आज़ाद परिंदे (कविता )

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बनाने वाले ने सब को

आज़ाद बनाया.

बाँध लिया हमने अपने को

रिश्ते नाते,  अपने-पराये, धर्म देश  की  सीमा …..

जैसे  बंधनों  में.

हमसे तो अच्छे

ये आज़ाद परिंदे हैं.

17 thoughts on “आज़ाद परिंदे (कविता )

  1. बहुत सही लिखा आपने। इंसान ने अपने आपको बंधनो में तो बाँध लिया, पर इससे छूट जाने के तरीके उसे अभी भी नहीं मिले है।

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    1. तरीके तो हमारे आध्यात्म और मनीषियों ने बताया हैं. पर दुनियाँ के बंधनों और मोह माया से अपने को आजाद करना सरल नहीँ हैं. हैं क्या ? 😊😊

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      1. बिलकुल सही फ़रमाया आपने। अगर उक्त कार्य आसान होता तो दुनिया एक बेहतर जगह होती।

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