Only Breath

 Not Christian or Jew or Muslim, not Hindu Buddhist, sufi, or zen. Not any religion or cultural system.

I am not from the Eastor the West, not out of the ocean or up from the ground,

not natural or ethereal, notcomposed of elements at all. I do not exist, am not an entity in this world or in the next,

did not descend from Adam and Eve or any origin story. My place is placeless, a traceof the traceless.

Neither body or soul. I belong to the beloved, have seen the two worlds as one and that one call to and know, first, last, outer, inner,

only that breath breathing human being.

Rumi ❤   From Essential Rumi by Coleman Barks

Image courtesy- Aneesh.

Do you know what you are ?

Do you know what you are?
You are a manuscript of a divine letter.
You are a mirror reflecting a noble face.
This universe is not outside of you.
Look inside yourself;
everything that you want,
you are already that.

 


― ❤ Rumi, Hush, Don’t Say Anything to God: Passionate Poems of Rumi

Painting courtesy- Lily Sahay

ज़िंदगी के रंग- 89

मेरी एक पुरानी कविता –

ना जाने क्यों, कभी-कभी पुरानी यादें दरवाजे की दहलीज  से आवाज़ देने लगती हैं। 
AUGUST 16, 2018 REKHA SAHAY

 

एक टुकड़ा ज़िंदगी का

     बानगी है पूरे जीवन के

            जद्दोजहद का.

                उठते – गिरते, हँसते-रोते

                      कभी पूरी , कभी स्लाइसों

                                  में कटी ज़िंदगी

                                      जीते हुए कट हीं जाती है .

                                  इसलिए मन की बातें

                           और अरमानों के

                    पल भी जी लेने चाहिये.

                   ताकि अफ़सोस ना रहे

अधूरे हसरतों ….तमन्नाओं …. की.

जिंदगी के रंग -145

अब क्या लिखें कि तुम्हारे जाने से क्या हुआ ?

अब क्या बताएँ कि तुम्हारे मिलने से क्या हुआ था?

खंडित काव्य में व्यक्त आधा अधूरापन  सा,

हवाओं ने बदला रूख जीवन यात्रा का।

तितिक्षा से…बिन प्रतिकार,

बिना शिकायत, धैर्य से कोशिश है,

भँवर में जो शेष है … बचा है….

उसे बचाने की।

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कैसे तय करे कि हम वोट किसे दें?

व्यंग Satire

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चुनाव का मौसम आते राजनीति

गलियरों में एक खेल ज़ोरों पर है।

एक दूसरे पर ताने कसते, व्यंग,

टीकाटिप्पणी करते…..

धर्म, पार्टी, राजनीतिक आधार पर

तंज कसते, छिंटाकशी करते बड़े लोगों का खेल.

जो बच्चों जैसे लग रहे हैं.

जनता भी बिना सोचे समझे

इस खेल को खेलने लगी है.

अब इंतज़ार यह है कि ये लोग कब बड़े होंगे .

तब तो हम,

तय करेगे किहम वोट किसे दें !!!!

भरे रहने का एहसास

पुराने सामानों के बीच बैठ

यादों में सब ज़िंदा रखने की …..

बीते पलों को ज़बरदस्ती

वर्तमान में लाने की ……

कोशिश

वर्तमान और भविष्य को भी,

पुराने दर्द से भर देती है .

यादों- एहसासों से ,

भरे होने के एहसास

से अच्छा है –

सब धूम्र ग़ुबार में विलीन कर देना…….

आकाश में उठते धुएँ

के साथ सूनी पसरी पीड़ा

शून्य में शून्य होते देखना …….

ज़िद

चाहतों से और ,

चाहते रहने से ,

ना मुक़ाम मिलते है .

ना चाहतें पूरी होती है .

मंज़िल माक़ूल पाने के लिए

चलते रहने की ज़िद

भी ज़रूरी है .

शौक़ीन

हलके में मत लेना तुम सावले रंग को…

दूध से कहीं ज्यादा देखे है शौक़ीन चाय के…!!!

Unknown

रंजिश

आज हीं कहीं यह पढ़ा और  सलाह कुछ अधूरी सी लगी इसलिए कुछ पंक्तियाँ जोड़ दी-

लम्हे फुर्सत के आएं तो, रंजिशें भुला देना दोस्तों,

किसी को नहीं खबर कि सांसों की मोहलत कहाँ तक है ॥

नई पंक्तियाँ

अच्छा हो रंजिशे पैदा करनेवाली आदतों को भुला देना ,

किसी को पता नहीं ये आदतें कहाँ तक चुभन पहुँचाएगी .

ना रंजिशे होंगी ना भुलाने की ज़रूरत .

ज़िंदगी और साँसों के मोहलत की गिनती की भी नहीं ज़रूरत.