यह बयार गजब ढातीं हैं
कभी बुझती राख की चिंगारी को हवा दे
आग बना देतीं है।
दिल आ जाये तो , खेल-खेल में
जलते रौशन दीप अौ शमा बुझ देती है
यह बयार गजब ढातीं हैं
कभी बुझती राख की चिंगारी को हवा दे
आग बना देतीं है।
दिल आ जाये तो , खेल-खेल में
जलते रौशन दीप अौ शमा बुझ देती है
कविता की अंतिम तीन पंक्तियाँ सआभार ब्लॉगर मित्र अभय के सौजन्य से ।
कहते तो हैं– आवाज़ हीं पहचान है !!
पर क्या मिला है कोई ?
जो आवाज से आपकीखुशी या गम जान लें
अगर मिलें तो दिल केकरीबरखना इन्हें,
बङे खास होते हैं ये लोग।
जिंदगी के रंग निराले
जो कभी खून करना चाहते थे, उन्हें खून देते देखा।
जो जान लेना चाहते थे, उन्हें जान देते देखा
जो लाखों लोगों का दिल धङकाते थे,
उन्हें एक-एक धङकन के लिये मोहताज़ होते देखा।
जिनके लिये लाखों दुआएँ मागीं , उन्हें बद्दुआ देते देखा।
दिल में जगह देनेवालों को दिल तोङते देखा।
इन सब के बाद भी जीने की जिद देखी।
बङी अजीब पर नशीली अौ हसीन है यह दुनिया…………….
आज 
क्या कुछ ख़ास बात है ?
नज़ारे ख़ूबसूरत लग रहे है,
लोग प्यारे लग रहे है,
मौसम ख़ुशगवार सा है
लगता है ……
शायद आज दिल ख़ुश है।

इधर उधर बिखरे शब्दोँ को बटोरकर
उनमें दिल के एहसास और
जीवन के कुछ मृदु कटु अनुभव डाल
बनती है सुनहरी
काव्यमय कविता ……
कभी तो यह दिल के बेहद करीब होती है
सुकून भरी …मीठी मीठी निर्झर सी ….
और कभी जब यह पसंद नहीं आती
मिटे पन्नों में कहीं दफन हो जाती है -ऐसी कविता !
दर्द भरे दिल पर पङे बोझ को जब उठाया
उसके तले दबे
बहुत से जाने पहचाने नाम नज़र आये।
जो शायद देखना चाहते थे….
तकलीफ देने से कितना दर्द होता है?
पर वे यह तो भूल गये कि
चेहरे पर पङा नकाब भी तो सरक उनके असली चेहरे दिखा गया।
मन अौर दिल पर लगे,
हर चोट के निशान ने मुस्कुरा कर
ऊपरवाले को शुक्रिया कहा…..
जीवन के हर सबक, पीड़ा अौर आघात के लिये
ये तमगे हैं, जिन्हों ने जीना सीखाया।
इन दुनियावी रंगों , इत्रों, खुशबू, सुगंध से परे
कोई अौर भी राग-रंग, महक है ,
जो दिल और आत्मा को रंगती हैं
जीवन यात्रा में।
यह खुशबू हमें ले कर चलती रहती है,
प्यार भरे जीवन के अनन्त पथ पर।
ईश्वर-नियन्ता पत्थरों की मुर्तियोँ में नहीं बसते।
हमारे विचारों मे बसते हैं।
अौर मन-आत्मा-दिल
वह मंदिर- मस्जिद -चर्च
वह पूजा स्थल हैं….
जहाँ ये विचार उपजते हैं।
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