तब उन्नीस वर्ष की थी मैं । अभी टीन एज के आखरी वर्ष में थी। बड़ी बेफ़िक्री और मस्ती के दिन थे। आई. ए. परीक्षा के रीजल्ट आ गए थे। बड़े अच्छे अंकों से मैं पास हुई थी। अतः बी. ए. में मनचाहे विषय – मनोविज्ञान में प्रवेश मिल गया था। खुशी-खुशी कालेज में बी. ए. में पढ़ रही थी।
तभी अचानक मेरी शादी तय हो गई। शादी के नाम से इतनी खुश थी, जैसे जीवन का सबसे अनमोल खजाना मिल गया हो। नए कपड़े, गहने, सहेलियों की छेड़-छाड़ में सारी खुशियाँ समाई थी। बड़ी-बड़ी आँखों में ढेरो सपने थे।
नई जिंदगी के नए सपनों के साथ ससुराल पहुँची। पर यह क्या? वहाँ तो जीवन का अर्थ ही कुछ और था। बहू यानि काम करने की मशीन। सुबह से रात तक बीसियों लोगों का भोजन बनाना, चाय पिलाना जैसे कामों में दिन कब बीत जाता पता ही नहीं चलता। इसके बाद भी दहेज पर छींटाकशी और उलाहनों का अंत नहीं था। इस जीवन की तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी। दिन भर किसी की एक मीठी बोली के लिए तरस जाती। इस समय मुझे समझ आया कि मैं माँ बनने वाली हूँ।
तभी बी. ए. के परीक्षा की तिथि निकल गई। पढ़ाई बिलकुल ठप्प थी। कालेज छूट गया था। पर मन के किसी कोने में यह ख्याल था कि मुझे किसी भी हाल में परीक्षा देनी है। परीक्षा के समय माईके जाने का अवसर मिला। बड़ी राहत मिली। लगा माँ को सारी बातें बता कर कुछ उपाय निकलेगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। वहाँ से कुछ दिनों के बाद इस आश्वासन के साथ वापस ससुराल भेज दिया गया – घबराओ नहीं। कुछ दिनो में सब अपने आप ठीक हो जाएगा। पर आज तक क्या अपने आप कभी कुछ ठीक हुआ है?
बेटी के जन्म के बाद ससुराल आने पर मुसीबतें और बढ़ गई। साथ में काम भी बढ़ गया। बेटी होने का ताना भी मिलने लगा। घर के कामों में फर्माइशों की लिस्ट बढ़ती गई। यह शायद बेटी के होने की सज़ा भी थी।
मन में अक्सर खयाल आता कि क्या यही मेरी पहचान है? क्या यही मेरा जीवन है? एक बँधुआ मजदूर की तरह खटना और ताने सुनते रहना। रात में यह सब सोंच कर नींद नहीं आती। तब खिड़की के पास खड़े-खड़े ना जाने कितनी रातें बिताईं। आँखों से आँसू बहते रहते। तभी मेरे बी. ए. का रिजल्ट आ गया। खुशी मिश्रित हैरानी हुई। मैं प्रथम श्रेणी में अच्छे अंकों से पास हुई थी।
तब मैंने अपने नए जीवन के लिए एक निर्णय लिया। एक नई शुरुआत की ओर कदम बढ़ाने का निश्चय किया और मैंने एम. ए. के प्रवेश का फार्म भर दिया। यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान में सीमित सीटें थी। पर अच्छे अंक होने की वजह से प्रवेश मिल गया। घर के विरोध, काम के बोझ, उलाहनों और नन्ही सी बिटिया के देख-भाल का बोझ तो था। पर कहतें है – दिल से कुछ करने की चाहत हो तो ईश्वर भी मदद करतें है। उसी ईश्वर के आशीर्वाद स्वरूप मैंने एम. ए. किया। फिर पी. एच. डी. किया। आज मैं दो प्यारी बेटियों की माँ, एक सफल गृहणी और कालेज शिक्षिका हूँ। मेरे उस एक निर्णय ने मेरी जिंदगी बदल दी।
7 फरवरी 2015 मैं शिलांग पहले भी जा चुकी हूँ। यह मेघालय की राजधानी है। शिलांग एक खूबसूरत पहाड़ी स्थान है। अतः जब दूसरी बार जाने का अवसर मिला। तब मैं तुरंत तैयार हो गई। शिलांग जाने के लिए रेल मार्ग नहीं है। यहाँ हवाई जहाज़ की कम ही उड़ानें जाती हैं। सड़क मार्ग से यहाँ जाना सबसे सुविधाजनक है। सात फरवरी को दोपहर लगभग एक बजे मैं और मेरे पति हवाई जहाज़ से गौहाटी पहुँचें। वहाँ से कार से शिलांग के लिए निकले। यह दूरी लगभग 120 किलोमीटर है। हमलोगों ने सोचा दोपहर का भोजन मार्ग में किसी होटल या ढाबा में खा लेंगे। शाम तक शिलांग पहुँच जाएँगे। तब थोड़ी देर वहाँ बाज़ार में घूमेंगे। शिलांग जाने की सड़क पूरी तरह से पहाड़ी मार्ग है। एक तरफ पहाड़ और दूसरी ओर घाटियां और हरे-भरे पेड़ पौधे बड़े सुंदर लग रहे थे। हम मंत्र-मुग्ध प्रकृतिक सौन्दर्य को निहार रहे थे। पर तभी हमारी कार रुक गई। पता चला, आगे पूरी सड़क जाम थी। दोपहर से शाम और फिर रात हो गई। पर आवागमन ठप्प था। किसी तरह कार थोड़ी–थोड़ी खिसक रही थी। कुछ पुलिसवाले और मिलिट्री की गाडियाँ आई। तब मार्ग खुलने की आस जागी। काफी देर के बाद रात नौ बजे रास्ता खुला। अभी थोड़ी दूर ही पहुँच थे। तभी कुछ लोग हमारी कार रोक कर मदद मांगने लगे। उनके साथ एक घायल युवक था। जिसे आगे पुलिस थाने या अस्पताल तक ले जाने का अनुरोध कर रहे थे। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे में क्या करें। अन्य गाड़ियों की तरह आगे बढ़ जाएँ या मदद करें।? खैर, हमने उस युवक को कार में बैठा लिया। वह होश में था। पर बदहवाश था। इस लिए ठीक से कुछ बता नहीं पा रहा था। सौभाग्यवश थोड़ी दूर पर कुछ पुलिसवाले मिल गए। उनके साथ एम्बुलेन्स भी थी। हमने उस युवक को वहाँ उतारा। तब पता चला कि वह पुलिस का जवान था। उस दिन वहाँ पर भीड़ और पुलिस में भयंकर झड़प हुई थी। कुछ वाहनें भी जला दी गई थी। इसी से वजह से सड़क जाम थी। उस उपद्रव में यह जवान घायल हो अकेला सड़क के किनारे पड़ा रह गया था। वर्दी के ऊपर उस जवान ने काली जैकेट पहन रखी थी। अतः वह पुलिस का जवान है, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। वहाँ से आगे बढ़ने पर एक आत्म संतुष्टि थी, किसी अनजाने को मदद करने का। पर शिलांग जल्दी पहुँचने की चिंता भी थी। हम रात 10 बजे शिलांग पहुँचे। हमने 2-3 घंटे के रास्ते को नौ घंटे में तय किया था। हमारा उस दिन का सारा कार्यक्रम बेकार हो गया। मन में खयाल आया- होई है सोई जो राम रची राखा.
दूसरे दिन सुबह-सुबह हम तैयार हो कर घूमने निकाल गए। पर्वत, हरीयाली और शीतल समीर ने मन प्रसन्न कर दिया। यहाँ की पर्वत माला बड़ी सुंदर है। यहाँ के लोग शांत स्वभाव के हैं। शिलांग और आस-पास के ग्रामीण परिवेश बड़े साफ-सुथरे हैं। वहाँ की सफाई देख कर मन खुश हो गया। एशिया के सबसे साफ सुथरे गाँव का श्रेय वहाँ के एक ग्राम मावियननिंग ग्राम को मिला है। जिसे समय की कमी की वजह से हम देख नहीं पाये। हम सभी एलीफेंट झरना / फ़ाल पहुँचें। यह एक खूबसूरत पहाड़ी झरना है। शिलांग पीक वहाँ की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है। जहाँ से शिलांग का बड़ा खूबसूरत नज़ारा दिखता है। राह में और भी अनेक खूबसूरत झरने नज़र आये । यहाँ का गोल्फ कोर्स विश्व प्रसिद्ध है। चेरापुंजी विश्व की सबसे ज्यादा बारिश वाली जगह है। इस स्थान का वास्तविक नाम सोहरा है। सोहरा बड़ी साफ-सुथरी जगह है। यहाँ के इको पार्क से पहाड़, और घाटियाँ का नज़ारा खूबसूरत लगता है। यहाँ की एक और लाजवाब चीज़ है- पेडों की सजीव जड़ों से बना झूलता पुल। यहाँ की ख़ासी जन जातियों के लोग अपने अद्भुत योग्यता का इस्तेमाल करते हुए इस तरह के पुल बना लेते हैं। जब किसी नदी के ऊपर यह पुल बनाना होता है, तब ये सुपारी के पेड़ के लंबे-लंबे तनों को बीच से चीर कर नदी के ऊपर इस पार से उस पार तक रख देते है। यहाँ के रबर के पेड़ों की नई पतली जड़ों को उस दिशा में बढ़ने देते है। यहाँ का मौसम और हमेशा होने वाली बारिश इन जड़ों को सुपारी के तनों पर बढ्ने में मदद करती है। बढ़ते-बढ़ते दूसरे किनारे पर जा कर ये जड़ें मिट्टी में जड़ें जमा लेतीं हैं। धीरे-धीरे ये जड़ें मजबूत हो जाती है। इस तरह ये जड़ें मजबूत पुलों का रूप का ले लेती है। इन पर से आसानी से नदी पार किया जा सकता है। ये पुल बहुत मजबूत होतें हैं। इस तरह के पुल मानव मस्तिष्क की अद्भुत देन है। पूरे विश्व में ये पुल अनोखे हैं। ऐसे पुल और कहीं नहीं पाए जाते हैं। मवासमाई गुफाएँ प्रकृतिक रूप से बनी गुफा हैं। यहाँ पानी के कटाव ने कुदरती तौर पर बड़े सुंदर आकार बना दियेँ हैं। एक ओर से अंदर जाने का रास्ता है। यह गुफा काफी लंबी है। बाहर निकालने का रास्ता दूसरी ओर है। इसमें अद्भुत आकृतियाँ हैं। varsha काल में इन गुफाओं में जाना संभव नहीं होता है। शिलांग से 15 किलोमीटर दूर यहाँ का ऊमीयम लेक है। यह ऊमीउम नदी पर बनाया गया लेक है। यह बड़ापानी के नाम से भी प्रसिद्ध है। लेक के किनारे ढेरो पाइन के वृक्ष हैं। साथ ही नेहरू पार्क है। इसे शिलांग- गौहाटी के सड़क मार्ग यानि उच्च राजपथ से बड़ी सुविधा से देखा जा सकता है। यह बड़ा खुबसूरत लेक है। भारत के इस उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में प्रायः मातृसत्ता व्यवस्था है। यहाँ अनेक जनजातियाँ है। जिनमें जायदाद की हकदार पुत्री होती है। यहाँ ख़ासी और जनटिय जनजातियों की जनसंख्या सर्वाधिक हैं। यहाँ की जनजातियाँ प्रायः आदिशक्ति शिव या देवी के उपासक हैं।
शिलांग के पास, चेरापुंजी विश्व की सबसे ज्यादा बारिश वाली जगह है। इस स्थान का वास्तविक नाम सोहरा है। सोहरा बड़ी साफ-सुथरी जगह है। यहाँ के इको पार्क से पहाड़, और घाटियाँ का नज़ारा खूबसूरत लगता है।
यहाँ की एक और लाजवाब चीज़ है- पेडों की सजीव जड़ों से बना झूलता पुल। यहाँ की ख़ासी जन जातियों के लोग अपने अद्भुत योग्यता का इस्तेमाल करते हुए इस तरह के पुल बना लेते हैं। जब किसी नदी के ऊपर यह पुल बनाना होता है, तब ये सुपारी के पेड़ के लंबे-लंबे तनों को बीच से चीर कर नदी के ऊपर इस पार से उस पार तक रख देते है। यहाँ के रबर के पेड़ों की नई पतली जड़ों को उस दिशा में बढ़ने देते है। यहाँ का मौसम और हमेशा होने वाली बारिश इन जड़ों को सुपारी के तनों पर बढ्ने में मदद करती है। बढ़ते-बढ़ते दूसरे किनारे पर जा कर ये जड़ें मिट्टी में जड़ें जमा लेतीं हैं। धीरे-धीरे ये जड़ें मजबूत हो जाती है। इस तरह ये जड़ें मजबूत पुलों का रूप का ले लेती है।
इन पर से आसानी से नदी पार किया जा सकता है। ये पुल बहुत मजबूत होतें हैं। इस तरह के पुल मानव मस्तिष्क की अद्भुत देन है। पूरे विश्व में ये पुल अनोखे हैं। ऐसे पुल और कहीं नहीं पाए जाते हैं।
मैं और मेरे पति अधर कोलकाता के न्यू मार्केट में घूम रहे थे। बाज़ार में भीड़ और चहल-पहल थी। बगल में था होग मार्केट। कपड़े, जूते, चप्पल, बैग और ढेरो समान से बाज़ार भरा था। यह बाज़ार ऐसा है, जहाँ पैदल घुमने का अपना मज़ा है। पर काफी चलने के बाद थकान हो गई। तब मेरे पति अधर नें रिक्शा लेने का सुझाव दिया और एक रिक्शेवाले से बातें करने लगे। कोलकाता के ऊँचे और बड़े-बड़े चक्कों वाले रिक्शे मुझे देखने में अच्छे लगते हैं। पर किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचना मुझे अच्छा नहीं लगता है। अतः मैंने रिक्शे पर बैठने से मना कर दिया। रिक्शेवाला मेरी इन्कार सुन कर मायूस हो गया। उसे लगा कि मैं पैसे की मोल-मोलाई कर रही हूँ। उसने मुझसे कहा- “ दीदी, पैसे कुछ कम दे देना। मैंने बताया कि पैसे की बात नहीं है। किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचंना मुझे अच्छा नहीं लगता । तब रिक्शे वाले ने ऐसी बात कही, जो मेरे दिल को छु गई और मैं चुपचाप रिक्शे पर बैठ गई। उम्रदराज, दुबला-पतला, सफ़ेद बालोंवाले रिक्शा चालक ने कहा- “ यह तो मेरा रोज़ का काम है। हमेशा से मैंने यही काम किया है। अब मैं दूसरा कोई काम कर भी नहीं सकता। यही मेरी कमाई का साधन है। आप बैठेंगी तो मेरी कुछ कमाई हो जाएगी। वरना कोई दूसरी सवारी का इंतज़ार करना होगा।पैसे तो मुझे कमाने होंगे। पता नहीं कब हमारे देश से गरीबी कम होगी? लोगों को रोजगार के अच्छे अवसर कब प्राप्त होगें?
मुझे मालूम हुआ न्यू मार्केट में चाय पत्ती की बड़ी अच्छी दुकान “कोहिनूर” है। बंगाल की दार्जिलिंग चाय बड़ी मशहूर है और मेरी पसंदीदा भी। दुकान ढूँढते हुए हम हौग मार्केट के पीछे की सड़क पर पहुँचें। वहाँ चाय पत्ती की एक दुकान तो दिखी। पर उसका नाम कहीं लिखा नज़र नहीं आया। पूछने पर मालूम हुआ कि इस दुकान का नाम कोहिनूर है। चाय की प्याली को होठों के लगाने के पहले हम शायद हीं उसके इतिहास या नाम के बारे में सोंचते है। पर सच्चाई यह है कि इनकी भी अपनी कहानी होती है और इनका भी अपना एक नाम होता है। काली, सफ़ेद , हरी और ऊलोंग (चीन की) चाय पत्तियाँ अलग-अलग होतीं हैं। चाय पत्तियों के बारे में दिलचस्प बात यह है कि चाय पत्तियाँ जिस स्थान या स्टेट में उपजाई जाती हैं। उस नाम से ही जानी जाती हैं। जैसे तीस्ता घाटी क्षेत्र की पत्तियाँ तीस्ता चाय पत्ती और मकईबारी स्टेट की पत्ती मकाईबारी चाय पत्ती के नाम से बाज़ार में मिलती है। दार्जिलिंग में ऐसे ही ढेरो टी स्टेट है। अलग-अलग जगहों कि पत्तियों के रंग, स्वाद और खुशबू में अंतर होता है। स्वाद और खुशबू के आधार पर चाय पत्तियों का मूल्य तय होता है। कोहिनूर दुकान से हमने थोड़ा गोल दाने वाली पत्तियाँ ली। ये चाय को गहरा रंग देती है। साथ में थोड़ा लीफ़ लिया। ऐसी पत्ती हल्का रंग देती है पर इनकी खुशबू बड़ी अच्छी होती है। वापस लौटने पर इन से चाय बना कर पीने पर दिल खुश हो गया। साथ ही आफसोस हुआ कि मैंने पत्तियाँ ज्यादा क्यों नहीं लीं। कोहिनूर दुकान वास्तव में अच्छी दुकान है। ।
कोलकाता जा कर मुझे वहाँ की बंगाली तरीके से बनी मछ्ली खाने की बड़ी इक्छा थी। हमारे एक परिचित ने कस्तुरी रेस्टोरेन्ट का पता बताया। यह न्यू मार्केट में फ्री स्कूल स्ट्रीट में है। सीढ़ियों से ऊपर पहुँच कर लंबा सा हाल नज़र आया। वहाँ का रख-रखाव भी मामूली था। बड़ा साधारण सा दिखनेवाले रेस्टोरेन्ट देख दुविधा होने लगी। कहीं हमने यहाँ आ कर गलती तो नहीं किया। हमने मेनू देखना चाहा। वहाँ का मेनू बड़ा नायाब था। दो ट्रे में ढेर सारे मछली के बने व्यंजन कटोरों में सजे थे। जो व्यंजन पसंद हो उन कटोरों को उठा लेना था। उस रेस्टोरेन्ट में सिर्फ मछली के व्यंजन मिलते है। चिंगड़ी, रेहू, भेटकी, कतला, पोमफ्रेट, हिलसा / इलिस मछली के अलावा कई और मछलियों के व्यंजन भी उपलब्ध थे। साथ में सादा चावल था। सभी व्यंजन स्वाद के लिहाज़ से दूसरे से भिन्न थे। मैंने पहली बार मछली किसी साग या सब्जी के साथ बना देखा था। भोजन का स्वाद लाजवाब था। टमाटर की मीठी चटनी और सेवई भी स्वादिष्ट थी। रेस्टोरेन्ट देख कर हुई दुविधा व्यर्थ निकला। वहाँ भोजन कर बंगाल के स्वादिष्ट भोजन का भरपूर लुत्फ़ मिला। तब खयाल आया – “रूप से ज्यादा गुण मायने रखता है।“ कस्तुरी वास्तव में कस्तुरी खुशबू की तरह सुवासित थी- “भोजन के सुगंध से।“
मैं और मेरे पति अधर कोलकाता के न्यू मार्केट में घूम रहे थे। बाज़ार में भीड़ और चहल-पहल थी। बगल में था होग मार्केट। कपड़े, जूते, चप्पल, बैग और ढेरो समान से बाज़ार भरा था। यह बाज़ार ऐसा है, जहाँ पैदल घुमने का अपना मज़ा है। पर काफी चलने के बाद थकान हो गई। तब मेरे पति अधर नें रिक्शा लेने का सुझाव दिया और एक रिक्शेवाले से बातें करने लगे। कोलकाता के ऊँचे और बड़े-बड़े चक्कों वाले रिक्शे मुझे देखने में अच्छे लगते हैं। पर किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचना मुझे अच्छा नहीं लगता है। अतः मैंने रिक्शे पर बैठने से मना कर दिया। रिक्शेवाला मेरी इन्कार सुन कर मायूस हो गया। उसे लगा कि मैं पैसे की मोल-मोलाई कर रही हूँ। उसने मुझसे कहा- “ दीदी, पैसे कुछ कम दे देना। मैंने बताया कि पैसे की बात नहीं है। किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचंना मुझे अच्छा नहीं लगता । तब रिक्शे वाले ने ऐसी बात कही, जो मेरे दिल को छु गई और मैं चुपचाप रिक्शे पर बैठ गई। उम्रदराज, दुबला-पतला, सफ़ेद बालोंवाले रिक्शा चालक ने कहा- “ यह तो मेरा रोज़ का काम है। हमेशा से मैंने यही काम किया है। अब मैं दूसरा कोई काम कर भी नहीं सकता। यही मेरी कमाई का साधन है। आप बैठेंगी तो मेरी कुछ कमाई हो जाएगी। वरना कोई दूसरी सवारी का इंतज़ार करना होगा। पैसे तो मुझे कमाने होंगे। पता नहीं कब हमारे देश से गरीबी कम होगी? लोगों को रोजगार के अच्छे अवसर कब प्राप्त होगें?
पोक्सो- बच्चों के लिए कानून ( महत्वपूर्ण जानकारी )
हमारे देश में बच्चों के लिए कड़े कानून की जरूरत कई बार महसूस की गई। पहले भारत में बाल मुकदमों की प्रक्रिया जटिल और थकाने वाला था। अतः भारत की संसद अधिनियम में 22 मई 2012 को बाल यौन शोषण के खिलाफ बच्चों का संरक्षण कानून पारित किया।
आज विश्व में बच्चों की सब से बड़ी आबादी भारत में है । हमारे देश में लगभग 42 प्रतिशत आबादी अठारह वर्ष से कम उम्र के बच्चों की है। अतः बच्चों का स्वास्थ्य और सुरक्षा महत्वपूर्ण है। ये बच्चे भविष्य की अनमोल निधि है। यह अधिनियम अठारह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बनाया गया है। यह बच्चों के स्वस्थ, शारीरिक, भावनात्मक , बौद्धिक और सामाजिक विकास सुनिश्चित करने को महत्व देता है। बच्चे के साथ मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न या दुर्व्यवहार दंडनीय है। इस अधिनियम के तहत कठोर दंड का प्रावधान है ।
बच्चों के साथ हो रहे यौन अपराधों को नियंत्रित करने के लिए “प्रोटेक्सन ऑफ चिल्ड्रेन फ़्रोम सेक्सुयल ओफ़ेंसेस” कानून बनाया गया। यह दो वर्ष पहले बच्चों के सुरक्षा के लिए बनाया गया कानून है। पर यह कानून बहुत कम लोगों को मालूम है। अतः इसका पूरा फ़ायदा लोगों को नहीं मिल रहा है। इसलिए लोगों के साथ-साथ बच्चों और सभी माता-पिता को भी इसकी समझ और जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही बच्चों में सही-गलत व्यवहार की समझ और निर्भीकता भी विकसित किया जाना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि सभी माता-पिता बच्चों की सभी बातों को सुने और समझे। लोगों में जागरूकता लाने के लिए मीडिया, लेखकों, पत्रकारों को सहयोग महत्वपूर्ण है। अतः कलम की ताकत का भरपूर उपयोग करना चाहिए।
दिनांक – 10.2.2015, बुधवार। समय दोपहर – 12:30 यह मंदिर भारत सरकार द्वारा सुरक्षित प्राचीन स्मारक है। यहाँ पत्थरों पर अनेक रचनाएँ / आकृतियाँ प्राचीन समय की हैं। यहाँ के पुजारी के अनुसार यह गुप्त कामाख्या के रूप में भी जाना जाता है। यह गौहाटी शहर के उत्तर में, ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित है। सड़क के किनारे कुछ पूजा सामग्री की दुकाने हैं। वहीं से मंदिर की सीढ़ियाँ शुरू होती है। थोड़ा ऊपर जाने पर बाईं ओर चट्टान पर गणेश जी विशाल प्रतिमा बनी है। जो सिंदूर आरक्त है। बगल में चट्टान पर विशाल पीपल वृक्ष है। मंदिर में आने-जाने के लिए अन्य सीढ़ियां भी बनी है। मंदिर तक की सीढ़ियों को चढ़ने के दौरान अनेकों प्रतिमाएँ चट्टानों पर बनी दिखती हैं। मंदिर परिसर में माँ के पद चिन्ह बने है।जहां पुष्प और सिंदूर चढ़ाये जाते है। इस मंदिर का निर्माण राजा स्वर्गदेव शिव सिंह ने 1714 से 1744 में करवाया था। इस वंश के बाद के राजाओं ने भी इसकी देखभाल की। तत्कालीन राजाओं ने यह जानकारी एक पत्थर पर अंकित करवाया था। जो आज भी मंदिर के पीछे के द्वार पर उपलब्ध है। यह मंदिर पथरीली पहाड़ी के ऊपर है। यहाँ दुर्गा पूजा का आयोजन बड़े धूम-धाम से होता है तथा भैंसे की बलि दी जाती है। मंदिर के अंदर जाने के लिया सीढ़ियों से अंदर उतरना पड़ता है। ये सीढ़ियाँ एक छोटी अंधकरमय गुफा में ले जातीं हैं। यह प्रकृतिक रूप से बनी गुफा है। यह मंदिर का गर्भगृह है। जहाँ बड़े-बड़े दीपक जलते रहते है। उसकी रोशनी में मंदिर के एक कोने में बैठे पुजारी पूजा-अर्चना करवाते हैं। पुजारी जी से पूछने पर उन्होने वहाँ से जुड़ी दिलचस्प कहानी सुनाई। किवदंतियाँ – 1) ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर मार्कन्डेय मुनि का आश्रम हुआ करता था। मंदिर के गर्भगृह में उन्होने माँ दुर्गा की आराधना की। माँ ने इस गर्भगृह में उन्हे दर्शन दिया था। यहीं पर उन्होने मार्कन्डेय पुराण की रचना की थी। 2) इस मंदिर को भी शक्तिपीठ कहा गया है। इस स्थान को गुप्त कामाख्या भी कहते है। ऐसा कहा जाता है कि कामाख्या माँ के दर्शन के बाद यहाँ दर्शन लाभदायक होता है।गौहाटी में कामाख्या मंदिर के बाद दीर्घेस्वरी मंदिर को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। एक मान्यता यह भी है कि यहाँ भी सती के कुछ अंग गिरे थे ।
कोलकाता के प्रवास के दौरान एक ऐसे होटल में रुकने का अवसर मिला जो हुगली नदी पर है। यह होटल दावा करता है, कि यह भारत भर में नदी पर बना अकेला होटल है। साथ ही यह पर्यावरण सहयोगी होटल है । इस होटल से नया और पुराना दोनों हावड़ा पुल नज़र आता है। दूर, नदी के दूसरे किनारे पर हावड़ा रेलवे-स्टेशन नज़र आता है। नदी के दूसरे तट पर मंदिर और अनेकों जेट्टी / घाट नज़र आते हैं। इसकी एक और बात अनूठी है। इस होटल के एक ओर रेल लाईन दूसरी ओर हुगली नदी है। यह होटल भी एक घाट / जेट्टी पर है तथा एक पुल से होटल जुटा है। ज़्वार- भाटे के साथ-साथ यह होटल ऊपर-नीचे होता है। यह होटल फ्लोटेल स्ट्रेंड रोड पर है। जो कोलकाता का एक ऐतिहासिक स्थान है। इसके पास ही बाबू घाट है। जिससे लगातार जल परिवहन के जहाज चलते रहते हैं। इसके पास इडेन गार्डेन स्टेडियम, स्टेट बैंक का आफिस, गवर्नर हाऊस, कोलकाता उच्च न्यायालय, आकाशवाणी भवन, अँग्रेज़ो के समय का जाना-माना 1887 स्थापित तरणताल है। हावड़ा रेल स्टेशन भी करीब है। यह वास्तव में अनोखा होटल है। इसमें रहने का अपना मज़ा है। सबसे ख़ास बात है हुगली के पल-पल बदलते रंग को इतने निकट से देखने का अवसर मिलता है। यह होटल हुगली नदी के जल में जहाज के रूप तैरता रहता है। इसलिए दिन और रात हर समय नदी को करीब से देखा जा सकता है।
इस होटल में रहने का एक अलग खूबसूरत एहसास है। मैं अपने कोलकाता के इस खुशनुमा याद को कभी भुला नहीं पाऊँगी।
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