मन के अंदर के मन ने कितना पुकारा….
आवाज़ें दीं ……।
धूप खिली , रात ढली ,
सर्द-गर्म मौसमों की महफ़िलें बदली …
ख़्वाहिशों – ख्वाबों की मुस्कान में जिंदगी बीत चली।
जब अंतर्मन की आवाज़ सुनी
लगा अंधेरे में…..
ज़िंदगी में ही तरस रहे थे ज़िंदगी के लिए…।
ख़ुद ही ख़ुद को समझाना,
मन के भीतर के मन की
आवाज़ें सुनना कितना जरुरी है,
तब यह बात समझ आई।
कविता की प्रेरणा के लिये आभार – https://sacredheartwords.wordpress.com



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