वह कभी आइने में अपना सुकुमार सलोना चेहरा देखती
कभी अपनी माँ को।
दिल में छाले, सजल नेत्र, कमसिन वयस, अल्पशिक्षित
कुछ माह की विवाहिता,
पति के चरित्रहिनता व बदमिजाजी से तंग,
वापस आई पिता ग़ृह, अपना घर मान कर।
माँ ने वितृषणा से कहा –
पति को तुम पसंद नहीं हो।
तुम्हारा चेहरा नहीं, कम से कम भाग्य तो सुन्दर होता।
वह हैरान थी, माँ तो विवाह के पहले से जानती थी
उसके ससुराल की कलकं-कथा,
अौर कहा था – घबराओ नहीं,
जल्दी हीं सुधर जायेगा।
“मेहंदी रंग लायेगी”
फिर आज़ यह उसके भाग्य अौर चेहरे की बात कहां से आई?

images from internet.

Jo khud par vishvas kare bhagya se kya Lena..
Mann sundar hain to sab kuch hain
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Bahut achi bat likhi hai aapne. Sundarta to dekhne vale kee ankho par nirbhar karta hai.
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agree with sathi
: )
good heart is must!
good deeds make a good human
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thanks for your feedback. i agree with your viewpoint.
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समाज के बुराईयों को उकेरती अभिव्यक्ति सुंदर रचना !आभार। “एकलव्य”
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यह सब हमारे सभ्य कहलाने वाले समाज में रोज़ होता है. धन्यवाद एकलव्य .
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Soo true.. 😊 love ur Poetry
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Thank you 😊
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