जीवन के रंग – 32

इस जीवन यात्रा में…..

एक बात तो बङे अच्छे से समझ आ गई,

अपनी लङाई खुद ही लङनी  होती है।

इसमें

शायद ही कोई साथ देता है,

क्योंकि

  लोग   अपनी लङाईयों अौर उलझनों में उलझने होते हैं।