
मौन रह कर
माफ़ कर देना,
मौन रह कर
जीवन पथ पर बढ़ जाना
सबके बस की बात नहीं।
यह होता है तब
ऊपरवाले पर भरोसा हो जब।
अलफ़ाज़ बेमानी हो जाते हैं तब।

मौन रह कर
माफ़ कर देना,
मौन रह कर
जीवन पथ पर बढ़ जाना
सबके बस की बात नहीं।
यह होता है तब
ऊपरवाले पर भरोसा हो जब।
अलफ़ाज़ बेमानी हो जाते हैं तब।
छुआ-छूत और जात की बात,
हमबिस्तर की रात नहीं रहती याद।
ब्लड की बोतल हो जाती है पाक।
आर्गन डोनेशन लेने में
नहीं रहती कोई बात।
बस विवाह, इश्क़ और पानी पात्र में
आड़े आती है जात।
News- Tank Cleaned With Cow Urine
In Karnataka After Dalit Woman
Drinks Water. There are several tanks
in the village with written messages that
everyone can drink water from there.



सूखते गुलाबों में भी अक्सर
जानी पहचानी ख़ुशबू मिलती है।
पुरानी किताबों में भी अक्सर
अजीब से ख़ुशबू मिलती है।
पुरानी किताबों में मिले सूखे गुलाब,
की मिलाजुली ख़ुशबू
ले जाती हैं यादों के भँवर में।
बीते दिनों के समुंदर में।
#TopicByYourQuote

फिर याद आए वो,
तो ग़मगीन हो जाते हो।
चाह कर भी भूल ना पाए
तो ग़मगीन हो जाते हो।
कभी दुआओं में किसी को माँगते हो।
कभी उसे हीं भूलने की दुआएँ माँगतें हो।

चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
सुभद्राकुमारी चौहान
Lakshmi Bai / Laxmi Bai, birth date
November 19, 1835, Kashi, India.
इश्क़ है जागती रातें, उनींदी आँखें, गुनगुनाते गीत।
मुहब्बत है ख़्वाब, सितारे, चिराग़, चाँद
अँधेरी रातें, अधूरा चाँद, अधूरे किस्से।
इस इश्क़ को हीं कहते हैं बंदगी।
हम तो जी रहे हैं यही ज़िन्दगी।
तुम एक बार में लगे टूटने?
हँस कर पूछा चाँद ने।

नहीं थी उनको हमारी कदर,
जिसके हम थे सबसे बड़े कदरदान।

हमारी कदर नहीं थी उनको,
जिसके हम सबसे बड़े कदरदान थे।

इक तन्हा चराग़, कमजोर पड़ते लौ से
निशा के गहरे अँधेरे से लड़ता थक सा गया।
रात के आख़री किनारे पर
टिमटिमाते चराग़ के कानों में,
सहर का सितारा बोल पड़ा –
हौसला रख, सुबह के दीप।
कुछ हीं पल में अँधेरा जाने वाला है।
रौशन जहाँ करने,
आफ़ताब आने हीं वाला है,
किसी से मिलते हीं
उसे ना नापो तौलो,
जज ना करो।
सभी किसी ना किसी रूप में पूर्ण हैं
और अपूर्ण भी।
इंसान रूप में ईश्वर ने अवतार लिया,
यही समझाने के लिए,
कि कोई परफ़ेक्ट नहीं।


खोने का डर क्यों? साथ क्या लाए थे।
क्या कभी बिना डरे जीने कोशिश की?
तब तो फ़र्क़ समझ आएगा।
इस जहाँ में आए, सब यहाँ पाए।
सब यही छोड़ जायें।
यही कहती है ज़िंदगी।
ग़र जीवन का अर्थ खोजना है।
एक बार ज़िंदगी की बातें मान
कर देखने में हर्ज हीं क्या है?
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