स्याही वाली क़लम

अब स्याही वाली क़लम से लिखना छोड़ दिया है.

कब टपकते  आँसुओं से 

 पन्ने पर पर अक्षर अौ शब्द फैल जाते  हैं।

 कब आँखें धुँधली हो जातीं हैं।  

पता हीं नहीं चलता है।

 

इंतज़ार

कहते हैं, जो कुछ  खोया हैं,

वह वापस आता है।

पर कब तक करें इंतज़ार यह तो बता दो?

Don’t grieve. Anything you lose comes round in another form.

Rumi ❤️

 

दिन

अपना आज का दिन बनाने के लिए अक्सर

गुजरे दिन की शामें याद कर लेते हैं।

प्रतिपदा का चाँद

प्रतिपदा का कमज़ोर, क्षीण चाँद

थका हारा सा अपनी

पीली अल्प सी चाँदनी ,

पलाश के आग जैसे  लाल फूलों पर

बिखेरता हुआ बोला –

बस कुछ दिनो की बात है .

मैं फिर पूर्ण  हो जाऊँगा।

मेरी चाँदी सी चाँदनी हर अोर बिखरी होगी .

 

प्रतिपदा – पक्ष की पहली तिथि।

जिंदगी के रंग- 193

हम कभी क़ैद होते है ख्वाबों, ख्वाहिशों , ख्यालों, अरमानों में।

कभी होते हैं अपने मन अौर यादों के क़ैद में।

हमारी रूह शरीर में क़ैद होती है।

क्या हम आजाद हैं?

या पूरी जिंदगी ही क़ैद की कहानी है?

 

 

ज़िंदगी के रंग – 191

हमसे ना उम्मीद रखो सहारे की.

ख़ुद हीं लड़ रहे हैं नाउम्मीदी से.

वायदा है जिस दिन निकल आए,

पार कर लिया दरिया-ए-नाउम्मीद को.

सबसे बड़े मददगार बनेंगे.

 

वक़्त

समय कब कहता है – वह सही है?

शिद्दत से सही वक्त ढूँढना पङता है।

कई बार सही समय ढूँढने में

वक्त हीं फिसल जाता है हाथों से।

 

सैलाब

गीले आँखों से बरसते सैलाब को

देख जाती हुई बारिस ने भी

रुक कर साथ देना तय कर लिया है.

मुस्कुराते है….

मुस्कुराते है….

अपने दर्द को छुपाने के लिए,

अपनों का हौसला बढ़ाने के लिए,

ग़मों से दिल को बहलाने के लिए.

पर  क्यों इससे भी शिकायत है?

 

सोने का मुल्लमा

किताब-ए-ज़िंदगी

का पहला सबक़ सीखा।

रिश्तों को निभाने के लिए,

अपनों की गिलाओ पर ख़ामोशी के

सोने का मुल्लमा चढ़ना अच्छा है।

पर अनमोल सबक़ उसके बाद के

पन्नों पर मिला –

सोने के पानी चढ़ाने से पहले

देखो तो सही…

ज़र्फ़….सहनशीलता तुम्हारी,

कहीं तुम्हें हीं ग़लत इल्ज़ामों के

घेरे  में ना खड़ा कर दे.