समय कब कहता है – वह सही है?
शिद्दत से सही वक्त ढूँढना पङता है।
कई बार सही समय ढूँढने में
वक्त हीं फिसल जाता है हाथों से।


जी लो ज़िंदगी, जैसी सामने आती है.
क्योंकि ज़िंदगी कभी वायदे नहीं करती.
इस लिए शिकायतें बेकार है.
और कुछ बातों हम बदल नहीं सकते.
इसलिए अपने आप से शिकायतें बेकार है.
छोटी-छोटी ख़ुशियों में छिपी हैं बड़ी ख़ुशियाँ ,
छोटी दीवाली से मना लो बड़ी दिवाली .
शुभ छोटी दीवाली!!!
एक बात तय है
आजाद खयालों ,
विचारों का होना….
चट्टानों पर सर पटकने…टकराने,
आंधी और तूफान से
लड़ने जैसी चुनौती है।

आसमान छूने की चाहत छोड़,
कैद कर लिया है अपने को,
अपनी जिंदगी को,
खुले दरवाजे और शीशे की कुछ अजनबी दीवारों, खिड़कियों में।
जैसे बंद पड़ी किताबें,
कांच की अलमारी से झांकती हैं अपने को महफ़ुज मान,
पन्नों में अपनी दास्तानों को कैद कर।
अब खाली पन्नों पर,
अपने लफ्ज़ों को उतार
रश्म-ए-रिहाई की नाकाम कोशिश कर रहें हैं।
गीले आँखों से बरसते सैलाब को
देख जाती हुई बारिस ने भी
रुक कर साथ देना तय कर लिया है.

किताब-ए-ज़िंदगी
का पहला सबक़ सीखा।
रिश्तों को निभाने के लिए,
अपनों की गिलाओ पर ख़ामोशी के
सोने का मुल्लमा चढ़ना अच्छा है।
पर अनमोल सबक़ उसके बाद के
पन्नों पर मिला –
सोने के पानी चढ़ाने से पहले
देखो तो सही…
ज़र्फ़….सहनशीलता तुम्हारी,
कहीं तुम्हें हीं ग़लत इल्ज़ामों के
घेरे में ना खड़ा कर दे.



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