अपने आप को आईने में ढूँढा,
परछाइयों में अक्सों….
चित्रों में खोजा,
लोगों की भीड़ में ,
किसी की आँखों में खोजा,
यादों में, बातों में खोजा,
भूल गई अपने दिल में झाँकना.
अपने आप को आईने में ढूँढा,
परछाइयों में अक्सों….
चित्रों में खोजा,
लोगों की भीड़ में ,
किसी की आँखों में खोजा,
यादों में, बातों में खोजा,
भूल गई अपने दिल में झाँकना.
जीवन की होड़ में एक बात समझ आई –
हर ओर ….सब लोगों में योग्यतायें है .
इस दौड़ में शामिल होने
से अच्छा है प्रतिस्पर्धा
अपने आप से रखो ताकि .
सामना बराबर वाले से हो .
झुक कर रिश्ते निभाते-निभाते एक बात समझ आई,
कभी रुक कर सामनेवाले की नज़रें में देखना चाहिये।
उसकी सच्चाई भी परखनी चाहिये।
वरना दिल कभी माफ नहीं करेगा
आँखें बंद कर झुकने अौर भरोसा करने के लिये।
लेखन के दौरान कभी-कभी लिखना कठिन हो जाता है। समझ नहीं आता क्या लिखें, कैसे लिखें।
यह तब होता है
जब आपके काल्पनिक दोस्त ,चरित्र या पात्र आपसे बात करना बंद कर देते हैं !!!
इसे हीं लेखक ब्लॉक कहते हैं।
आईने में अपने प्रतिद्वंद्वी व मित्र को देखा।
जीवन की स्पर्धा, प्रतिस्पर्धा , मुक़ाबला
किसी और से नहीं अपने आप से हो,
तब बात बराबरी की है।
वर्ना क्या पता प्रतियोगी या हम,
कौन ज्यादा सक्षम है?
कभी कहीं सुना था –
किसी को बंधनों में बाँधने से अच्छा है, आज़ाद छोङ देना।
अगर अपने हैं ,
अपने आप वापस लौट आएगें।
एक सच्ची बात अौर है –
अगर लौट कर ना आयें, तब भी गम ना करना।
क्योंकि
जगह तो बना कर जा रहें है,
शायद किसी ज्यादा अपने के लिये………..