चाँद कहाँ रहते हो तुम?

पूछा जलते और ढलते सूरज ने।

तपन के बावजूद हम साज़िश करते रहते है

ताकि चाँद तुम दमक सको

मेरी प्रतिबिंबित रोशनी से।

मिलन ना लिखा हो हमारा।

पर ख्वाहिश है कि

चाँद तेरी दूधिया चाँदनी चमके

आफ़ताब….सूरज की रौशनी से।

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