रंग बदलती यह रंगीन दुनिया…..
रोज नये रंग दिखाती है .
कभी बेआवाज़-बेरंग दुआ, रंग लाती हैं।
कभी कच्चे रंग के रिश्ते पक्के बन जाते हैं।
रंगों के संगत से बेरंग पानी भी रंग बदलाता है,
जैसे पल-पल रंग बदलते लोग।
रंग बदलती यह रंगीन दुनिया…..
रोज नये रंग दिखाती है .
कभी बेआवाज़-बेरंग दुआ, रंग लाती हैं।
कभी कच्चे रंग के रिश्ते पक्के बन जाते हैं।
रंगों के संगत से बेरंग पानी भी रंग बदलाता है,
जैसे पल-पल रंग बदलते लोग।
गाँव में एक किसान रहता था जो दूध से दही और मक्खन बनाकर बेचने का काम करता था..
एक दिन बीवी ने उसे मक्खन तैयार करके दिया वो उसे बेचने के लिए अपने गाँव से शहर की तरफ रवाना हुवा..
वो मक्खन गोल पेढ़ो की शकल मे बना हुआ था और हर पेढ़े का वज़न एक kg था..
शहर मे किसान ने उस मक्खन को हमेशा की तरह एक दुकानदार को बेच दिया,और दुकानदार से चायपत्ती,चीनी,तेल और साबुन वगैरह खरीदकर वापस अपने गाँव को रवाना हो गया..
किसान के जाने के बाद –
.. .दुकानदार ने मक्खन को फ्रिज़र मे रखना शुरू किया…..उसे खयाल आया के क्यूँ ना एक पेढ़े का वज़न किया जाए, वज़न करने पर पेढ़ा सिर्फ 900 gm. का निकला, हैरत और निराशा से उसने सारे पेढ़े तोल डाले मगर किसान के लाए हुए सभी पेढ़े 900-900 gm.के ही निकले।
अगले हफ्ते फिर किसान हमेशा की तरह मक्खन लेकर जैसे ही दुकानदार की दहलीज़ पर चढ़ा..
दुकानदार ने किसान से चिल्लाते हुए कहा: दफा हो जा, किसी बे-ईमान और धोखेबाज़ शख्स से कारोबार करना.. पर मुझसे नही।
900 gm.मक्खन को पूरा एक kg.कहकर बेचने वाले शख्स की वो शक्ल भी देखना गवारा नही करता..
किसान ने बड़ी ही “विनम्रता” से दुकानदार से कहा “मेरे भाई मुझसे नाराज ना हो हम तो गरीब और बेचारे लोग है,
हमारी माल तोलने के लिए बाट (वज़न) खरीदने की हैसियत कहाँ” आपसे जो एक किलो चीनी लेकर जाता हूँ उसी को तराज़ू के एक पलड़े मे रखकर दूसरे पलड़े मे उतने ही वज़न का मक्खन तोलकर ले आता हूँ
जो हम देंगे , वहीं लौट कर आयेगा…
चाहे वो इज्जत, सम्मान हो या फिर धोखा…
~~~anonymous

पतझड़ के नग्न होते पेड़ों से
आँसू से गिरते तरु पत्र .
निशा के चाँद के ओस अश्रु
या
उसके नयनों से टपकते अश्कों में …
किस में ज्यादा दर्द छुपा था
पता नहीं .
टूटना और बिछुड़ना तो प्रकृति का नियम है .
कच्ची उम्र के उफानों में बह जाए वो इश्क ही क्या?
झुर्रियों में भी खिलखिलाए वो इश्क कमाल होता है.
Anonymous

ज़िंदगी बहती नदी सी लगती है हमेशा.
कभी भँवर सी गोल गहरी घुमाती जिंदगी .
कभी किनारे पर सर पटकती जल लहरों सी.
कभी शांत पर बेहद गहरी जैसे
पैरो के नीचे जमीं ना होने का एहसास हो .
कभी ऊपर…… कभी नीचे…..
कभी छिछली सी जलधार सी लगाती है .
अपनी मुक्त नीलम नीलाभ जल की ख़ुशियों से भरी छलकती छलछलाती .
और फिर मानो बरसात की झड़ी से सब कुछ मलिन मटमैला होता जीवन .
सरल सहज बहती जिंदगी जल प्रपात का कब रूप ले लेती है पता हीं नहीं चलता .
प्रकृति के साथ बंधी हुई ……
सागर तक …..अनंत तक …..ना जाने कब तक?
ऐसे हीं चलती है यह जीवन यात्रा …..यह जिंदगी .

पतझड़ के सूखे पत्तों पर चलता हुआ
चाँद नभ पर उतर आया .
और आंखों में आँखे डाल पूछा –
नींद खो किस सोंच में हो ?
हमने कहा –
सच्चा विश्वास सच्चा साथ होता है क्या ?
हँस पड़ा चाँद –
हाँ मैं हूँ सारी रात तुम्हारे साथ .
सारी कथा व्यथा सुना डालो .
ना जाने कितने राज, अफसाने , दोस्ताने दफन है
सदियोँ से दिल में हमारे .
निभाता आ रहा हूँ .
यह तो आदत है हमारी .
पद्मावत कहें या पदमावती क्या फर्क पड़ता है ?
हम सब शोर कर रहे है सिर्फ
मृत इतिहास और उसके प्रमाणिकता की .
कोई क्यों नहीं सोचता इसके वर्तमान व भविष्य प्रभावों को ?
नारी अग्निदाह उत्सव का पुनर्जन्म तो नहीं है यह?
कुछ दशको पहले तक रूपकंवर की दर्दनाक सती
कथा त्याग कही जा रही थी .
बड़ी कठिनाईयों से हमारी आँखे खुलीं .
कहीं पद्मावती की सती कथा फिर इस आग
को लौ दिखा भड़का ना दे .
तब के जौहर की बात अौर थी।
कहने वाले कहते हैं –
अब – वैधव्य के बाद सती होने के
लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाते थे .
चिता अग्नि के चारों ओर सजे मेले…..दर्शकोँ के
भीड़ -कोलाहल में सती की हृदयविदारक करूंण क्रंदन
दव जाती थी
या
क्या दबा दी जाती थी?
उनकें चिता पलायन प्रयास को पास खड़े कुछ लोग
विफल कर देते थे – लम्बे बाँस के सहारे उसे
लपलपाती अग्नि शिखा में वापस ढकेल कर
एक जीवित जलती नारी मंदिर की देवी बन जाती .
अगर यह स्वर्ग गमन का .… पूज्यनीय दैवी पथ है
तब मात्र नारी के लिये हीं क्यों ?
स्मिता सहाय के विचारों से प्रेरित.
धागा हो जिंदगी हो या जीवन की उलझी डोर
सुलझाना कभी कभी कठिन हो जाता है .
कभी उलझने सुलझाने में और उलझ जाती है .
और कभी लगता है डोर हीं ना टूट जाये .

यादें हँसाती हैं, गुदगुदाती हैं………
ये खजाने हैं बीते पलों के
पर कुछ रुला भी जातीं हैं।
पर यह भी एहसास दिला जातीं हैं……
तितलियों के रूपांतरण (metamorphosis)
जैसा बदल लो जिंदगी को।
जी लो हर पल को ……….
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