शब्द

ना जाने कितने हथियार बने

कितने दवा बनी ,

पर ‘शब्द ‘ में है

सारी शक्ति ……

ख़ुशी …ग़म …. पीड़ा … या तस्सली

देनी हो .

मीठे – खट्टे शब्द या बोली हीं

काफ़ी है.

जिंदगी के रंग -68

कौन हो तुम सब ?

धुँधली आकृति ने कहा –

इतनी जल्दी भूल गए ?

मैं तुम्हारा बीता  कल हूँ .

कल तुम्हारा अनमोल आज था .

दूसरे ने कहा मैं तुम्हारा आज हूँ

कल जिसे तुम ,

आने वाला कल मानकर

स्वागत की तैयारी में थे .

और यह तुम्हारा आनेवाला कल है

जो जल्दी ही हमारी तरह बीत जाएगा .

यह तो जीवन चक्र है

आना जाना सृष्टि का नियम है .

हँस कर जी लो ज़िंदगी को ,

जी भर कर ,

हाल

क्या हाल है ?

छोटा सा सवाल है .

पर कई बार हालात,

हाल पूछने से भी

ठीक लगने लगते है .

कोई अपना है

यह अहसास ही अच्छा

लगने लगता है .

टूटते रिश्ते , टूटते दिल

टूटते सितारे

टूटते शीशे ….आरसी…..

ना जाने क्यों बुरे माने जातें है .

बुरा तो है …..

टूटते रिश्ते ….

टूटते दिल.

पर क्यों किसी का

उस पर ध्यान नहीं जाता .

दर्द तो उसमें हीं

सबसे ज़्यादा होता है …..

युद्ध और प्रेम

युद्ध में हम

मिटाकर जीतते हैं

और प्रेम में हम

मिट कर जीतते हैं.

Unknown

कुर्सियों के कीड़े

हम बचाते रह गए

दीमक से अपना घर

कुर्सियों के चन्द कीड़े

सारा मुल्क खा गए.

Unknown

हवाएँ तय करती हैं……

चिंगारी को हवा आग बना देती है,

प्राणदायिनी बन यही जीवन दान देती है।

बाँस से गुजर उसे बाँसुरी बना मधुर सूर गुँजा देती है।

किसी को तौलने से पहले ,

यह समझना जरुरी है कि व्यवहार

हवाएँ तय करती हैं……..

ख़्वाहिशों के क़ाफ़िले

ख़्वाहिशों के क़ाफ़िले बड़े अजीब होते हैं…

ये गुज़रते वहीं से हैं जहाँ रास्ते नहीं होते…!!

 

 

 

unknown

जिजीविषा -जीने की चाह, Will to live

सूर्य के उदय से अस्त होने के साथ घटती आयु,

जन्म, जरा, कष्ट, और मृत्यु को देखकर भी मनुष्य को भय  नहीं होता।

आशा , तृष्णा, राग- द्वेष, तर्क-वितर्क,  अधैर्य , अज्ञान-वृत्ति-दर्प-दम्भ रूपी भंवर

से पार पाना  है कठिन ।

कायांत या शरीर का अंत,  अंतअमरत्व स्वाभाविक अवस्था है……

अनश्वरता एक भूल है……..

जिजीविषा  का संहार करने वाले काल है शाश्वत सत्य……..

यह सारा सत्य जान कर भी सभी

 जगत के मोहरूपी मादक मदिरा में ङूब जाते हैं।

श्मशान-वैराग्य

एक अोर बहती कलकल गंगा,

तट पर विशाल अश्वत्थ तरु

अौर दूसरी अोर श्मशान काली की 

भव्य प्रतिमा, रक्त रंग

जवा पुष्प माला में । 

घाटों पर बाँसों का स्तुप।

राह किनारे बिकते रामनामी…….

गुजरते उस राह से मन वैराग से  

…..श्मशान-वैराग्य से भर उठता।

पर कितना विचित्र है यह मन?

संसार की नश्वरता का एहसास

वह क्षणिक वैराग्य

जो श्मशान में  संसार की असारता से उत्पन्न होता है,

संसार के मोह-माया में आते, क्षण में हीं

लुप्त भी हो जाता है। 

 

 

वैराग्य – संसार की असारता।

 श्मशान वैराग्य-श्मशान में जाकर  हुआ क्षणिक वैराग्य।