जिंदगी के रंग ( कविता -4 ) #Mumbaislums

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नभ में पंछियों और बादलों से ऊपर उठते हुऐ
बड़ी खूबसूरत नज़र आती है दुनिया
छोटे दिखते हुऐ,
खिलौने से घर और पेड़ पौधे
पानी की बूँदों सी चमकती ताल -तलैया
सर्प सी बल खाती  नदियाँ
बडी  खूबसूरत नज़र आती  है जिंदगी
हवाई सफर से
जैसे एक  सपनों का जहाँ है
धरती और बादलों के बीच
तभी, नीचे उतरते -उतरते
वास्तविकता के धरातल पर ले आती है
       जिंदगी
  सामने दिखता है जिंदगी का सही रंग
टूटी बदसूरत  झुग्गी -झोपड़ियों की बस्ती
कमजोर अधनंगे खेलते,
हवाई जहाज़ देख शोर मचाते बच्चे,
जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है हमें.

#mumbaislums

 

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जिंदगी के रंग (कविता – 5)

जीवन के  इंद्रधनुषी सफर में
हजारो रंग नज़र आते है,
परायों को अपना कहनेवाले
अच्छों को बुरा कहने वाले
कहीँ ना कहीँ मिल जाते है

रोज़ सफेद -काले और
सतरंगी जिंदगी नज़र आती है
जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है।

जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है हमें(3)

अटकामा रेगिस्तान में
तपती रेत और गर्म हवाओं के बीच
अचानक एक सुबह खूबसूरत नज़ारा था,

चारो ओर फूल खिल आये थे
और रंगो की चादर सी  बिछ गई थी
क्या पता है कब जीवन में नये रंग
किस मोड़ पर आ जाये ?
जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है हमें ….

( चिली, दक्षिण अमेरिका के सूखे -बंजर अटकामा रेगिस्तान  में अचानक लाखो करोड़ों फूल खिल आये है. यह जादू  दुनिया में मौसम को बिगाडने वाले अल नीनो वर्षा ने कर दिखाया है.   )News -The Times Of India, dated-31.10.2015, pg 30.

 

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जिंदगी के रंग ( 2) कविता

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       चलते -चलते लड़खड़ा गये क़दम,
तभी सहारे के लिये बढ़ आये नाजुक हाथ,
                    हैरानी से देखा,
                  ये तो वही हाथ हैं,
जिन्हे कभी मैंने पकड़ कर चलना सिखाया था,
सचमुच, जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती हैं हमें.

 

 

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जिंदगी के रंग (1) ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें ( कविता )

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ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें
दूर खड़ा फूलों भरा, हरा भरा,

पुराना दरख्त समीर के झोंकों में झूम रहा था।
नीचे खेलते बच्चे किलक रहे थे।
ड़ालों पर पंछी चहक रहे थे।
जिंदगी के रंग कितने सलोने है।

तभी पेड़ चीख़ उठा। उस से भी तेज़ चीख़ें आईं
ऊपर नीड़ों से, और गोल-गोल उड़ते पंछियो की।
कोई उसे बेरहमी से काट रहा था,

शायद सीमेंट-बालू के नीड़ बनाने के लिए।
आसपास के पेड़ सन्न देख रहे थे,
क्या इसके बाद हमारी बारी है? सोच रहे थे।
पेड़ धरा पर पड़ा था, फूल टूट-टूट कर बिखर गए थे।

हमें हमेशा लगता है, दुर्घटनाएँ दूसरों के साथ हीं होते है
पर ऐसा नहीं है। जिंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें।
हम हीं भूल जाते है, कभी-कभी गहरी जड़ें भी सहारा नहीं दे पातीं हैं हमें,

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हमारा भँवर- पोखर ( यादें और कविता )

मालूम नहीं वहाँ कभी कोई पोखर था या नहीं।

नाम किसी कारण भी हो, पर था सबको प्यारा।

मोटी-मोटी दीवारें, ऊंचें बड़े और भारी दरवाज़े वाला घर।

गोल मोटे खंभे और मोटी लकड़ियों के सहतीरों पर बना

चूना-सुर्ख़ी की मजबूत छतों वाला दो मंजिला घर।

नीचे बड़े लोगों की भीड़, ऊपर बच्चे और उस से ऊपर

पतंग उड़ानेवाले और खेलने-कूदने वाले बच्चों से भरा घर था वह।

ना जाने क्या था उस घर में, लगता था जैसे सभी को खींचता था अपनी ओर।

दो आँगन, और उसके चारो ओर बीसियों कमरे वाला घर।

सब के पास ना जाने कितनी खट्टी- मीठी यादें है उस घर की।

किसी ने नानी से मिलने वाले पैसों से ख़रीदारी सीखी,

तो किसी नें पतंग उड़ाना सीखा।

वहाँ से निकले हर बच्चे ने ऊँचा ओहदा पाया, नाम कमाया ।

ऐसा था मेरा नानी घर।

आज वह घर नहीं है।पर यादें हैं सबके पास।

वही यादें जाग गई है।

एक परिवार का ग्रुप बन कर।

दूर-दूर हो कर भी एक बार फिर हम सब इकट्ठे हो गए हैं।

ऐसा है मेरा नानी घर।

हैलो गौरया (20 मार्च, विश्व गौरया दिवस पर )

हैलो गौरया, आज तुम्हारा दिन है।

कहाँ खो गई थी तुम कि तुम्हें याद करना पड़ता है।
अब तो तुम हर दिन मेरे घर दाना खाने आती हो

पानी पी कर फुर्र से उड़ जाती हो।

शायद हम ने हीं तुम्हारे रहने के जगह छीन लिए है।

वरना तुम तो रोशनदानों और पंखों के ऊपर भी घर

बसा लेती थी। तुम्हारी ची-ची, चूँ-चूँ की झंकार

अच्छी लगती है। छिछले पानी में नहाती हो,

छोटे- छोटे चोंच से अपने पंख संवारती और

सुखाती हो। फिर फुर्र से उड़ जाती हो।

लिखती तो मैं पहले भी थी (कविता )

लिखती तो मैं पहले भी थी। कभी कुछ छप जाता था। तब खुश हो लेती

थी। कभी लिखे पन्ने रखे-रखे पीले पड़ समय की भीड़ में कहीं खो

जाते थे। पर धन्यवाद ब्लॉग की दुनिया। मन की बातें लिखने के लिए

इतना बड़ा आसमान और इतनी बड़ी धरती दे दी है । ढेरो जाने-

अनजाने पाठक और आलोचक। सबको धन्यवाद।

अब मन की हर बात, हर विचार को जब चाहो लिख डालो। मन में भरे

ख़ज़ाने और उमड़ते-घुमड़ते विचारों को पन्ने पर उतारने की पूरी छूट

है। लिखती तो मैं पहले भी थी, पर अब लिखने में मज़ा आने लगा है।

शिवलिंग और नर्मदा ( कविता )

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एक पत्थर ने पूछा शिवलिंग से।

                    तुम चिकने हो, सलोने हो इसलिए

                                  पूजे जाते हो?

                हमें तो ना कोई पूछता है। ना ही पूजता है।

                शिवलिंग ने कहा- मैं भी तुम जैसा ही था।

                     नोकदार रुखड़ा, पत्थर का टुकड़ा।

                        पर मैंने अपने को छोड़ दिया

                      नदी के प्रवाह में, नियंता के सहारे।

                   दूसरों को चोट देने के बदले चोटें खाईं।

                नर्मदा ने मुझे घिस – माँज कर ऐसा बनाया।

                  क्या तुम अपने को ऐसे को छोड़ सकोगे?

           तब तुम भी शिव बन जाओगे, शिवलिंग कहलाओगे।

(ऐसी मान्यता है कि नर्मदा नदी का हर पाषाण शिवलिंग होता है या उनसे स्वाभाविक और उत्तम शिवलिंग बनते हैं। नर्मदा या रेवा नदी हमारे देश की 7 पवित्र नदियों में से एक है। नर्मदा नदी छत्तीसगढ़ में अमरकंटक मैं विंध्याचल गाड़ी श्रृंखला से निकलती है और आगे जाकर अरब सागर में विलीन हो जाती है। अमरकंटक में माता नर्मदा का मंदिर है । यह ऐसी एकमात्र नदी है जिस की परिक्रमा की जाती है यह उलटी दिशा में यानी पूरब से पश्चिम की ओर बहती है । इसे गंगा नदी से भी ज्यादा पवित्र माना जाता है । मान्यता है कि गंगा हर साल स्वयं गंगा दशहरा के दिन नर्मदा नदी के पास प्ले के लिए पहुंचती है ।यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। इस प्राचीन नदी की चर्चा रामायण, महाभारत , पुराणों और कालिदास के साहित्य में भी मिलता है।

हमारा जीवन भी ऐसा हीं है। जीवन के आघात, परेशनियाँ, दुःख-सुख हमें तराशतें हैं, हमें चमक  प्रदान करते हैं ।

Life is a journey of self discovery. Describe your journey till now or a part of your journey which brought to closer to a truth about life or closer to your soul and self-discovery. #SelfDiscovery

 

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रेत के कण ( कविता )

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                क्या रेत के कणों को देख कर क्या

                 यह समझ आता है कि कभी ये

              किसी पर्वत की चोटी पर तने अकडे

                 महा भीमकाय चट्टान होंगे
या कभी

           किसी विशाल चट्टान को देख कर मन

              में यह ख्याल  आता है कि समय की

              मार इसे चूर-चूर कर रेत बना देगी?

                                 नहीं न?

              इतना अहंकार भी किस काम का?

             तने रहो, खड़े रहो पर विनम्रता से।

                   क्योंकि यही जीवन चक्र है।

              जो कभी शीर्ष पर ले जाता है और

             अगले पल धूल-धूसरित कर देता है।