तारीखें चुभती है!!

जाना जरूरी था,
तो कम से कम इतनी राहत
इतना अजाब तो दे जाते…
आँखों में सैलाब दे जानेवाले,
कैलेंडर के जिन पन्नों के साथ हमारी जिंदगी अटकी है।
उसमें से कुछ तारीखें तो मिटा जाते ।
ये तारीखें चुभती है।
 

 

 

 

 

 

कैद तारीखों का

दीवार पर लगे कैलेंडर पर
आज भी तारीख और साल वही है ।
ठहर गई है वह तारीख जिंदगी में भी ।
रिहा कर दो , बख्श दो तारीखों के कैद से ।
हाजिरी लगाना दर्द देता है इस मुकदमे में।

 

 

धर्म… मजहब…

धर्म…मजहब …वह महासागर है.

जो मानव मन में विकसित होता है।

अनंत रूपों में, विविधताएँ लिये।

पशु से प्रकृतिक पूजा……

व्यक्ति से अव्यक्ति,  आकार से निराकार रूप,

सूर्य, चांद, संगीत, नृत्य सभी को पूजते हैं।

मूर्त से अमूर्त, देवी देवताओं से सर्वोच्च प्रभु तक,

यह एक विस्तृत परंपरा है,

जो चिंतन है, जिज्ञासा  है

इसकी पहुँच स्थुल से सुक्ष्म आत्मिक मंडल तक है,

अंतर्मन तक है।

खुद अपने आप की !

मन की कल्पना शक्ति को, खुद को अौर अपने

जीवन को बदलने के लिए केवल एक व्यक्ति

 की आवश्यकता होती है, खुद अपने आप की !

जिंदगी के पन्ने

जिंदगी के किताब के पन्ने,

हवा के शरारती झोंके से,

फड़फड़ाते शोर मचाते पलटते देखा।

 खूबसूरत नाजुक, लम्हे फिसलते देखा,

बेइंतहा इम्तिहानो से जिंदगी को गुजरते देखा,

जरूरत के वक्त रिश्तो को बदलते देखा,

पुराने फीके, पीले पन्नों जैसे फीके पङते यादों को जी कर देखा।

बस इतना ही समझ आया –

 कभी समय नहीं गुजरता और कभी-कभी समय नहीं ठहरता।

और वक्त गुजरने में वक्त नहीं लगता।

कभी कभी टूटने दो हमें !!

शब्दों से…सहारे से…ना समझाओ हमें,

कि हमने सब संभाल रखा है बड़े अच्छे से।

 जब हम न संभाल सकें

     टूटने दो हमें भी कभी कभी ……..

 चाह नहीं है हमें हमेशा पहाड़ों को जीतने की।

कभी कभी पेड़ों के झुरमुट में चुपचाप चलना,

चँद बुंद आँसू बहाना भी अच्छा लगता है.

जादुई घड़ी

यह बाल मनोविज्ञान पर आधारित कहानी है।

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यह कहानी बच्चों  अौर बङों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है।  मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। सच कहा जाय तब  प्रेरणा, बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति बच्चों के साथ-साथ बङों के लिये भी उपयोगी अौर महत्वपुर्ण है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है। 


दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- अरे, तू जाग गया है? आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? “मंदिर बेटा” – दादी ने बताशे अौर मिश्री देते हुए कहा। आशु को बताशे स्वादिष्ट टाफी सा लगा। उसके सोंचा, अगर वह भी मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। उसने दादी से पूछा – दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या? दादी ने पूछा – तुम सुबह तैयार हो जाओगे? हाँ, पर दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम सुबह कैसे जाग जाती हो?
दादी ने कहा – मेरे तकियों में जादुई घड़ी है। वही मुझे सुबह जगा देतें है। लो, आज इस तकिये को सच्चे मन से अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। पर आशु, सही समय पर सोना तकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। उस रात वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।
आशु स्कूल की छुट्टियों मेँ दादी के पास आया था। दादी से जादुई तकिये की बात सुनकर बड़ा खुश था क्योंकि उसे सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। मम्मी से डांट पड़ती। कभी स्कूल बस भी छूट जाती थी।
अगले दिन सचमुच वह सवेरे जाग कर दादी के साथ मंदिर गया। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।
आशु को दादी के साथ रोज़ मंदिर अच्छा लगने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। आज मंदिर जाते समय आशु को अनमना देख,दादी ने पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा? आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – दादी, छुट्टियों के बाद, घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।
दादी प्यार से कहने लगी – आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है।यह तुम्हारे इच्छा शक्ति या आत्म-बल के कारण होता है। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हमेँ नियत समय पर नींद या भूख महसूस होती है। इसे मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकतें हैं। यह घड़ी प्रकृति रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास या इच्छा शक्ति द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।
आशु हैरान था। इसका मतलब है दादी, मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था? दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – आज रात तुम बिना तकिये की मदद लिए, अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना। आशु नें वैसा ही किया। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसे अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया।

चराग़-ए-रहगुज़र

रहगुज़र पर, दूसरों को

इतना भी राह ना दिखाओ.

कि अपनी हीं राह…….

अपनी ही मंज़िल भूल जाओ.

चराग़-ए-रहगुज़र खड़े

रह जाते हैं राहों में.

और कारवाँ ….राही…. गुज़र जातें हैं.

 

अर्थ –

चराग़-ए-रहगुज़र- lamp on the way.

रहगुज़र– path, road.

ज़िंदगी के रंग- 186

“You have to keep breaking your heart until it opens.”
― Rumi

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चुभते, बेलगाम,  नुकीले आघातों से टूटना,

दस्तुर-ए- ज़िदंगी है। 

पर किसी को तोङना क़सूर है।

दूसरों को तोड़ने की कोशिश

वही करते हैं, जो ख़ुद टूटे रहते हैं.

इसलिये हौसला हारे बिना 

लगे रहना, आगाज-ए- जीत है।

मुरली प्यारी है या मोर मुकुट?

विष्णु के अष्टम अवतार, 

देवकी के आठवें पुत्र,

अष्ट पत्नियाँ– रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा,

कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मण को

राधा को, मीरा को, गोपियों को, 

 कान्हा क्यों सभी को अच्छे लगते हैं ?

  मुरली प्यारी है या मोर मुकुट? या स्वंय केशव?

कोई नहीं जान पाया…..

बस इतना हीं काफी है – वे अच्छे लगतें हैं।