ज़िंदगी के रंग -164

शाम हो चली थी

हवा थी कुछ नशीली सी .

तभी ……

पत्तों के झुरमुट के बीच से झाँका

धुआँ धुआँ सा, आँखों में नमी लिए शाम का सूरज

गुलाबी लाल किरणों के उजाले के साथ.

पूछा हमने – किसे खोज रहे हो ?

कुछ कहना है क्या ?

कहा उसने –

आज की शाम तो पूरे चाँद के नाम है .

उसी पूर्णिमा की चंद्रिका के इंतज़ार में हूँ .

जाते जाते एक झलक दिख जाए.

सदियों से यह क्रम चल रहा है.

एक दूसरे के आने के

इंतज़ार में जीना और फिर ढल जाना…….

ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा, 17 जून .

8 thoughts on “ज़िंदगी के रंग -164

  1. बहुत ही खूबसूरत रचना!
    कमाल की पंक्तियाँ :
    पत्तों के झुरमुट के बीच से झाँका
    धुआँ धुआँ सा, आँखों में नमी लिए शाम का सूरज

    सूरज और चन्द्रमा के सम्बन्ध का भी खूबसूरत वर्णन ! साधुवाद आपको!

    वैसे बहुत समानता तो नहीं है , पर मेरी एक कविता में ‘अँधेरी रात ‘ चाँद के मध्य का वार्तालाप है | समय मिले तो जरूर पढ़ें :
    https://rkkblog1951.wordpress.com/2018/10/15/अँधेरी-रात-और-चाँद

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    1. बहुत आभार आपका पढ़ने और प्रशंसा के लिए.
      Link share करने के लिए शुक्रिया.

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    1. मुझे सूर्य और चाँद का आना जाना कुछ ऐसा हीं लगता है. जिसने प्यार और इंतज़ार हो.

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