! पर आप हैं यही कहीं। महज़ साँसों की गिनती जीवन नहीं, उँगली थामें, जीती जागती, यादों का भी मोल है। बस देखने के लिए नज़रें चाहिए,

गंगा- कब हमारी नींद खुलेगी?

अभी तक इस पर समस्यापर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? जो अब सारी दुनिया में दिखाई जा रही है। यह अफ़सोस की बात है।

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Please watch this video – Covid threat to India’s holiest river Close

 

मैं क्यों आई धरा पर? #गंगाजयंती/गंगासप्तमी 18 मई

हिमालय से लेकर सुन्दरवन तक की यात्रा करती,

पुण्य, सरल, सलिला, मोक्षदायिनी गंगा,

 हमेशा की तरह पहाड़ों से नीचे पहुँची मैदानों का स्पर्श कर हरिद्वार !

कुम्भ की डुबकी में उसे मिला छुअन कोरोना का।

आगे मिले अनगिनत कोरोना शव।

वह तो हमेशा की तरह बहती रही

कोरोना वायरस

जल पहुँचाती घाट घाट!

जो दिया उसे, वही रही है बाँट!

किनारे बसे हर घर, औद्योगिक नगर, हर खेत और पशु को।

शुद्ध, प्राणवायु से भरी गंगा भी हार गई है मानवों से।

सैंकड़ों शवों को साथ ले कर जाती गंगा।

हम भूल रहें हैं, वह अपने पास कुछ भी  रखती नहीं।

अनवरत बहती है और पहुँचाती रही है जल।

अब वही पहुँचाएगी जो इंसानों ने उसे दिया।

कहते हैं गंगा मां  के पूजन  से  भाग्य खुल जाते हैं।

पर उसके भाग्य का क्या?

  ख़्याल उसे आता होगा मगर।

स्वर्ग छोड़ मैं क्यों आई धरा पर ?

 

( एक महीना  पहले यह  कविता मैंनें लिखी थी। इस खबर पर

आप के विचार सादर आमंत्रित हैं। गंगा अौर यह देश आप सबों का भी है। )

World Blood donation day- 14 June


World Blood Donor Day takes place on 14 June each year. The aim is to raise global awareness of the need for safe blood and blood products for transfusion and of the critical contribution voluntary, unpaid blood donors make to national health systems. The day also provides an opportunity to call to action to governments and national health authorities to provide adequate resources and put into place systems and infrastructures to increase the collection of blood from voluntary, non-remunerated blood donors.

अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा?- मीडिया ट्रायल (सुशांत सिंह राजपूत की पुण्यतिथि पर) – व्यंग

सुना है राम और रावण की राशि एक हीं थी,

पर कर्म अलग।

ऐसा हीं हाल है मीडिया का,

कुछ हैं पर्दाफ़ाश और कुछ सनसनीबाज़।

जनता है हैरान,

कैसे जाने कौन ईमानदार कौन चालबाज़ ?

किसकी खबरें सच मानें ?

किसकी बातें  बेमानी ?

कुछ मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक  जज बन

मिनटों में हत्या-आत्महत्या सुलझाते हैं।

शांत रहने,

सुशांत ना बनने की चेतावनी दे जाते हैं।

कम सुनाते है अपराध,

ड्रग्स, मर्डर, चाइल्ड ट्रैफ़िकिंग या फ़्लेश ट्रेडिंग की खबरें।

सर्वाधिक अख़बारों अौर खबरों वाले हमारे देश का यह हाल क्यों?

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ – मीडिया

टिका है कलम या कि तलवार पर?

शक्ति, धन या राजनेताअों पर?

चैनलों की टीआरपी या  रेटिंग पर?

गर  कलम खो देती है अपनी ताकत,

जागरुकता अौर सच्चाई ।

तब जाने अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा?

यहाँ तो कई शाख़ पर उल्लू बैठे हैं।

लफ़्ज़

लफ़्ज़ों के वजूद को समझो।

दिल में उतरने के लिए और

दिल से उतारने के लिए

कुछ बोले और अबोले लफ़्ज़

हीं काफ़ी हो

 

ज़िंदगी के रंग- 219

ज़िंदगी के समंदर में उठते तूफ़ानों के मंजर ने कहा ।

ना भागो, ना डरो हम से।

हम जल्द हीं गुजर जाएग़ें।

साथ लें जाएँगे कई मुखौटे।

तब तुम याद करोगी,

 हमने अपने झोकों से कितने नक़ाब हटाए।

कितने नक़ली अपनों औ असली अपनों से तुम्हें भेंट कराए।

 शांति अच्छी है ज़िंदगी की……

लेकिन वह नहीं दिखती जो

हम कुछ हीं पलों में दिखा अौर सीखा जातें है।

तुम्हें मज़बूत बना जातें हैं।

तुम्हारे जीवन से बहुत कुछ बुहाड़ कर साफ़ कर जातें हैं।

कुछ पलों की हमारी जिंदगानी, जीवन भर का सीख दे जाती हैं।

ना डरों हमसे, ना डरो तूफ़ानों से।