
आह अहिंसा


एक प्रश्न अक्सर दिलो-दिमाग में घूमता है.
एक शिशु जहाँ जन्म लेता है। जैसा उसका पालन पोषण होता है।
वहाँ से उसके धर्म की शुरुआत होती है।
जो उसे स्वयं भी मालूम नहीं।
तब कृष्ण के नृत्य – ‘रासलीला’,
सूफी दरवेशओं के नृत्य ‘समा’ में क्यों फर्क करते हैं हम?
ध्यान बुद्ध ने बताया हो या
कुंडलिनी जागरण का ज्ञान उपनिषदों से मिला हो।
क्या फर्क है? और क्यों फर्क है?
You have to grow from the inside out. None can teach you, none can make you spiritual. There is no other teacher but your own soul.
Swami Vivekananda
जीवन की परिपूर्णता —-
अगर यह लौकिक हो – बुद्ध के राजसी जीवन की तरह,
या संतृप्ति हो , कबीर की आध्यात्मिक आलौकिक जीवन की तरह।
तब मन कुछ अौर खोजने लगता है।
क्या खोजता है यह ?
क्या खींचती है इसे अपनी अोर?
यह खोज…….यह आध्यात्मिक तलाश कहाँ ले जायेगी?
शायद अपने आप को ढूँढ़ने
मैं कौन हूँ??
या
Image from internet.
साम्राज्य छोङ बुद्ध ने कहा-
मानवता हित अौर सेवा सबसे ऊपर
हम भूले, विश्व में फैला बुद्धत्व।
ईशु ने दिया विश्व शांति, प्रेम और सर्वधर्म सम्मान संदेश।
कुरआन ने कहा जहाँ मानवता वहाँ अल्लाह।
गीता का उपदेश- कर्मण्यवाधिकारस्ते मा……
– निस्वार्थ कर्तव्य पालन करो।
कर्ण ने सर्वस्व अौर दधिची ने किया अस्थि दान ,
कितना किसे याद है, मालूम नहीं।
मदाधं मानवों की पशुवत पाशविकता जाती नहीं।
मानव होने के नाते, हमारे पास ज्ञान की कमी नहीं।
बस याद रखने की जरुरत है,
पर हम ङूबे हैं झगङे में – धर्म, सीमा, रंग , भाषा……..
हम ऊपरवाले की सर्वोत्तम कृति हैं !
कुछ जिम्मेदारी हमारी भी बनती है।
Topic of Indispire –
What would be your idea of an evolved human being? #beingtrulyhuman
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