हवाएँ तय करती हैं……

चिंगारी को हवा आग बना देती है,

प्राणदायिनी बन यही जीवन दान देती है।

बाँस से गुजर उसे बाँसुरी बना मधुर सूर गुँजा देती है।

किसी को तौलने से पहले ,

यह समझना जरुरी है कि व्यवहार

हवाएँ तय करती हैं……..

ख़्वाहिशों के क़ाफ़िले

ख़्वाहिशों के क़ाफ़िले बड़े अजीब होते हैं…

ये गुज़रते वहीं से हैं जहाँ रास्ते नहीं होते…!!

 

 

 

unknown

जिजीविषा -जीने की चाह, Will to live

सूर्य के उदय से अस्त होने के साथ घटती आयु,

जन्म, जरा, कष्ट, और मृत्यु को देखकर भी मनुष्य को भय  नहीं होता।

आशा , तृष्णा, राग- द्वेष, तर्क-वितर्क,  अधैर्य , अज्ञान-वृत्ति-दर्प-दम्भ रूपी भंवर

से पार पाना  है कठिन ।

कायांत या शरीर का अंत,  अंतअमरत्व स्वाभाविक अवस्था है……

अनश्वरता एक भूल है……..

जिजीविषा  का संहार करने वाले काल है शाश्वत सत्य……..

यह सारा सत्य जान कर भी सभी

 जगत के मोहरूपी मादक मदिरा में ङूब जाते हैं।

श्मशान-वैराग्य

एक अोर बहती कलकल गंगा,

तट पर विशाल अश्वत्थ तरु

अौर दूसरी अोर श्मशान काली की 

भव्य प्रतिमा, रक्त रंग

जवा पुष्प माला में । 

घाटों पर बाँसों का स्तुप।

राह किनारे बिकते रामनामी…….

गुजरते उस राह से मन वैराग से  

…..श्मशान-वैराग्य से भर उठता।

पर कितना विचित्र है यह मन?

संसार की नश्वरता का एहसास

वह क्षणिक वैराग्य

जो श्मशान में  संसार की असारता से उत्पन्न होता है,

संसार के मोह-माया में आते, क्षण में हीं

लुप्त भी हो जाता है। 

 

 

वैराग्य – संसार की असारता।

 श्मशान वैराग्य-श्मशान में जाकर  हुआ क्षणिक वैराग्य।

शक

Aman Kumar Sharma's avatarजिजीविषा

मुझे शक है कि भूलने लगा हूँ खुद ही को मैं,

शर्त लेकिन ये थी कि मुझे बहुत कुछ याद रखना है।

View original post

जिंदगी के रंग -67

साँसे चले …समय गुजरता रहे बस …..

क्या यही है ज़िंदगी?

ना मक़सद …. ना ख़्वाब ……

हसीन तोहफ़ा है यह ज़िंदगी.

थोड़ी तमन्ना, अभिलाषा, लालसा

 लक्ष्य…. मकसद मिला कर 

गुनगुनाइये…..

राहें खुलती जायेंगीं।

 

पहचान

ख़ामोशी से बनाते रहो,

पहचान अपनी .

हवायें ख़ुद तुम्हारा

नाम गुनगुनाएँगीं .

Unknown

ज़िंदगी के रंग -66

कई बार कुछ अंत,

ज़िंदगी की नई शुरुआत होती हैं.

मुमकिन है परिवर्तन दर्द भरा हो .

गर्भस्थ शिशु नहीं जानता ,

आगे क्या है ?

कष्टपूर्ण जन्म के बाद

सामने ज़िंदगी इंतज़ार करती मिलती है !!!

नुक़्स

उम्र जाया कर दी लोगों ने औरों के

वजूद में नुक़्स निकालते- निकालते.

इतना ख़ुद को तराशा होता

तो फ़रिश्ते बन जाते .

— गुलज़ार

कच्ची मीठी धूप

सुबह की कच्ची मीठी धूप

दिवस के बीतते प्रहर के साथ

रवि के प्रखर प्रहार से बेनूर आकाश से

तपती धरती पर आग का  गोला बन

गर्दो गुबार से हमला करता है। 

खुश्क  हवाअों की चीखें….

कभी शोर करतीं, कभी चुप हो जातीं हैं।

जलाता हैं सबको मई- जून।

 भङकता सूरज अौर  धूल-धूसरित , खर-पतवार भरी हवा के बाद

बस इंतजार रहता शाम का या फिर बारिश का…..