प्यासे मृग सी कशाकश में,
मृगतृष्णा के पीछे भागते
बीतती है दिन-रात।
कट जाती है ज़िंदगी फ़क़त
मरीचिका सी उलझन में।
बता वक्त ख़ता ढूँढे या सज़ा?

प्यासे मृग सी कशाकश में,
मृगतृष्णा के पीछे भागते
बीतती है दिन-रात।
कट जाती है ज़िंदगी फ़क़त
मरीचिका सी उलझन में।
बता वक्त ख़ता ढूँढे या सज़ा?

दो दिलों…रूहों की जुगलबंदी है इश्क़।
इश्क़ के हैं कुछ अदब-कायदे।
अज़ाब-ए-हिज्र-ओ-विसाल…
मिलन और वियोग में जीना
है सिखाती इश्क़ की जुगलबंदी।
टूट जाए यह जुगलबंदी,
फिर भी टूट कर जीना है सीखती।
एक दूसरे के लय-ताल पर
जीना है इश्क़-ए-जुगलबंदी।

Topic by YourQuote.
जैसे चाहो, जी लो ज़िंदगी।
वापस लौटने की नहीं है गुंजाइश,
बस इतनी है शर्त-ए-ज़िंदगी।

आगे बढ़ती दुनिया, पीछे छूटते लोग।
रोज़ अंधाधुँध गोली बारी की खबरें।
अगर यह प्रगति है, तो क्या फ़ायदा?
कहते हैं, यह है मानसिक बीमारी, डिप्रेशन।
ना जाने मन का कैसा दुःख-दर्द
लोगों की ऐसी राहों पर ले जाता है?
या है आग्नेयास्त्रों की राजनीति?
बेइनतहाँ हथियार बना और नासमझ
हाथों में है दिए थमा?
ज़वाब है क्या अनुत्तरित सवालों का?
NEWS-
*Thailand: Many children among dead
in nursery attack BBC.
*Gunmen open fire at a Mexican city
hall killing 18, including town mayor.

लोगों की ओर जल कर गिरते, बिखेरते आतिशो ने,
रावण से पूछा ये क्या कर डाला?
जवाब मिला –
तुम सब युगों-युगों से जला रहे है मुझे।
मैंने भी वही किया, तो बुरा क्यों मान गए?
सामने राम तो नज़र आए नहीं कहीं।
पर छुपे थे कईयों के अंदर अंश हमारे, कई रावण।

सदियाँ और युग बीते,
रावण कभी नहीं मरा।
था अति विद्वान।
पर जीत नहीं सका अहंकार अपना।
विजया और रावण दहन सीख है,
जीत सको तो जीत लो अहंकार अपना।
ना रखो कई चेहरे,
दुनिया में कई चेहरे वाले कई रावण है,
इसलिये राम याद आतें हैं।

The world celebrates this day to mark the importance of teachers. It is commemorated each year on the anniversary of the ILO/UNESCO Recommendation adoption regarding the Status of Teachers in 1966. Theme for 2022 was “Teachers at the heart of education recovery.”
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।
गुरू और गोबिंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे
प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को?
ऐसी स्थिति में गुरू के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम
है जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन
करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

तीखी धूप साये की याद दिलाती है
सर्द साया धूप-ए-आफ़ताब
की याद दिलाता है।
वक़्त वक़्त की बात है।
बहाव-ए-वक्त रोज़ नये सबक़ सीखता है
ज़िंदगी के नए रंग दिखाता है।
दहलीज़ पर जलता दीया,
पाथेय बन राहें
उनके लिए रौशन है करता,
जिन्हें वापस आना हो।
ज़ो लौटें हीं ना
उनके लिए क्यों दीया जलाना
रात की दहलीज़ पर?

थे राधा बनने की चाह में।
कई नज़रें उठी,
सिर्फ़ लालसा भरी चाह में।
माँगा इश्क़ भरी नज़रें,
मिला बदन भर चाह।
समझ ना आया, तह-दर-तह
तह-ए-इश्क़ में सच्चा कौन, झूठा कौन?
और हर इल्ज़ाम इश्क़ पर आया।
पर कृष्ण ना मिले।
महादुर्गाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

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