मेरा अजनबी भाई ( एक अनोखी और सच्ची कहानी )

मेरे जीवन में कुछ रहस्यमय घटनाएँ हुई हैं। जिन्हे याद कर मै रोमांचित हो जाती हूँ। यह वास्तविक घटना सन 1991 की है। तब हम घाटशिला नाम के छोटे से शहर में रहते थे । एक बार हम सभी कार से राँची से घाटशिला लौट रहे थे। यह दूरी लगभग 170 किलोमीटर थी। यह दूरी समान्यतः चार घंटे में हम अक्सर तय करते थे।

शाम का समय था। सूरज लाल गोले जैसा पश्चिम में डूबने की तैयारी में था। मौसम बड़ा सुहाना था। यात्रा बड़ी अच्छी चल रही थी। मेरे पति  कार चला रहे थे। साथ ही गाना गुनगुना रहे थे। मेरी आठ वर्ष की बड़ी बेटी  व एक वर्ष की छोटी बेटी कार के पीछे की सीट पर आपस में खेलने में मसगुल थीं।

तभी एक तेज़ आवाज़ ने हम सभी को भयभीत कर दिया। कार तेज़ी से आगे बाईं ओर झुकती हुई सड़क पर घिसटने लगी। अधर ने किसी तरह कार को रोका। कार से बाहर आकर हमने देखा कि आगे का बायाँ चक्का अपनी जगह से पूरी तरह बाहर निकाल आया है। कार रिम के सहारे घिसती हुई रुक गई थी। कार का चक्का पीछे सड़क के किनारे पड़ा था। हम हैरान थे कि ऐसा कैसे हुआ? एक भयंकर दुर्घटना से हम बाल-बाल बच गए थे।

एक बड़ा हादसा तो टल गया था। पर हम चिंतित थे। शाम ढाल रही थी। शहर से दूर इस सुनसान जगह पर कार कैसे बनेगी? सड़क के दूसरी ओर मिट्टी की छोटी सी झोपड़ी नज़र आई। जिसमें चाय की दुकान थी। मेरे पति उधर बढ़ गए। मैं कार के पास खड़ी थी। तभी मेरी नज़र कार के पीछे कुछ दूर पर गिरे एक नट पर पड़ी। मैंने उसे उठा लिया। किसी अनजान प्रेरणा से प्रेरित मैं काफी आगे तक बढ़ती गई। मुझे और भी नट व बोल्ट मिलते गए और मैं उन्हे उठा कर अपने साड़ी के पल्लू में जमा करते गई। जबकि मैं यह भी नहीं जानती थी कि वे किसी काम के हैं या नहीं।

मैं जब वापस लौटी तब अधर मेरे लिए परेशान दिखे। तब तक हमारी कार के पास कुछ ग्रामीण इकट्ठे हो गए थे। उनमें से एक चपल सा दिखने वाल साँवला, कद्दावर व्यक्ति मदद करने आगे आया। उसके चपटे, बड़े से चेहरे पर चोट के निशान थे और छोटी-छोटी आँखों में जुगनू जैसी चमक थी। मेरे पास के नट व बोल्ट देख कर वह उत्साहित हो गया। उसने कहा- “दीदी जी, आपने तो सारे नट-बोल्ट जमा कर लिए हैं। लाईये मैं आपकी कार बना देता हूँ। मुझे यह काम आता है।” तुरंत उसने कुछ ग्रामीणों को पास के गाँव से कुछ औज़ार लाने भेजा। उसके “दीदी” संबोधन और ग्रामीणो पर प्रभाव देख कर हमें तस्सली हुई। चलो, अब कार बन जाएगी।

अधर ने मुझे और बच्चों को चाय की दुकान पर बैठा कर चाय दिलवाई और स्वयं कार ठीक करवाने लगे। चाय वाला मुझसे बार-बार कुछ कहने की कोशिश कर रहा था। चाय वाले ने फुसफुसाते हुए मुझ से कहा- ” आप यहाँ मत रुकिए। अब रात भी हो रही है। आप के साथ बच्चे भी हैं। तुरंत यहाँ से चले जाइए। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसी बातें क्यों कर रहा है। चाय वाले ने फिर मुझसे कहा- ” वह व्यक्ति बड़ा खतरनाक है जो आपलोगों की सहायता कर रहा है। यहाँ पर होनेवाले ज़्यादातर अपराधों में यह शामिल होता है। हाल में हुए हत्या का आरोपी है। आप यहाँ मत रुकिए। थोड़ी देर में मेरी दुकान भी बंद हो जाएगी। यह तो बड़ा दुष्ट व्यक्ति है। पता नहीं, कैसे आपकी मदद कर रहा है। यहाँ सभी उससे बड़ा डरते है।” वह लगातार एक ही बात तोते की तरह रट रहा था -“आप बच्चों को ले कर जाइए। मत रुकिए।” चाय दुकान में बैठे अन्य लोगों ने भी सहमति में सिर हिलाया अौर बताया कि वह व्यक्ति वहाँ का कुख्यात अपराधी है।

मै घबरा गई। मुझे याद आया कि मेरे काफी गहने भी साथ है क्योंकि, मैं एक विवाह में शामिल होने राँची गई थी। मैंने अपने पति को सारी बात बताने की कोशिश की। पर वह अनजान व्यक्ति लगातार अपने पति के साथ बना रहा। वह मुझे  अकेले में बात करने का अवसर नहीं दे रहा था। मुझे परेशान देख , उस अजनबी ने मुझे समझाते हुए कहा- “दीदी, आप घबराइए मत। हम हैं ना। भय की बात नहीं है। हमारे रहते यहाँ आपको कोई परेशान नहीं कर सकता। वह हमें रोकने का जितना प्रयास कर रहा था। मन में उतना ही डर बढ़ता जा रहा था। उसकी मीठी-मीठी बातों के पीछे षड्यंत्र नज़र आ रहा था।

मैंने किसी तरह अवसर निकाल कर अपने पति को सब बातें बताईं। पर वहाँ से जाने का कोई साधन नहीं था। अब क्या करूँ। कुछ समझ नहीं आ रहा था। अँधेरा घिरना शुरू हो चुका था। तभी एक राँची जाने वाली एक बस आती नज़र आई। ग्रामीणों ने बताया कि बस यहाँ नहीं रुकती है। घबराहटवश, मैं बीच सड़क पर खड़ी हो गई।  बस को रोकने के लिए हाथ हिलाने लगी। बस रुक गई। बस वाले ने मेरी परेशानी और बच्चों को देख कर हमें बैठा लिया। वह अजनबी लगभग गिड्गिड़ाने लगा। “दीदी जी, मैं जल्दी ही कार बना दूँगा। आप मत जाइए।” वह मेरे पति का हाथ पकड़ कर अनुरोध करने लगा।
कुछ सोचते हुए मेरे पति ने मुझे दोनों बेटियों के साथ बस में बैठा दिया और मेरे जेवरों का सूटकेस भी साथ दे दिया। वे स्वयं वहाँ रुक गए। मेरा दिल आशंकाओं से भर गया। पर उन्हों ने आश्वासन देते हुए मुझे भेज दिया।

राँची पहुँच कर अपने घर में मैंने सारी बातें बताई। उन्होंने तत्काल कारखाने (कार सर्विसिंग ) में फोन किया। दरअसल उस दिन सुबह ही हमारी कार वहाँ से धुल कर आई थी। पता चला कार सर्विसिंग वालों के भूल के से यह दुर्घटना हुई थी। कार के चक्कों के नट-बोल्ट उन्होंने लगाया गया था। पर औज़ार से कसा नहीं था। कार सर्विसिंग के मालिक ने अपनी गलती मानी। तुरंत ही कार सर्विसिंग वालों ने एक कार और कुछ मेकैनिकों को हमारे यहाँ भेजा। जिससे वे अधर और मेरी खराब कार को सुधार कर वापस ला सकें।
कार सर्विसिंग कें लोग मुझ से कार खराब होने की जगह को समझ ही रहे थे। तभी मैंने देखा मेरे पति  अपनी कार ले कर आ पहुंचे हैं। मै हैरान थी। उन्हों ने बताया कि बड़ी मेहनत से उस व्यक्ति ने कार ठीक किया। कार के रिम को सड़क से ऊपर उठाने और चक्के को सही जगह पर लगाने में उसे बड़ी कठिनाई हुई थी। पर वह लगातार मेरे अकेले लौटने का अफसोस कर रहा था।

मैं इस घटना और उस अजनबी को आज भी भूल नहीं पाती हूँ। कौन था वह अजनबी? वह मुझे दीदी-दीदी बुलाता रहा। पर घबराहट और जल्दीबाजी में मैंने अपने अनाम भाई का नाम तक नहीं पूछा । क्या ऐसे अजनबी को भुलाया जा सकता है? मैं आज भी इस घटना को याद कर सोंच में पड़ जाती हूँ । क्यों कभी एक अपराधी भी मददगार बन जाता है? उस दिन मैंने मान लिया कि बुरे से बुरे इंसान में एक अच्छा दिल होता है।
ऐसे में मेरी नज़रें ऊपर उठ जाती है और हाथ नमन की मुद्रा में जुड़ जाते हैं। जरूर कोई अदृश्य शक्ति हमारी रक्षा करती है। हम उसे चाहे जिस नाम से याद करें- ईश्वर, अल्लाह, क्राइस्ट  ………..

मुरूगन मंदिर के अद्भुत पुजारी जिसे मैं भूल नहीं पाई ( यात्रा वृतांत और प्रेरक कहानी )

यह घटना लगभग 3-4 वर्ष पुरानी है। मैं सपरिवार दक्षिण की यात्रा पर गई थी। वापसी में मैं मदुरै पहुँची। वहाँ के विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर के सौंदर्य से हम सभी अभिभूत थे। इसलिए मै वहाँ के दूसरे महत्वपूर्ण मुरूगन (कार्तिकेय ) मंदिर को देखने का लोभ रोक नहीं सकी। मीनाक्षी मंदिर देखने में काफी समय लग गया था। फिर भी संध्या में मै सपरिवार मुरूगन मंदिर पहुँची। पता चला, मंदिर के बंद होने का समय हो रहा है। मंदिर दर्शन के लिए लंबी लाईन लगी थी। लग रहा था, इस भीड़ में मंदिर में प्रवेश असंभव है। हमारे पास समय कम था।

कुछ राह नहीं सूझ रहा था। अगले दिन सुबह-सुबह वापस लौटने का टिकट कटा था। अतः दूसरे दिन भी दर्शन संभव नहीं था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। थोड़े सोच-विचार के बाद हमने विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट लेने का निर्णय लिया। दक्षिण के मंदिरों में विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट द्वारा तत्काल दर्शन की बड़ी अच्छी व्यवस्था है। हमने विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट खिड़की खोजने का प्रयास किया। पर असफल रहे। लोगों से पूछना चाहा। पर भाषा की समस्या सामने आ गई। हिंदी और अँग्रेजी में लोगों से मदद लेने का असफल प्रयास किया। कोई लाभ नहीं हुआ।
मंदिर के वास्तुकला से मैं बहुत प्रभावित थी। भव्य, नक़्क़ाशीदार दीवारें, विशाल मंदिर, चट्टानों की ऊँची -ऊँची सीढ़ियाँ और खंभे सब अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। यह मंदिर मदुरै से आठ किलोमीटर दूर है। इसे थिरुप्परमकुनरम मुरुगन मंदिर भी कहते हैं। भगवान मुरूगन के साथ-साथ भगवान शिव , भगवान विष्णु , भगवान विनायक और देवी दुर्गा भी यहाँ स्थापित हैं। पौराणिक कथा या किवदंती है कि इस स्थान पर भगवान मुरुगा ने देवराज इंद्र की पुत्री देवयानी से विवाह किया था।

हमलोग निराश होने लगे। लगा, बिना दर्शन के वापस लौटना होगा। तभी थोड़े उम्रदराज, पुजारी जैसे लगाने वाले एक व्यक्ति हमारे पास आए। वे अपनी भाषा में कुछ कह रहे थे। पर हमें कुछ समझ नहीं आया। हमने हिंदी और अँग्रेजी में उनसे विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट पाने का स्थान पूछा। पर वे हमारी बात नहीं समझ सके। किसी तरह हम इशारे से यह समझाने में सफल हुए कि हम मंदिर में दर्शन करना चाहते है। उन्होने हम सभी को अपने पीछे आने का इशारा किया और तत्काल अपने साथ मंदिर के अंदर ले गए। सभी ने उन्हे और हम सभी को तुरंत अंदर जाने का मार्ग दिया। मंदिर के गर्भगृह के सभी पुजारियों ने उन्हे बड़े सम्मान से प्रणाम किया और हमें दर्शन कराया। वे शायद वहाँ के सम्मानीय और महत्वपूर्ण पुजारी थे।
गर्भगृह से बाहर आ कर उन्होने एक जगह बैठने का इशारा किया। थोड़े देर में वे फूल, माला और प्रसाद के साथ लौटे। हमें बड़े प्यार से टीका लगाया और प्रसाद दिया। हम हैरान थे। एक प्रतिष्ठित और उच्च पदासीन पुजारी हम अनजान लोगों की इतनी सहायता क्यों कर रहे हैं? हमे लगा अब पुजारी जी अच्छी दक्षिणा की मांग करेंगे।
अतः मेरे पति अधर ने उन्हे कुछ रुपये देना चाहा। पर उन्होने लेने से इंकार कर दिया। हमारे बार-बार अनुरोध पर सामान्य सी धन राशि दक्षिणा स्वरूप ली।
इस घटना ने हमे पुजारी और ईश्वर की लीला के सामने नत मस्तक कर दिया। हम सभी एक अजनबी शहर के अजनबी पुजारी के सौजन्य की यादों के साथ वापस लौटे।

कामख्या मंदिर – (यात्रा संस्मरण और पौराणिक कथायें )

मंदिर की खूबसूरत नक्कासी
मंदिर की खूबसूरत नक्कासी

                                                                  क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः |

दिनांक – 9.2.2015, मंगलवार। समय संध्या 4:15
आसाम का गौहाटी शहर विख्यात कामख्या मंदिर के लिए जाना जाता है। यह एक शक्ति पीठ है। यह मंदिर वर्तमान कामरूप जिला में स्थित है। माँ कामख्या आदिशक्ति और शक्तिशाली तांत्रिक देवी के रूप में जानी जाती हैं। इन्हे माँ काली और तारा का मिश्रित रूप माना जाता है। इनकी साधना को कौल या शक्ति मार्ग कहा जाता है। यहाँ साधू-संत, अघोरी विभिन्न प्रकार की साधना करते हैं।

आसाम को प्राचीन समय में कामरूप देश या कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना जाता था। यह तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। प्राचीन काल में ऐसी मान्यता थी कि कामरूप- कामाख्या के सिद्ध लोग मनमोहिनी मंत्र तथा वशीकरण मंत्र आदि जानते है। जिस के प्रभाव से किसी को भी मोहित या वशीभूत कर सकते थे।
वशीकरण मंत्र —

                      ॐ नमो कामाक्षी देवी आमुकी मे वंशम कुरुकुरु स्वाहा|

गौहाटी सड़क मार्ग, रेल और वायुयान से पहुँचा जा सकता है। गौहाटी के पश्चिम में निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत पर यह मंदिर स्थित है। यह समुद्र से लगभग 800 फीट की ऊंचाई पर है। गौहाटी शहर से मंदिर आठ किलोमीटर की दूरी पर पर्वत पर स्थित है। मंदिर तक सड़क मार्ग है।

वास्तु शिल्प – ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण 8वीं सदी में हुआ था। तब से 17वीं सदी तक अनेकों बार पुनर्निर्माण होता रहा। मंदिर आज जिस रूप में मौजूद है। उसे 17वीं सदी में कुच बिहार के राजा नर नारायण ने पुनर्निमित करवाया था। मंदिर के वास्तु शिल्प को निलांचल प्रकार माना जाता है। मंदिर का निर्माण लंबाई में है। इसमें पूर्व से पश्चिम, चार कक्ष बने हैं। जिसमें एक गर्भगृह तथा तीन अन्य कक्ष हैं।

मंदिर की खूबसूरत नक्कासी
मंदिर की खूबसूरत नक्कासी

ये कक्ष और मंदिर बड़े-बड़े शिला खंडों से निर्मित है तथा मोटे-मोटे, ऊँचे स्तंभों पर टिकें हैं। मंदिर की दीवारों पर अनेकों आकृतियाँ निर्मित हैं। मंदिर के अंदर की दीवारें वक्त के थपेड़ों और अगरबत्तियों के धुएँ से काली पड़ चुकी हैं। तीन कक्षों से गुजर कर गर्भ गृह का मार्ग है। मंदिर का गर्भ -गृह जमीन की सतह से नीचे है। पत्थर की संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों से नीचे उतर कर एक छोटी प्रकृतिक गुफा के रूप में मंदिर का गर्भ-गृह है। यहाँ की दीवारें और ऊंची छतें अंधेरे में डूबी कालिमायुक्त है।

इस मंदिर में देवी की प्रतिमा नहीं है। वरन पत्थर पर योनि आकृति है। यहाँ पर साथ में एक छोटा प्रकृतिक झरना है। यह प्रकृतिक जल श्रोत इस आकृति को गीली रखती है। माँ कामाख्या का पूजन स्थल पुष्प, सिंदूर और चुनरी से ढका होता है। उसके पास के स्थल/ पीठ को स्पर्श कर, वहाँ के जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

उसके बगल में माँ लक्ष्मी तथा माँ सरस्वती का स्थान/ पीठ है। यहाँ बड़े-बड़े दीपक जलते रहते हैं। गर्भगृह से ऊपर, बाहर आने पर सामने अन्नपूर्णा कक्ष है। जहाँ भोग प्रसाद बनता है। मंदिर के बाहर के पत्थरों पर विभिन्न सुंदर आकृतियाँ बनी हैं। मंदिर का शिखर गोलाकार है। यह शिखर मधुमक्खी के गोल छत्ते के समान बना है।

मधुमक्खी के छट्टे  की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे  की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज

बाहर निकाल कर अगरबत्ती व दीपक जलाने का स्थान बना है। थोड़ा आगे नारियाल तोड़ने का स्थान भी निर्दिष्ट है। पास के एक वृक्ष पर लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए धागा लपेटते हैं। मंदिर परिसार में अनेक बंदर है। जो हमेशा प्रसाद झपटने के लिए तैयार रहते है। अतः इनसे सावधान रहने की जरूरत है।

किंवदंतियां- मंदिर और देवी से संबंधित इस जगह की उत्पत्ति और महत्व पर कई किंवदंतियां हैं।

1) एक प्रसिद्ध कथा शक्तिपीठ से संबंधित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ सती की योनि गिरी थी। जो सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति का प्रतीक है। सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। सती के पिता ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। पर यज्ञ के लिए शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया था। फलतः सती ने अपमानित महसूस किया और सती ने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी।

इस से व्यथित, विछिप्त शिव ने यज्ञ कुंड से सती के मृत शरीर को उठा लिया। सती के मृत शरीर को ले कर वे अशांत भटकने लगे। शिव सति के मृत देह को अपने कन्धे पर उठा ताण्डव नृत्य करने लगे। फ़लस्वरुप पृथ्वी विध्वंस होने लगी। समस्त देवता डर कर ब्रम्हा और विष्णु के पास गये और उनसे समस्त संसार के रक्षा की प्रार्थन की। विष्णु ने शिव को शांत करने के उद्देश्य से अपने चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित कर दिया। फलतः सती के शरीर के अंग भारत उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिर गए। शरीर के अंग जहां भी गिरे उन स्थानों पर विभिन्न रूपों में देवी की पूजा के केंद्र बन गए और शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे 51 पवित्र शक्तिपीठ हैं। कामाख्या उनमें से एक है। संस्कृत में रचित कलिका पुराण के अनुसार कामाख्या देवी सारी मनोकामनाओं को पूरा करनेवाली और मुक्ति दात्री शिव वधू हैं।

                      कामाक्षे काम सम्मपने कमेश्वरी हरी प्रिया,
                    कामनाम देही मे नित्यम कामेश्वरी नामोस्तुते||

अंबुवासी पूजा- मान्यता है कि आषाढ़ / जून माह में देवी तीन दिन मासिक धर्म अवस्था में होती हैं। अतः मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन मंदिर सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति के उपासना उत्सव के रूप में धूम धाम से खुलता है।मान्यता है कि इस समय कामाख्या के पास ब्रह्मपुत्र नदी लाल हो जाती है।

2) एक अन्य किवदंती के अनुसार असुर नरका कमख्या देवी से विवाह करना चाहता था। देवी ने नरकासुर को एक अति कठिन कार्य सौपते हुए कहा कि अगर वह एक रात्रि में निलांचल पर्वत पर उनका एक मंदिर बना दे तथा वहाँ तक सीढियों का निर्माण कर दे। तब वे उससे विवाह के लिए तैयार हैं। दरअसल किसी देवी का दानव से विवाह असंभव था। अतः देवी ने यह कठिन शर्त रखी। पर नरकासुर द्वारा इस असंभव कार्य को लगभग पूरा करते देख देवी घबरा गई। तब देवी ने मुर्गे के असमय बाग से उसे भ्रमित कर दिया। नरकासुर ने समझा सवेरा हो गया है और उसने निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया और शर्त हार गया। नरकासुर द्वारा बना अधूरा मार्ग आज मेखला पथ के रूप में जाना जाता है।

3)एक मान्यता यह भी है कि निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत शिव और सती का प्रेमस्थल है। देवी कामाख्या सृष्टि, जीवन रचना और प्रेम की देवी है और यह उनका प्रेम / काम का स्थान रहा है। अतः इस कामाख्या कहा गया है।

4) एक कहानी के अनुसार कामदेव श्राप ग्रस्त हो कर अपनी समस्त काम शक्ति खो बैठे। तब वे इस स्थान पर देवी के गर्भ से पुनः उत्पन्न हो शापमुक्त हुए।

5)एक कथा संसार के रचनाकार और सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा से संबन्धित है। इस कहानी के अनुसार देवी कामाख्या ने एक बार ब्रह्मा से पूछा कि क्या वे शरीर के बिना जीवन रचना कर सकते हैं। ब्रह्मा ने एक ज्योति पुंज उत्पन्न किया। जिसके मध्य में योनि आकृति थी। यह ज्योति पुंज जहाँ स्थापित हुई उस स्थान को कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना गया।

6) एक अन्य मान्यतानुसार माँ काली के दस अवतार अर्थात दस महाविद्या देवी इसी पर्वत पर स्थित है। इसलिए यह साधना और सिद्धी के लिए उपयुक्त शक्तिशाली स्थान माना जाता है। ये दस महाविद्या देवियाँ निम्नलिखित हैं– भुवनेश्वरी, बगलामुखी, छिन्मस्ता, त्रिपुरसुंदरी, तारा, घंटकर्ण, भैरवी, धूमवती, मातांगी व कमला।

                                       कामख्ये वरदे देवी नीलपर्वतवासिनी,
                                     त्वं देवी जगत्म मातर्योनिमुद्रे नामोस्तुते ||

मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती

हुगली की उल्टी धार और डॉलफिन ( यात्रा अनुभव )

कोलकाता के प्रवास के दौरान एक ऐसे होटल में रुकने का अवसर मिला जो हुगली नदी पर है। यह होटल दावा करता है, कि यह भारत भर में नदी पर बना अकेला होटल है। यह वास्तव में अनोखा होटल है। इसमें रहने का अपना मज़ा है। सबसे ख़ास बात है हुगली के पल-पल बदलते रंग को इतने निकट से देखने का अवसर मिलता है। यह होटल हुगली नदी के बीच जहाज के रूप में बना है। इसलिए दिन और रात हर समय नदी को करीब से देखा जा सकता है।
सुबह की लालिमा, जाल लगाते मछुआरे, दिन भर चलती छोटी-बड़ी नावों को देखने का आनंद लाजवाब है। कभी-कभी साधारण नावों और जहाजों के बीच चमचमाता आधुनिक स्टीमार तेज़ गति से इन्हे पीछे छोड़ता तेज़ी से गुजर जाता है। नदी में थोड़ी-थोड़ी दूर पर जेट्टी या घाट बने हैं। जहां से यात्री जहाज चलते रहते हैं। कोलकाता में नाव और जल जहाज यातायात के महत्वपूर्ण साधन है।जो सस्ती और सुविधाजनक है।
इस होटल से नया और पुराना दोनों हावड़ा पुल नज़र आता है। दूर, नदी के दूसरे किनारे पर हावड़ा रेलवे-स्टेशन नज़र आता है। नदी के दूसरे तट पर मंदिर और अनेकों जेट्टी/ घाट नज़र आते हैं। यहाँ रात का एक अलग मनमोहक नज़ारा होता है। बहुत से नाव, जहाज और बजरे सजे-धजे, रंगीन रौशनी से नहाए इधर-उधर पानी पर तैरते दिखते हैं। ये पर्यटकों से भरे होते हैं। एक जहाज तो जलपरी के आकार और सजावट वाला है।
इस चहल-पहल को देखने की चाहत में एक और दुर्लभ चीज़ नज़र आई। वह है हुगली/ गंगा डॉलफिन। मेरी छोटी पुत्री चाँदनी ने फोन पर मुझसे कहा था कि गंगा में डॉलफिनें हैं। पर मुझे वे नज़र नहीं आई थीं। इस होटल में रहने के दौरान मैंने अनेक बार डॉलफिनों को देखा। गंगा की डॉलफिनें शायद थोड़ी शर्मीली हैं। वे जल सतह पर कम समय के लिए आ कर तुरंत ही डुबकी लगा लेती हैं। अक्सर वे पानी की सतह पर तभी दिखती हैं जब पानी साफ-सुथरा हो। शायद गंदगी से उन्हें भी घुटन होती है।
इस होटल में रुक कर एक अजीब नज़ारा हुगली नदी में देखने को मिला। हुगली नदी बड़ी विशाल है। अक्सर इसकी सतह पर कुछ न कुछ कचरा तैरता नज़र आ जाता है। पर यह नदी चौड़े पाट में बड़ी शांति से कुड़े-कचरे के बोझ को लिए बहते रहती है। जल प्रवाह बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित होती रहती है। पर अचानक मैंने देखा कि जल प्रवाह उल्टी दिशा में होने लगा। अर्थात गंगा (हुगली) उल्टी बहने लगी। गंगा उल्टी बहना मुहावरे में जरूर कहा जाता है, पर वास्तव में ऐसा देख कर हैरानी होने लगी। लोगों के बताया कि यहाँ ऐसा अक्सर होता है। साथ ही नदी का जल स्तर या पानी का उतरना चढ़ना होता रहता है। दरअसल समुद्र यहाँ से बिलकुल करीब है। अतः यह समुद्र के ज्वार-भाटा का असर है। पर यह दृश्य मेरे लिए किसी अजूबे से कम नहीं था। इस उल्टी धार में सारे कुड़े कर्कट पानी के साथ वापस आने लगा। शायद समुद्र इन्हे लौटा रहा था। काश हम सब इस इशारे को समझ नदी और जल जीवों की मदद कर सकें।

गंगासागर -एक यात्रा गंगा की सागर तक (यात्रा संस्मरण और पौराणिक कथाएँ )

15 फरवरी, रविवार, 2015,
कोलकाता से सुबह लगभग आठ बजे हम सब कार से गंगासागर जाने के लिए निकले। यह यात्रा हमारे मित्र श्री राहुल पवार और उनकी पत्नी श्रीमती सीमा पवार के सौजन्य से संभव हुआ। उन्होने यह कार्यक्रम पहले से बना रखा था। उनके आमंत्रण पर अधर और मैंने उनके साथ अपना कार्यक्रम बना लिया। यह दूरी रेल या बस द्वारा भी तय किया जा सकता है।
गंगासागर या सागरदीप गंगा नदी और बंगाल की खाड़ी का मिलन स्थल है। यह पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में पड़ता है। गंगासागर वास्तव में एक टापू है। जो गंगा नदी के मुहाने पर है। यहाँ काफी आबादी है। यह पूरी तरह से ग्रामीण इलाका है। यहाँ की भाषा बंगला है। यहाँ पर रहने के लिए होटल मिलते है। साथ ही विभिन्न मतों के अनेकों आश्रम भी है। गंगासागर एक पवित्र धार्मिक स्थल है। जहां मकर संक्रांति के दिन 14 व 15 जनवरी को वृहत मेला लगता है। जिसमें लाखों लोग स्नान और पूजा करने आते हैं। ताकि उनके पाप धुल जाये और आशीर्वाद प्राप्त हो। यह एक पुण्यतीर्थ स्थान है।

हम सभी सड़क मार्ग से गंगासागर जाने के लिए कोलकाता से डायमंड हार्बर होते हुए लगभग 98 किलोमीटर दूर काकदीप पहुँचे। यहाँ से घाट या जेट्टी तक जाने का 10 मिनट का पैदल मार्ग है। जो बैट्री चालित कार या खुले ठेले पर बैठ कर भी पहुँचा जा सकता है। यहाँ गंगा / हुगली नदी को पार करना पड़ता है। काकदीप से पानी के जहाज़ के द्वारा आधे घंटे की यात्रा के बाद हम कचूबेरी घाट पहुँचे। जहाज का टिकिट मात्र आठ रुपए हैं। जहाज़ पर 30 मिनट की यह यात्रा बड़ी सुहावनी है। जल पक्षियों के झुंडों को देखने और दाना डालने में यह समय कब निकाल जाता है, पता ही नहीं चलता है। ये पक्षी भी अभ्यस्त है। दाना फेकते झुंड के झुंड पक्षी हवा में ही दाना पकड़ने के लिये झपटते हैं। बड़ा मनमोहक दृश्य होता है। इन जहाजों का आवागमन ज्वार-भाटे पर निर्भर करता है। ज्वार-भाटे के कारण जल धारा की दिशा बदलती रहती है। जब जल प्रवाह सही दिशा में होता है तभी ये जहाज़ परिचालित होते है। अन्यथा ये सही समय का इंतज़ार करते हैं।
कचूबेरी घाट पहुँच कर बस, कार या जुगाड़ से आगे की यात्रा की जा सकती है। यहाँ से गंगासागर / सागरद्वीप लगभग 32 किलोमीटर दूर है। बस वाले 20 रुपये प्रति व्यक्ति लेते है और पूरी टॅक्सी का किराया 5 से 6 सौ रुपये हैं। मार्ग में यहाँ के गाँव नज़र आते हैं। ये मिट्टी की झोपड़ियों और तालाबों वाले ठेठ बंगाली गांव होते है। सड़क के दोनों तरफ हरे-भरे खेत, नारियल के लंबे पेड़, बांस के झुरमुट और केले के पौधे लगे होते हैं। काफी जगहों पर पान की खेती भी नज़र आती है।
गंगासागर पहुँच कर कपिल मुनि का मंदिर नज़र आती है । सामने एक लंबी सड़क जल प्रवाह की ओर जाती है। जिसे पैदल या ठेले पर जाया जा सकता हैं। सड़क के दोनों ओर पूजन सामाग्री की दुकाने है। यहाँ पर भिक्षुक और धरमार्थियों की भीड़ दिखती है। साथ ही झुंड के झुंड कुत्ते दिखते है। दरअसल गंगासागर में स्नान और पूजन के बाद भिक्षुक को अन्न दान और कुत्तों को भोजन / बिस्कुट देने की प्रथा है।
गंगासागर पहुँचने पर दूर-दूर तक शांत जल दिखता है। यहाँ सागर का उद्दाम रूप या बड़ी-बड़ी लहरें नहीं दिखती है। शायद गंगा के जल के मिलन से यहाँ जल शांत और मटमैला दिखता है। पर दूर पानी का रंग हल्का नीला-हरा नीलमणि सा दिखता है। प्रकृतिक का सौंदर्य देख कर यात्रा सार्थक लगती है। लगता है, मानो गंगा के साथ-साथ हमने भी सागर तक की यात्रा कर ली हो।
हमलोगों ने जल में खड़े हो कर पूजा किया और प्रथा के अनुसार लौट कर मंदिर गए। मंदिर में मुख्य प्रतिमा माँ गंगा, कपिल मुनि तथा भागीरथी जी की है। ये प्रतिमाएँ चटकीले नारंगी / गेरुए रंग से रंगे हुए हैं। इस मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। इस मंदिर का निर्माण 1973 में हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि पहले के वास्तविक मंदिर समुद्र के जल सतह के बढ्ने से जल में समा गए है।
किवदंती-
1) ऐसा माना जाता है कि गंगासागर के इस स्थान पर कपिल मुनि का आश्रम था और मकर संक्रांति के दिन गंगा जी ने पृथ्वी पर अवतरित हो 60,000 सगर-पुत्रों कि आत्मा को मुक्ति प्रदान किया था।

 

ऐसी मान्यता है कि ऋषि-मुनियों के लिए गृहस्थ आश्रम या पारिवारिक जीवन वर्जित होता है। पर विष्णु जी के कहने पर कपिलमुनी के पिता कर्दम ऋषि ने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। पर उन्होने विष्णु भगवान से शर्त रखी कि ऐसे में भगवान विष्णु को उनके पुत्र रूप में जन्म लेंना होगा। भगवान विष्णु ने शर्त मान लिया और कपिलमुनी का जन्म हुआ। फलतः उन्हें विष्णु का अवतार माना गया। आगे चल कर गंगा और सागर के मिलन स्थल पर कपिल मुनि आश्रम बना कर तप करने लगे।
इस दौरान राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ आयोजित किया। इस के बाद यज्ञ के अश्वों को स्वतंत्र छोड़ा गया। ऐसी परिपाटी है कि ये जहाँ से गुजरते हैं वे राज्य अधीनता स्वीकार करते है। अश्व को रोकने वाले राजा को युद्ध करना पड़ता है। राजा सगर ने यज्ञ अश्वों के रक्षा के लिए उनके साथ अपने 60,000 हज़ार पुत्रों को भेजा।
अचानक यज्ञ अश्व गायब हो गए। खोजने पर यज्ञ अश्व कपिल मुनि के आश्रम में मिले। फलतः सगर पुत्र साधनरत ऋषि से नाराज़ हो उन्हे अपशब्द कहने लगे। ऋषि ने नाराज़ हो कर उन्हे शापित किया और उन सभी को अपने नेत्रों के तेज़ से भस्म कर दिया। मुनि के श्राप के कारण उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल सकी। काफी वर्षों के बाद राजा सगर के पौत्र राजा भागिरथ कपिल मुनि से माफी माँगने पहुँचे। कपिल मुनि राजा भागीरथ के व्यवहार से प्रसन्न हुए। उन्होने कहा कि गंगा जल से ही राजा सगर के 60,000 मृत पुत्रों का मोक्ष संभव है। राजा भागीरथ ने अपने अथक प्रयास और तप से गंगा को धरती पर उतारा। अपने पुरखों के भस्म स्थान पर गंगा को मकर संक्रांति के दिन लाकर उनकी आत्मा को मुक्ति और शांति दिलाई। यही स्थान गंगासागर कहलाया। इसलिए इस पर स्नान का इतना महत्व है।
कहतें है कि भगवान इंद्रा ने यज्ञ अश्वों को जान-बुझ कर पाताल लोक में छुपा दिया था। बाद में कपिल मुनि के आश्रम के पास छोड़ दिया। ऐसा उन्होने ने गंगा नदी को पृथ्वी पर अवतरित कराने के लिए किया था। पहले गंगा स्वर्ग की नदी थीं। इंद्र जानते थे कि गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने से अनेकों प्राणियों का भला होग।
*****

इस पवित्र तीर्थयात्रा से हम सभी लौट कर पास में त्रिय योग आश्रम गाए। यह उड़ीसा के जगन्नाथपूरी मंदिर के तर्ज़ पर कृष्ण सुभद्रा और बलराम का मंदिर है। साथ ही शिवलिंग भी स्थापित है। यहाँ हमें शुद्ध और सात्विक भोजन मिला। जिससे बड़ी तृप्ति मिली। इसके बाद हम रात ९ बजे तक कोलकाता वापस लौट आए। इस तरह से हमने एक महत्वपूर्ण तीर्थ यात्रा पूरी की। जिससे बड़ी आत्म संतुष्टी मिली। कहा जाता है –

                                        सब तीर्थ बार-बार, गंगासागर एक बार।

मैं गंगा…….( प्रदूषण )

मैं गंगा…….
मैं बहुत खुश हूँ। सागर से मिलने का समय आ रहा है। बड़ी दूर से, बड़ी देर से मैं इस समय का इंतज़ार कर रही हूँ। आज़ मैं उसके बहुत करीब हूँ। मेरे दिल में उठते ख़ुशी की तरंगों को तुम सब भी देख सकते हो। मेरे पास सागर से कहने की ढेरों बातें हैं। क्या बताऊँ, उससे क्या-क्या कहना है। पूरी जिंदगी उससे मिलने की अरमान में काटा है। बस अब वह पल आने ही वाला है। क्या तुम सब तक मेरी आवाज़ जा रही है? क्या तुम मेरी खुशी को मससूस कर सकते हो? मैं गंगा…….

अचानक ख्याल आ रहा है – सागर से मिलने से पहले अपने को सजा-सँवार तो लूँ। इतनी लंबी यात्रा में मैंने तो खुद की कोई सुध ही नहीं ली। दूसरों के लिए ही जीती रही। पर आज़ तो समय है सजने का। मैंने अपने विशाल और विस्तृत रूप पर नज़र डाला और मैं अवाक रह गई। यह क्या??? ऐसी तो तो मैं नहीं हूँ। यह काला- गंदला रंग मेरा तो नहीं है। ताजगी भरी, खिली-खिली, साफ- सुथरी, खिलखिलाती, जीवन से भरपूर मेरे रूप को क्या हो गया। सिर्फ गंदगी ही गंदगी है। बिखरे कूड़े, छहलाते कचरे, सड़े फूल पत्ते, विसर्जित प्रतिमाओं के अवशेष, शमशान घाट की गंदगी, प्लास्टिक की बोतलें और सामान, मिट्टी के खंडित पात्र, शैवाल-काई, सतह पर तैरते मृत अवशेष और ना जाने क्या-क्या है। तुम मुझे गंगा कहो या हुगली, पर मैं ऐसी तो नहीं थी।

किसने किया यह सब? तुम लोगों ने तो नहीं? नहीं- नहीं, तुम सब ऐसा नहीं कर सकते हो। तुम तो मुझे जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी माँ कहते हो। मेरी पवित्रता की कसमें खाते हो।

अब मैं क्या करूँ? किसकी सहायता लूँ? शाम हो रही है। सूरज से मेरा दुख देखा नहीं जा रहा है। आसमान में चमकते हुए सूरज ने मेरा दुख बाँटना चाहा। शाम होते ही बेचारे ने अपनी लालिमा मेरे जल पर बिखेर दिया। मेरे जल की कालिमा और मटमैलापल उसमें छुप गया है। पर अपने सीने पर फैले इस गंदगी का क्या करूँ? इस डूबते सूरज के अंधेरे में अपनी गंदगी छुपा कर सागर से मिलना होगा क्या? क्या सागर मेरे इस घृणित रूप के साथ मुझे स्वीकार करेगा? कोई तो मेरी मदद करो। क्या कोई मेरी आवाज़ सुन रहा है। मैं गंगा…….

एक नन्ही परी ( कन्या भ्रुण हत्या पर आधारित मार्मिक कहानी )

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विनीता सहाय गौर से कटघरे मे खड़े राम नरेश को देख रही थीं। पर उन्हे याद नहीं आ रहा था, इसे कहा देखा है? साफ रंग, बाल खिचड़ी और भोले चेहरे पर उम्र की थकान थी। साथ ही चेहरे पर उदासी की लकीरे थीं।वह कटघरे मे अपराधी की हैसियत से खड़ा था।वह आत्मविश्वासविहीन था।

लग रहा था जैसे उसे दुनिया से कोई मतलब ही नहीं था। वह जैसे अपना बचाव करना ही नहीं चाहता था।कंधे झुके थे।शरीर कमजोर था। वह एक गरीब और निरीह व्यक्ति था। लगता था जैसे बिना सुने और समझे हर गुनाह कबूल कर रहा था। ऐसा अपराधी तो उन्होंने आज तक नहीं देखा था। उसकी पथराई आखों मे अजीब सा सूनापन था, जैसे वे निर्जीव हों।

लगता था वह जानबूझ कर मौत की ओर कदम बढ़ा रहा था। जज़ साहिबा को लग रहा था- यह इंसान इतना निरीह है। यह किसी का कातिल नहीं हो सकता है।क्या इसे किसी ने झूठे केस मे फँसा दिया है? या पैसों के लालच मे झूठी गवाही दे रहा है?नीचे के कोर्ट से उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई थी।
विनीता सहाय ने जज़ बनने के समय मन ही मन निर्णय किया था कि कभी किसी निर्दोष और लाचार को सज़ा नहीं होने देंगी। झूठी गवाही से उन्हे सख़्त नफरत थी। अगर राम नरेश का व्यवहार ऐसा न होता तो शायद जज़ विनीता सहाय ने उसपर ध्यान भी न दिया होता।

दिन भर मे न-जाने कितने केस निपटाने होते है। ढेरों जजों, अपराधियों, गवाहों और वकीलों के भीड़ मे उनका समय कटता था। पर ऐसा दयनीय कातिल नहीं देखा था। कातिलों की आखों मे दिखनेवाला गिल्ट या आक्रोश कुछ भी तो नज़र नहीं आ रहा था। विनीता सहाय अतीत को टटोलने लगी। आखिर कौन है यह?कुछ याद नहीं आ रहा था।
विनीता सहाय शहर की जानी-मानी सम्माननीय हस्ती थीं।

गोरा रंग, छोटी पर सुडौल नासिका, ऊँचा कद, बड़ी-बड़ी आखेँ और आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व वाली विनीता सहाय अपने सही और निर्भीक फैसलो के लिए जानी जाती थीं। उम्र के साथ सफ़ेद होते बालों ने उन्हें और प्रभावशाली बना दिया था। उनकी बुद्धिदीप्त,चमकदार आँखें एक नज़र में ही अपराधी को पहचान जाती थीं। उन्हे सुप्रींम कोर्ट की पहली महिला जज़ होने का भी गौरव प्राप्त था। उनके न्याय-प्रिय फैसलों की चर्चा होती रहती थी।

पुरुषो के एकछत्र कोर्ट मे अपना करियर बनाने मे उन्हें बहुत तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। सबसे पहला युद्ध तो उन्हें अपने परिवार से लड़ना पड़ा था। वकालत करने की बात सुनकर घर मेँ तो जैसे भूचाल आ गया। माँ और बाबूजी से नाराजगी की तो उम्मीद थी, पर उन्हें अपने बड़े भाई की नाराजगी अजीब लगी। उन्हें पूरी आशा थी कि महिलाओं के हितों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले भैया तो उनका साथ जरूर देंगे। पर उन्हों ने ही सबसे ज्यादा हँगामा मचाया था।

तब विनी को सबसे हैरानी हुई, जब उम्र से लड़ती बूढ़ी दादी ने उसका साथ दिया। दादी उसे बड़े लाड़ से ‘नन्ही परी’ बुलाती थी। विनी रात मेँ दादी के पास ही सोती थी। अक्सर दादी कहानियां सुनाती थी। उस रात दादी ने कहानी तो नहीं सुनाई परगुरु मंत्र जरूर दिया। दादी ने रात के अंधेरे मे विनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- मेरी नन्ही परी, तु शिवाजी की तरह गरम भोजन बीच थाल से खाने की कोशिश कर रही है। जब भोजन बहुत गरम हो तो किनारे से फूक-फूक कर खाना चाहिए।

तु सभी को पहले अपनी एल एल बी की पढाई के लिए राजी कर। न कि अपनी वकालत के लिए। ईश्वर ने चाहा तो तेरी कामना जरूर पूरी होगी। विनी ने लाड़ से दादी के गले मे बाँहे डाल दी। फिर उसने दादी से पूछा- दादी तुम इतना मॉडर्न कैसे हो गई? दादी रोज़ सोते समय अपने नकली दाँतो को पानी के कटोरे मे रख देती थी। तब उनके गाल बिलकुल पिचक जाते थे और चेहरा झुरियों से भर जाता था।

विनी ने देखा दादी की झुरियों भरे चेहरेपर विषाद की रेखाएँ उभर आईं और वे बोल पडी-बिटिया, औरतों के साथ बड़ा अन्याय होता है। तु उनके साथ न्याय करेगी यह मुझे पता है। जज बन कर तेरे हाथों मेँ परियों वाली जादू की छड़ी भी तो आ जाएगी न। अपनी अनपढ़ दादी की ज्ञान भरी बाते सुन कर विनी हैरान थी। दादी के दिये गुरु मंत्र पर अमल करते हुए विनी ने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली। तब उसे लगा – अब तो मंज़िल करीब है।
पर तभी न जाने कहा से एक नई मुसीबत सामने आ गई। बाबूजी के पुराने मित्र शरण काका ने आ कर खबर दी। उनके किसी रिश्तेदार का पुत्र शहर मे ऊँचे पद पर तबादला हो कर आया है। क्वाटर मिलने तक उनके पास ही रह रहा है। होनहार लड़का है। परिवार भी अच्छा है। विनी के विवाह के लिए बड़ा उपयुक्त वर है। उसने विनी को शरण काका के घर आते-जाते देखा है। बातों से लगता है कि विनी उसे पसंद है। उसके माता-पिता भी कुछ दिनों के लिए आनेवाले है।

शरण काका रोज़ सुबह,एक हाथ मे छड़ी और दूसरे हाथ मे धोती थाम कर टहलने निकलते थे। अक्सर टहलना पूरा कर उसके घर आ जाते थे। सुबह की चाय के समय उनका आना विनी को हमेशा बड़ा अच्छा लगता था। वे दुनियां भर की कहानियां सुनाते। बहुत सी समझदारी की बातें समझाते।

पर आज़ विनी को उनका आना अखर गया। पढ़ाई पूरी हुई नहीं कि शादी की बात छेड़ दी। विनी की आँखें भर आईं। तभी शरण काका ने उसे पुकारा- ‘बिटिया, मेरे साथ मेरे घर तक चल। जरा यह तिलकुट का पैकेट घर तक पहुचा दे। हाथों मेँ बड़ा दर्द रहता है। तेरी माँ का दिया यह पैकेट उठाना भी भारी लग रहाहै।

बरसो पहले भाईदूज के दिन माँ को उदास देख कर उन्हों ने बाबूजी से पूछा था। भाई न होने का गम माँ को ही नही, बल्कि नाना-नानी को भी था। विनी अक्सर सोचती थी कि क्या एक बेटा होना इतना ज़रूरी है? उस भाईदूज से ही शरण काका ने माँ को मुहबोली बहन बना लिया था। माँ भी बहन के रिश्ते को निभाती, हर तीज त्योहार मे उन्हेंकुछ न कुछ भेजती रहती थी।आज का तिलकुट मकर संक्रांति का एडवांस उपहार था। अक्सर काका कहते- विनी की शादी मे मामा का नेग तो मुझे ही निभाना है।
शरण काका और काकी मिनी दीदी की शादी के बाद जब भी अकेलापन महसूस करते , तब उसे बुला लेते थे। अक्सर वे अम्मा- बाबूजी से कहते- मिनी और विनी दोनों मेरी बेटियां हैं। देखो दोनों का नाम भी कितना मिलता-जुलता है।जैसे सगी बहनों के नाम हो। शरण काका भी अजीब है। लोग बेटी के नाम से घबराते है। और काका का दिल ऐसा है, दूसरे की बेटी को भी अपना मानते है।

मिनी दीदी के शादी के समय विनी अपने परीक्षा मे व्यस्त थी। काकी उसके परीक्षा विभाग को रोज़ कोसती रहती। दीदी के हल्दी के एक दिन पहले तक परीक्षा थी। काकी कहती रहती थी- विनी को फुर्सत होता तो मेरा सारा काम संभाल लेती। ये कालेज वालों परीक्षा ले-ले कर लड़की की जान ले लेंगे। शांत और मृदुभाषी विनी उनकी लाड़ली थी।

वे हमेशा कहती रहती- ईश्वर ने विनी बिटिया को सूरत और सीरत दोनों दिया है।
आखरी पेपर दे कर विनी जल्दी-जल्दी दीदी के पास जा पहुची। उसे देखते काकी की तो जैसे जान मे जान आ गई। दीदी के सभी कामों की ज़िम्मेवारी उसे सौप कर काकी को बड़ी राहत महसूस हो रही थी। उन्होंने विनी के घर फोन कर ऐलान कर दिया कि विनी अब मिनी के विदाई के बाद ही घर वापस जाएगी।

शाम मे विनी दीदी के साथ बैठ कर उनका बक्सा ठीक कर रही थी, तब उसे ध्यान आया कि दीदी ने कॉस्मेटिक्स तो ख़रीदा ही नहीं है। मेहँदी की भी व्यवस्था नहीं है। वह काकी से बता कर भागी भागी बाज़ार से सारी ख़रीदारी कर लाई। विनी ने रात मे देर तक बैठ कर दीदी को मेहँदी लगाई। मेहँदी लगा कर जब हाथ धोने उठी तो उसे अपनी चप्पलें मिली ही नहीं। शायद किसी और ने पहन लिया होगा।

शादी के घर मे तो यह सब होता ही रहता है। घर मेहमानों से भरा था। बरामदे मे उसे किसी की चप्पल नज़र आई। वह उसे ही पहन कर बाथरूम की ओर बढ़ गई। रात मे वह दीदी के बगल मे रज़ाई मे दुबक गई। न जाने कब बाते करते-करते उसे नींद आ गई।
सुबह, जब वह गहरी नींद मे थी। किसी उसकी चोटी खींच कर झकझोर दिया।कोई तेज़ आवाज़ मे बोल रहा था- अच्छा, मिनी दीदी, तुम ने मेरी चप्पलें गायब की थी। हैरान विनी ने चेहरे पर से रज़ाई हटा कर अपरिचित चेहरे को देखा। उसकी आँखें अभी भी नींद से भरी थीं।

तभी मिनी दीदी खिलखिलाती हुई पीछे से आ गई। अतुल, यह विनी है। सहाय काका की बेटी और विनी यह अतुल है। मेरे छोटे चाचा का बेटा। हर समय हवा के घोड़े पर सवार रहता है। छोटे चाचा की तबीयत ठीक नहीं है। इसलिए छोटे चाचा और चाची नहीं आ सके तो उन्हों ने अतुल को भेज दिया। अतुल उसे निहारता रहा, फिर झेंपता हुआ बोला- “मुझे लगा, दीदी, तुम सो रही हो। दरअसल, मैं रात से ही अपनी चप्पलें खोज रहा था।“
विनी का को बड़ा गुस्सा आया। उसने दीदी से कहा- मेरी भी तो चप्पलें खो गई हैं। उस समय मुझे जो चप्पल नज़र आई मैं ने पहन लिया। मैंने इनकी चप्पलें पहनी है,किसी का खून तो नहीं किया । सुबह-सुबह नींद खराब कर दी। इतने ज़ोरों से झकझोरा है। सारी पीठ दर्द हो रही है। गुस्से मेँ वह मुंह तक रज़ाई खींच कर सो गई। अतुल हैरानी से देखता रह गया। फिर धीरे से दीदी से कहा- बाप रे, यह तो वकीलों की तरह जिरह करती है।

काकी एक बड़ा सा पैकेट ले कर विनी के पास पहुचीं और पूछने लगी – बिटिया देख मेरी साड़ी कैसी है? पीली चुनरी साड़ी पर लाल पाड़ बड़ी खूबसूरत लग रही थी। विनी हुलस कर बोल पड़ी- बड़ी सुंदर साड़ी है। पर काकी इसमे फॉल तो लगा ही नहीं है। हद करती हो काकी। सारी तैयारी कर ली हो और तुम्हारी ही साड़ी तैयार नहीं है। दो मै जल्दी से फॉल लगा देती हूँ।

विनी दीदी के पलंग पर बैठ कर फॉल लगाने मे मसगुल हो गई। काकी भी पलंग पर पैरों को ऊपर कर बैठ गई और अपने हाथों से अपने पैरों को दबाने लगी। विनी ने पूछा- काकी तुम्हारे पैर दबा दूँ क्या?वे बोलीं – बिटिया, एक साथ तू कितने काम करेगी? देख ना पूरे काम पड़े है और अभी से मैं थक गई हूँ। साँवली -सलोनी काकी के पैर उनकी गोल-मटोल काया को संभालते हुए थक जाए, यह स्वाभाविक ही है। छोटे कद की काकी के लालट पर बड़ी सी गोल लाल बिंदी विनी को बड़ी प्यारी लगती थी।विनी को काकी भी उसी बिंदी जैसी गोल-मटोल लगती थीं।

तभी मिनी दीदी की चुनरी मे गोटा और किरण लगा कर छोटी बुआ आ पहुचीं। देखो भाभी, बड़ी सुंदर बनी है चुनरी। फैला कर देखो ना- छोटीबुआ कहने लगी। पूरे पलंग पर सामान बिखरा था। काकी ने विनी की ओर इशारा करते हुई कहा- इसके ऊपर ही डाल कर दिखाओ छोटी मईयां।

सिर झुकाये फॉल लगाती विनी के ऊपर लाल चुनरी बुआ ने फैला दिया। चुनरी सचमुच बड़ी सुंदर बनी थी। काकी बोल पड़ी- देख तो विनी पर कितना खिल रहा है यह रंग।विनी की नज़रें अपने-आप ही सामने रखे ड्रेसिंग टेबल के शीशे मे दिख रहे अपने चेहरे पर पड़ी। उसका चेहरा गुलाबी पड़ गया। उसे अपना ही चेहरा बड़ा सलोना लगा।

तभी अचानक किसी ने उसके पीठ पर मुक्के जड़ दिये- “ तुम अभी से दुल्हन बन कर बैठ गई हो दीदी” अतुल की आवाज़ आई। वह सामने आ कर खड़ा हो गया। अपलक कुछ पल उसे देखता रह गया। विनी की आँखों मेँ आंसू आ गए थे। अचानक हुए मुक्केबाज़ी के हमले से सुई उसकी उंगली मे चुभ गई थी। उंगली के पोर पर खून की बूँद छलक आई थी।

अतुल बुरी तरह हड्बड़ा गया। बड़ी अम्मा, मैं पहचान नहीं पाया था। मुझे क्या मालूम था कि दीदी के बदले किसी और को दुल्हन बनने की जल्दी है। पर मुझ से गलती हो गई- वह काकी से बोल पड़ा। फिर विनी की ओर देख कर ना जाने कितनी बार सॉरी-सॉरी बोलता चला गया। तब तक मिनी दीदी भी आ गई थी।

विनी की आँखों मेँ आंसू देख कर सारा माजरा समझ कर, उसे बहलाते हुए बोली- “अतुल, तुम्हें इस बार सज़ा दी जाएगी।“ बता विनी इसे क्या सज़ा दी जाए? विनी ने पूछा- इनकी नज़रे कमजोर है क्या? अब इनसे कहो सभी के पैर दबाये। यह कह कर विनी साड़ी समेट कर, पैर पटकती हुई काकी के कमरे मे जा कर फॉल लगाने लगी।

अतुल सचमुच काकी के पैर दबाने लगा, और बोला- वाह! क्या बढ़िया फैसला है जज़ साहिबा का। बड़ी अम्मा, देखो मैं हुक्म का पालन कर रहा हूँ। “तू भी हर समय उसे क्यों परेशान करता रहता है अतुल?”-मिनी दीदी की आवाज़ विनी को सुनाई दी। दीदी, इस बार भी मेरी गलती नहीं थी- अतुल सफाई दे रहा था।

फॉल का काम पूरा कर विनी हल्दी के रस्म की तैयारी मेँ लगी थी। बड़े से थाल मे हल्दी मंडप मे रख रही थी। तभी मिनी दीदी ने उसे आवाज़ दी। विनी उनके कमरे मे पहुचीं। दीदी के हाथों मे बड़े सुंदर झुमके थे। दीदी ने झुमके दिखाते हुए पूछा- ये कैसे है विनी? मैं तेरे लिए लाई हूँ। आज पहन लेना। मैं ये सब नही पहनती दीदी- विनी झल्ला उठी। सभी को मालूम है कि विनी को गहनों से बिलकुल लगाव नहीं है। फिर दीदी क्यों परेशान कर रही है? पर दीदी और काकी तो पीछे ही पड़ गई।

दीदी ने जबर्दस्ती उसके हाथों मेँ झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके ड्रेसिंग टेबल पर पटक दिये। फिसलता हुआ झुमका फर्श पर गिरा और दरवाज़े तक चला गया।तुनकते हुए विनी तेज़ी से पलट कर बाहर जाने लगी। उसने ध्यान ही नहीं दिया था कि दरवाजे पर खड़ा अतुल ये सारी बातें सुन रहा था। तेज़ी से बाहर निकालने की कोशिश मे वह सीधे अतुल से जा टकराई। उसके दोनों हाथों में लगी हल्दी के छाप अतुल के सफ़ेद टी-शर्ट पर उभर आए।

वह हल्दी के दाग को हथेलियों से साफ करने की कोशिश करने लगी। पर हल्दी के दाग और भी फैलने लगे। अतुल ने उसकी दोनों कलाइयां पकड़ ली और बोल पड़ा- यह हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। ऐसे तो यह और फ़ैल जाएगा। आप रहने दीजिये। विनी झेंपती हुई हाथ धोने चली गई।

बड़े धूम-धाम से दीदी की शादी हो गई। दीदी की विदाई होते ही विनी को अम्मा के साथ दिल्ली जाना पड़ा। कुछ दिनों से अम्मा की तबियत ठीक नहीं चल रही थी। डाक्टरों ने जल्दी से जल्दी दिल्ली ले जा कर हार्ट चेक-अप का सुझाव दिया था। मिनी दीदी के शादी के ठीक बाद दिल्ली जाने का प्लान बना था। दीदी की विदाई वाली शाम का टिकट मिल पाया था।
***
एक शाम अचानक शरण काका ने आ कर खबर दिया। विनी को देखने लड़केवाले अभी कुछ देर मे आना चाहते हैं। घर मे जैसे उत्साह की लहर दौड़ गई। पर विनी बड़ी परेशान थी। ना-जाने किसके गले बांध दिया जाएगा?

उसके भविष्य के सारे अरमान धरे के धरे रह जाएगे। अम्मा उसे तैयार होने कह कर किचेन मे चली गईं। तभी मालूम हुआ कि लड़का और उसके परिवारवाले आ गए है। बाबूजी, काका और काकी उन सब के साथ ड्राइंग रूम मेँ बातें कर रहे थे। अम्मा उसे तैयार न होते देख कर, आईने के सामने बैठा कर उसके बाल संवारे। अपने अलमारी से झुमके निकाल कर दिये। विनी झुंझलाई बैठी रही।

अम्मा ने जबर्दस्ती उसके हाथों मे झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके पटक दिये। एक झुमका फिसलता हुआ ड्राइंग रूम के दरवाजे तक चला गया। ड्राइंग-रूम उसके कमरे से लगा हुआ था।
परेशान अम्मा उसे वैसे ही अपने साथ ले कर बाहर आ गईं। विनी अम्मा के साथ नज़रे नीची किए हुए ड्राइंग-रूम मेँ जा पहुची। वह सोंच मे डूबी थी कि कैसे इस शादी को टाला जाए। काकी ने उसे एक सोफ़े पर बैठा दिया। तभी बगल से किसी की ने धीरे से पूछा- आज किसका गुस्सा झुमके पर उतार रही थी? आश्चर्यचकित नज़रों से विनी ने ऊपर देखा। उसने फिर कहा- मैं ने कहा था न, हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। सामने अतुल बैठा था।

अतुल और उसके माता-पिता के जाने के बाद काका ने उसे बुलाया। बड़े बेमन से कुछ सोंचती हुई वह काका के साथ चलने लगी। गेट से बाहर निकलते ही काका ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “विनी, मैं तेरी उदासी समझ रहा हूँ। बिटिया, अतुल बहुत समझदार लड़का है। मैंने अतुल को तेरे सपने के बारे मेँ बता दिया है। तू किसी तरह की चिंता मत कर। मुझ पर भरोसा कर बेटा।

काका ने ठीक कहा था। वह आज़ जहाँ पंहुची है। वह सिर्फ अतुल के सहयोग से ही संभव हो पाया था। अतुल आज़ भी अक्सर मज़ाक मेँ कहते हैं –“मैं तो पहली भेंट मेँ ही जज़ साहिबा की योग्यता पहचान गया था।“ उसकी शादी मेँ सचमुच शरण काका ने मामा होने का दायित्व पूरे ईमानदारी से निभाया था। पर वह उन्हें मामा नहीं, काका ही बुलाती थी। बचपन की आदत वह बादल नहीं पाई थी।
***
कोर्ट का कोलाहल विनीता सहाय को अतीत से बाहर खींच लाया। पर वे अभी भी सोच रही थीं – इसे कहाँ देखा है। दोनों पक्षों के वकीलों की बहस समाप्त हो चुकी थी। राम नरेश के गुनाह साबित हो चुके थे। वह एक भयानक कातिल था। उसने इकरारे जुर्म भी कर लिया था।

उसने बड़ी बेरहमी से हत्या की थी। एक सोची समझी साजिश के तहत उसने अपने दामाद की हत्या कर शव का चेहरा बुरी तरह कुचल दिया था और शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर जंगल मे फेंक दिया था। वकील ने बताया कि राम नरेश का अपराधिक इतिहास है। वह एक क्रूर कातिल है।

पहले भी वह कत्ल का दोषी पाया गया था। पर सबूतों के आभाव मे छूट गया था। इसलिए इस बार उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। वकील ने पुराने केस की फाइल उनकी ओर बढ़ाई। फ़ाइल खोलते ही उनके नज़रों के सामने सब कुछ साफ हो गया। सारी बातें चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूमने लगी।

लगभग बाईस वर्ष पहले राम नरेश को कोर्ट लाया गया था। उसने अपनी दूध मुहीं बेटी की हत्या कर दी थी। तब विनीता सहाय वकील हुआ करती थी। ‘कन्या-भ्रूण-हत्या’ और ‘बालिका-हत्या’ जैसे मामले उन्हें आक्रोश से भर देते थे। माता-पिता और समाज द्वारा बेटे-बेटियों में किए जा रहे भेद-भाव उन्हें असह्य लगते थे।

तब विनीता सहाय ने रामनरेश के जुर्म को साबित करने के लिए एड़ी चोटी की ज़ोर लगा दी थी। उस गाँव मेँ अक्सर बेटियों को जन्म लेते ही मार डाला जाता था। इसलिए किसी ने राम नरेश के खिलाफ गवाही नहीं दी। लंबे समय तक केस चलने के बाद भी जुर्म साबित नहीं हुआ।

इस लिए कोर्ट ने राम नरेश को बरी कर दिया था। आज वही मुजरिम दूसरे खून के आरोप में लाया गया था। विनीता सहाय ने मन ही मन सोचा- ‘काश, तभी इसे सज़ा मिली होती। इतना सीधा- सरल दिखने वाला व्यक्ति दो-दो कत्ल कर सकता है? इस बार वे उसे कड़ी सज़ा देंगी।

जज साहिबा ने राम नरेश से पूछा- ‘क्या तुम्हें अपनी सफाई मे कुछ कहना है?’ राम नरेश के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान खेलने लगी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा – “हाँ हुज़ूर, मुझे आप से बहुत कुछ कहना है। मैं आप लोगों जैसा पढ़ा- लिखा और समझदार तो नहीं हूँ। पता नहीं आपलोग मेरी बात समझेगें या नहीं। पर आप मुझे यह बताइये कि अगर कोई मेरी परी बिटिया को जला कर मार डाले और कानून से भी अपने को बचा ले। तब क्या उसे मार डालना अपराध है?”

मेरी बेटी को उसके पति ने दहेज के लिए जला दिया था। मरने से पहले मेरी बेटी ने अपना आखरी बयान दिया था, कि कैसे मेरी फूल जैसी सुंदर बेटी को उसके पति ने जला दिया। पर वह पुलिस और कानून से बच निकला। इस लिए उसे मैंने अपने हाथों से सज़ा दिया। मेरे जैसा कमजोर पिता और कर ही क्या सकता है? मुझे अपने किए गुनाह का कोई अफसोस नहीं है।

उसका चेहरा मासूम लग रहा था। उसकी बूढ़ी आँखों मेँ आंसू चमक रहे थे, पर चेहरे पर संतोष झलक रहा था। वह जज साहिबा की ओर मुखातिब हुआ-“ हुज़ूर, क्या आपको याद है? आज़ से बाईस वर्ष पहले जब मैं ने अपनी बड़ी बेटी को जन्म लेते मार डाला था, तब आप मुझे सज़ा दिलवाना चाहती थीं।

आपने तब मुझे बहुत भला-बुरा कहा था। आपने कहा था- बेटियां अनमोल होती हैं। उसे मार कर मैंने जघन्य पाप किया है।“

आप की बातों ने मेरी रातो की नींद और दिन का चैन ख़त्म कर दिया था। इसलिए जब मेरी दूसरी बेटी का जन्म हुआ तब मुझे लगा कि ईश्वर ने मुझे भूल सुधारने के मौका दिया है। मैंने प्रयश्चित करना चाहा। उसका नाम मैंने परी रखा। बड़े जतन और लाड़ से मैंने उसे पाला।

अपनी हैसियत के अनुसार उसे पढ़ाया और लिखाया। वह मेरी जान थी। मैंने निश्चय किया कि उसे दुनिया की हर खुशी दूंगा। मै हर दिन मन ही मन आपको आशीष देता कि आपने मुझे ‘पुत्री-सुख’ से वंचित होने से बचा लिया। मेरी परी बड़ी प्यारी, सुंदर, होनहार और समझदार थी। मैंने उसकी शादी बड़े अरमानों से किया। अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी।

मित्रो और रिश्तेदारों से उधार ली। किसी तरह की कमी नहीं की। पर दुनिया ने उसके साथ वही किया जो मैंने बाईस साल पहले अपनी बड़ी बेटी के साथ किया था। उसे मार डाला। तब सिर्फ मैं दोषी क्यों हूँ? मुझे खुशी है कि मेरी बड़ी बेटी को इस क्रूर दुनिया के दुखों और भेद-भाव को सहना नहीं पड़ा। जबकि छोटी बेटी को समाज ने हर वह दुख दिया जो एक कमजोर पिता की पुत्री को झेलना पड़ता है। ऐसे मेँ सज़ा किसे मिलनी चाहिए? मुझे सज़ा मिलनी चाहिए या इस समाज को?

अब आप बताइये कि बेटियोंको पाल पोस कर बड़ा करने से क्या फायदा है? पल-पल तिल-तिल कर मरने से अच्छा नहीं है कि वे जन्म लेते ही इस दुनिया को छोड़ दे। कम से कम वे जिंदगी की तमाम तकलीफ़ों को झेलने से तों बच जाएगीं। मेरे जैसे कमजोर पिता की बेटियों का भविष्य ऐसा ही होता है।

उन्हे जिंदगी के हर कदम पर दुख-दर्द झेलने पड़ते है। काश मैंने अपनी छोटी बेटी को भी जन्म लेते मार दिया होता। आप मुझे बताइये, क्या कहीं ऐसी दुनिया हैं जहाँ जन्म लेने वाली ये नन्ही परियां बिना भेद-भाव के एक सुखद जीवन जी सकें? आप मुझे दोषी मानती हैं। पर मैं इस समाज को दोषी मानता हूँ। क्या कोई अपने बच्चे को इसलिए पालता है कि यह नतीजा देखने को मिले? या समाज हमेँ कमजोर होने की सज़ा दे रहा है? क्या सही है और क्या गलत, आप मुझे बताइये।

विनीता सहाय अवाक थी। मुक नज़रो से राम नरेश के लाचार –कमजोर चेहरे को देख रही थीं। उनके पास कोई जवाब नहीं था। पूरे कोर्ट मे सन्नाटा छा गया था। आज एक नया नज़रिया उनके सामने था? उन्होंने उसके फांसी की सज़ा को माफ करने की दया याचिका प्रेसिडेंट को भिजवा दिया।

अगले दिन अखबार मे विनीता सहाय के इस्तिफ़े की खबर छपी थी। उन्होंने वक्तव्य दिया था – इस असमान सामाजिक व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है। जिससे समाज लड़कियों को समान अधिकार मिले। अन्यथा न्याय, अन्याय बन जाता है, क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।गलत सामाजिक व्यवस्था और करप्शन न्याय को गुमराह करता है और लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा ख़त्म करता है। मैं इस गलत सामाजिक व्यवस्था के विरोध मेँ न्यायधिश पद से इस्तीफा देती हूँ।
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आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी )

(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है।यह कहानी बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है।)

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नन्हा आशु थोड़ी देर पहले ही जागा था। वह कमरे से बाहर आया, तभी उसने दादी को बाहर से आते देखा। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे, तू जाग गया है?” आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? दादी ने कहा- “मैं रोज़ सुबह मंदिर जाती हूँ बेटा। ये ले प्रसाद।” दादी ने उसके हथेली पर बताशे और मिश्री रख दिये। आशु को बताशे चूसने में बड़ा मज़ा आ रहा था। यह तो नए तरह की टाफ़ी है। उसने मन ही मन सोंचा।

उसके मन में ख्याल आया कि अगर वह दादी के साथ मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। कुछ सोचते हुए उसने दादी से पूछा – ‘दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या?” दादी ने उसे गौर से देखते हुए कहा –“तुम सुबह तैयार हो जाओगे तो जरूर ले चलूँगी।‘ दादी पूजा की थाली लिए पूजा-घर की ओर बढ़ गईं। “दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? बताओ ना”- आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम रोज़ सुबह कैसे जाग जाती हो?

दादी ने हँस कर पूछा-“और बताशे-मिश्री चाहिए क्या?” आशु ने सिर हाँ में हिलाया। दादी ने उसके मुँह में बताशे डाल कर कहा – ‘मेरे तकिये में जादुई घड़ी है बेटा। वही मुझे सुबह-सुबह जगा देती है। अगर तुम्हें सुबह जागना है। तब रात में मुझ से वह तकिया ले लेना। सोते समय सच्चे मन से तकिये को अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। रात में देर तक मत जागना। क्यों दादी?– आशु ने पूछा। दादी ने जवाब दिया – “वह इसलिए ताकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। वरना तकिये के जगाने के बाद भी तुम्हें बिस्तर से निकलने का मन नहीं करेगा।“

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आशु मम्मी-पापा के साथ दादा-दादी के पास आया था। उसके स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थी। वह दादी के जादुई तकिये की बात से बड़ा खुश था क्योंकि उसे रोज़ सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। जल्दीबाजी में तैयार होना पड़ता। मम्मी से डांट भी पड़ती। कभी-कभी स्कूल की बस भी छूट जाती थी।

रात में वह दादी के पास पहुँचा। बड़े ध्यान से उनके बिस्तर पर रखे हुए तकियों को देख कर सोंच रहा था – इनमें से कौन सा तकिया जादुई है? देखने में तो सब एक जैसे लग रहे हैं। तभी मम्मी ने पीछे से आ कर पूछा – ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो आशु? तुम्हारा प्रिय कार्टून कार्यक्रम टीवी पर आ रहा है।“ आशु ने जवाब दिया – “नहीं मम्मी, मैं आज देर रात तक टीवी नहीं देखूंगा। आज मुझे समय पर सोना है।“ मम्मी हैरानी से उसे देखती हुई बाहर चली गईं।

आशु ने दादी की ओर देखा। दादी ने एक छोटा तकिया उसकी ओर बढ़ाया और पूछा – “तुमने खाना खा लिया है ना?” आशु ने खुशी से तकिये को बाँहों में पकड़ लिया और चहकते हुए कहा –“हाँ दादी। मैंने खाना खा कर ब्रश भी कर लिया है दादी।“ वह अपने कमरे में सोने चला गया। वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।

अगले दिन सचमुच वह सवेरे-सवेरे जाग कर दादी के पास पहुँच गया। दोनों तैयार हो कर मंदिर चले गए। मंदिर में एक बड़ा बरगद का पेड़ था। बरगद के लंबी-लंबी जटाएँ जमीन तक लटकी हुईं थीं। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु को यह सब देखने मे बड़ा मज़ा आ रहा था। दादी नदी से लोटे में जल भरने सीढ़ियों से नीचे उतर गईं। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। दादी लोटे में जल ले कर मंदिर की ओर बढ़ गईं। आशु दौड़ कर दादी के पास पहुँच कर पूछा – ‘दादी तुम मेरे लिए जल नहीं लाई क्या?” दादी मुस्कुरा पड़ी। उन्होंने पूजा की डलिया से एक छोटा जल भरा लोटा निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह दादी का अनुसरण करने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।

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आशु दादी के साथ रोज़ मंदिर जाने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। दरअसल आशु को सवेरे का लाल सूरज, ठंडी हवा, पेड़, पंछी, नदी, प्रसाद और मंदिर की घंटिया सब बड़े लुभावने लगने लगे थे। आज मंदिर जाते समय दादी ने गौर किया कि आशु कुछ अनमना है। उन्हों ने आशु से पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा?” आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – “दादी, अब तो मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो रही है। घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।‘

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दादी उसका हाथ पकड़ कर नदी की सीढ़ियों पर बैठ गईं। दादी प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहने लगी – “आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है। यह तुम्हारे मजबूत इच्छा शक्ति का कमाल है। जब हम मन में कुछ करने का ठान लेते है, तब हमारी मानसिक शक्तियाँ उसे पूरा करने में मदद करती हैं। हाँ आशु, एक और खास बात तुम्हें बताती हूँ। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हम नियत समय पर सोते-जागते है। हमें नियत समय पर भोजन की जरूरत महसूस होती है। जिसे हम मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकते हैं। यह घड़ी प्रकृतिक रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।“

आशु हैरानी से दादी की बातें सुन रहा था। उसने दादी से पूछा –“ इसका मतलब है दादी कि मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था? मैं अपनी इच्छा शक्ति से बॉडी क्लॉक को नियंत्रित कर सवेरे जागने लगा हूँ?” दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – “आज रात तुम अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना। ताकिया की मदद मत लेना। रात में सोते समय आशु नें वैसा ही किया, जैसा दादी ने कहा था। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसने अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया था।

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(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है।यह कहानी बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि  बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है।)

सौन्दर्य (blog related)

मेरी सहेलियाँ सजती-सँवरती और मुझे भी नए-नए फैशन समझातीं। मुझे सजने- सँवरने का बिलकुल मन नहीं करता था। मेरी सहेलियाँ मेरी समस्या समझती ही नहीं थीं। उनके चिकने, साफ- सुथरे चेहरे दमकते रहते थे। मेरा चेहरा मुंहासों से भरा था। मुझे इन मुंहासों की वजह से बड़ी शर्मिंदगी होती थी। उन्हें छुपाते-छुपाते मैं थक गई थी। मेरा आत्मविश्वास भी कम हो गया था। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। मैं रोज़ एक ही जींस और टॉप में कालेज़ पहुँच जाती। मैं ना किसी से ज्यादा बातें करतीं ना किसी लडके से मेरी दोस्ती थी।

मुझे राधिका के साथ अपना प्रोजेक्ट का काम करना था। बालों को आगे कर अपने गाल पर मैंने फैला लिया, जिससे मेरे गाल छुप जाये।फिर अपनी सहेली राधिका के घर पहुँची। राधिका ने नाराजगी से पूछा- “कमल ने मुझे तुम्हें कैंटीन में भेजने कहा था। पर तुमने फोन कर कमल को मना क्यों कर दिया? वह अच्छा लड़का है। तुमसे दोस्ती करना कहता है। तुम सबलोगों से इतनी कटी-कटी क्यों रहती हो?

मेरी बड़ी-बड़ी आँखों मेँ आँसू भर आए। मैंने अपने गालों पर से बाल हटा कर अपने मुँहासे राधिका को दिखाए। मेरे दोनों गाल लाल-गुलाबी मुहांसों से भरे थे। राधिका ने मुस्कुरा कर कहा-“ बस, यही तुम्हारी समस्या है? वह उठी और अपने अलमारी से कुछ निकाल कर मेरे हाथों में थमा दिया। मेरे हाथों में गार्नियर प्योर एक्टिव नीम फ़ेस वाश की सफ़ेद-हरे रंग की ट्यूब थी। मैंने कहा-“ इससे क्या होगा?” राधिका ने हँसते हुए कहा- “लगा कर तो देख।“

लगभग एक सप्ताह बाद मैं बहुत खुश थी। गार्नियर का जादू देख कर मैं हैरान थी। मेरा चेहरा मुंहासों से मुक्त दमक रहा था। हमेशा पहननेवाले जींस को हटा कर एक सुंदर से सलवार-कुर्ते में मैं तैयार हो गई। बालों को खूबसूरती से क्लिप से लगा कर बाँधा और कॉलेज कैंटीन में राधिका से मिलने पहुँची। मैं उसे धन्यवाद देना चाहती थी। कैंटीन मेँ हम दोनों सहेलियाँ बैठ कर गप्पें कर रहीं थीं। तभी कमल वहाँ आया और हमारे साथ बैठ गया। उसकी आँखों मेँ मेरे लिए प्रशंसा दिख रही थी। उसने मुझ से पूछा-“ तुम अर्चना की छोटी बहन हो क्या? तुम दोनों काफी मिलती-जुलती हो। इसलिए मैंने अनुमान लगा लिया। पर तुम उससे ज्यादा ग्लैमरस हो। मैं और राधिका खिलखिला कर हंस पड़े। सच्चाई जान कर कमल झेंप गया। आज मैं और कमल अच्छे दोस्त हैं। मैं और राधिका इसे गार्नियर-मैजिक कहतें है। अब मैं पहले जैसी सहमी-सिमटी नहीं बल्कि आत्मविश्वाश से भरी अर्चना हूँ। सभी कहते हैं मैं हर पार्टी की जान हूँ। हम सभी सहेलियों को त्वचा समस्या होने पर गार्नियर-लक विश करते हैं।

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क्रिसमस की पूर्वसंध्या (यात्रा संस्मरण)

कड़ाके की ठंड थी। इस ठंड में सुबह-सुबह तैयार होना एक बड़ा काम था। पर समय पर हवाई-अड्डा पहुँचना था। जल्दी-जल्दी तैयार हो कर सुबह 8 बजे हमलोग घर से निकले। हमें लखनऊ से पुणे जाना था। गनीमत थी कि हम समय पर पहुँच गए। घड़ी देख कर चाँदनी, अधर और मैं खुश हुए, चलो देर नहीं हुई।
आधे घंटे के बाद फोन पर खबर मिली कि कोहरे के कारण हवाई जहाज 30 मिनट देर से जाएगा। लखनऊ में कोहरा कुछ कम है। पर दिल्ली में घना कोहरा है। पर यह देर होने का सिलसिल लगभग दो घंटे चला। हम दो बजे दिल्ली पहुँचे। वहाँ से  पुणे के जहाज का समय दोपहर 2:30 में था। इसलिए हमलोग बेफिक्र थे क्योंकि दोपहर में दिल्ली का मौसम बिलकुल साफ था और पुणे में इतनी ठंड नहीं होती है कि जहाज़ को उतरने में कोहरे की समस्या का सामना करना पड़े। पर किसी कारणवश इस हवाई जहाज के समय में भी देर होने लगा। बार-बार नज़र शीशे के बाहर के मौसम पर जा रही थी। घड़ी की सुइयाँ जैसे-जैसे आगे जा रही थी, कोहरे का असर बढ़ता जा रहा था। अगर कोहरा ज़्यादा हो जाएगा तब ना जाने हवाई जहाज का क्या होगा? ढ़ेरो जहाज इस वजह से स्थगित हो रहे थे।
सूर्य पश्चिम की ओर तेज़ तेज़ी से बढ़ रहा था। लगभग 4:30 बजे शाम का समय हो चुका था। मन ही मन मैं मना रही थी कि जहाज जल्दी यहाँ से उड़ान भर ले। सूरज लाल गोले जैसा दिख रहा था। चारो ओर लाली छा गई थी। क्रिसमस की पूर्वसंध्या बड़ी खूबसूरत थी। धीरे-धीरे पश्चिम में डूबता सूरज बड़ा सुंदर लग रहा था। मैं उसकी सुंदरता को निहार रही थी। पाँच बजे शाम में सूर्य अस्त हो गया। हवाई-अड्डे के शीशे से बाहर धुंध नज़र आ रहा था। कोहरा घना हो रहा था। लगा अब हमारी उड़ान के रद्द होने की सूचना ना आ जाए। पर तभी हमे हवाई जहाज के अंदर जाने की सूचना दी गई। थोड़ी राहत तो हुई। पर अंदर बैठने के बाद भी नज़र खिड़की से बाहर घने हो रहे कोहरे पर थी। समझ नहीं आ रहा था कि इस हल्के धुंध भरे कोहरे में जहाज़ अगर उड़ान भर भी ले तो आगे कैसे जाएगा, क्योंकि अब तो कोहरा बढ़ता ही जाएगा। मैं इसी चिंता में थी और जहाज़ ने उड़ान भरी। मैंने आँखें बंद कर माथा सीट पर टिका लिया।
विमान बहुत ऊंचाई पर आ गया था। थोड़ी देर बाद मेरी नज़रें विमान की खिड़की के बाहर गई। जहाज़ के पंख पर तेज़ रोशनी चमक रही थी।  बाहर तेज़ धूप थी और सूर्य जगमगा रहा था। मैं हैरान थी। नीचे झाँका तो पाया कोहरे की मोटी चादर नीचे रह गई थी। हमारा जहाज कोहरे के मोटी चादर से ऊपर था। ऊंचाई पर कोहरा नहीं था। वहाँ सूरज चमचमा रहा था। संध्या 5:30 में सूर्य फिर से अस्त होता हुआ नज़र आया। यहाँ से सूर्ययास्त और भी लाजवाब लग रहा था। नीचे अंधकार जैसा था। दूर छितिज पर धरती और आकाश मिलते हुए दिख रहे थे। पूरा आसमान डूबते सूरज के लाल और नारंगी रंग में रंगा था। नज़रों के सामने एक और खूबसूरत शाम थी। एक दिन में दो बार सूर्यास्त देख कर रोमांच हो आया। एक सूर्यास्त धरती पर और दूसरा आकाश की ऊंचाइयों पर।  क्रिसमस की यह पूर्वसंध्या मेरे लिए यादगार बन गई।