शिव ने कहा –
मैंने तो बस अपने देश
को धो कर वैसा हीं बनाना चाहा
जैसा तुम्हें दिया था .
क्यों तुम ने इसे अपने मन का बना लिया ?
शोर मचा रहे हो ..,.
श्रावण मेरा धरती पर आने
जल वर्षा करवाने का मौसम है .
क्यों रोते हो ?
तुम्हारे अतिक्रमण को देख
मैं तो नृत्य ….तांडव ….कर रहा हूँ
और ख़ुद हीं आँसू बहा रहा हूँ .

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया
(ब्लॉगर पवन के सौजन्य से सभी के लिये शुभकामनाएँ)
Meaning
अतिक्रमण – Encroachment
😦 😦
हाँ, गलतियाँ हुवी हमसे
प्रयास होगा ना हो कल से
पर इस दुःख की घड़ी में
कर सको तो करो सहाय
पर ये तो ना करो ‘सहाय’
की हमें रोना आ जाये
हमारी दर्द भरी चीख को
शोर का नाम दे रहे हैं
हम मांग रहे हैं
बिजली पानी और रोटी
मिल रही है सिर्फ खरी खोटी |
हाँ , हमें संभल जाने दो
अपनो को जला, दफनाने दो
फिर जितना चाहो हमें कोसना
हमें होगा कोई अफ़सोस ना
हमें वही मिला जो था बोया हुवा
पर आपकी संवेदना को क्या हुवा ?
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बहुत आभार इस कवितामय उत्तर के लिए .
आप मेरे बारे में शायद पूर्वधारना ग्रस्त है .
यह कविता कुछ सुनाना या संवेदना हीन होना नहीं है. मैंरे परिवार ने भी
सामर्थ्यानुसा एक समुचित सहयोग राशि दिया है इस महान कार्य के लिए .
आपकी पंक्तियाँ मुझे देश के कुछ नेताओं की याद दिला रहे है –
“प्रयास होगा ना हो कल से “.
हर वर्ष नेताजन भी यही कहते हैं. करोड़ों रुपए इस मद में आते और चले जातें हैं.
अगले वर्ष वही बाढ़ वही तबाही वही रुपयों का आवंटन .
आप हर वर्ष के बाढ़ और नुक़सान के आँकड़े जानते है क्या अपने देश के ?
मेरी कविता प्राकृतिक के साथ किए गए अन्याय और उसके परिणाम पर है .
मुझे खेद है कि मेरी कविता आपको पसंद नहीं आई . आप अपने विचार
अच्छे / positive तरीक़े से भी कह सकते थे .
आशा है अब आप ऐसे कटु कविता से मुझे कृतज्ञ नहीं करेंगे .
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रेखा सहाय जी,पूर्वधारणा का सवाल ही नहीं है क्योंकि मैं आपको निजी तौर पर जानता भी नहीं हूँ ना ही मेरा ध्येय कोइ निजी टिपन्नी करने का था ! यह मेरी निजी सोच है की आलोचना का अपना एक अलग वक़्त होता है ! आपकी कविता ने शिवजी के उदाहरण के साथ बहुत सुन्दर तरीके से प्रकृति के साथ हुवे अन्याय को दर्शाया है पर बातें कुछ खल गईं , कुछ चुभ सी गईं उसी टीस का परिणाम था की लिखा गया !
शायद लगातार आपदाओं के दृश्य देखते रहने के कारण भी मेरी प्रतिक्रिया में तल्खी आ गई | बहुत संभव है कि आज जब स्तिथि सामान्य के ओर अग्रसर हो रही है तब आपके शब्द इतने खारे ना भी लगते ! उस समय तो यही लगा था मानो किसी पिता को, जो अपने मरणासन्न पुत्र को हाथों में लिए अस्पताल की और दौड़ा जारहा है, यह कहा जाये की पहले तो इलाज़ ढंग से कराया नहीं , अब भुगतो ! बजाय यह कहने के कि , “अरे ये क्या हुवा, चलिए कुछ दूर मैं ले चलता हूँ “!
मुझे खेद है की आपने इसे कुछ ज्यादा ही personal ले लिया, मेरा कोई भी निजी आक्षेप करने का इरादा नहीं था | इसी तरह के काफी पोस्ट Social media पर थे जो केरल वासियों को उनकी गलतियाँ गिना रहे थे, आइना दिखा रहे थे , बहुत कष्ट होरहा था ! आज भी हैं पर अब मन की प्रतिक्रिया में उत्तेजना नहीं है | जानकार हर्ष हुवा की आपलोगों ने भी अपना सहयोग प्रेषित किया है ! साधुवाद आपको | आशा है मैं अपना पक्ष आपको समझा पाया होऊंगा , आप सहमत नहीं भी हो सकती हैं पर जो सच है मैंने वही आपके समक्ष रखा है |
आपकी प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद ऐसा तो लगा शायद मेरे शब्द कुछ ज्यादा तीक्ष्ण हो गये थे , पर रेखा जी यह बात तय है की मेरा इरादा एक प्रतिशत भी किसी प्रकार की निजी टिपण्णी करने का नहीं था ! सच है की वो मेरे मन की व्यथा थी जो फूट पड़ी |
आपको हुवी पीड़ा के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ! आपकी इस बात से पूर्णतया सहमत हूँ कि “आप अपने विचार अच्छे / positive तरीक़े से भी कह सकते थे” .आशा है भविष्य में अपनी प्रतिक्रिया पर कुछ अंकुश लगा पाऊंगा | धन्यवाद
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बहुत आभार !
मैं कबीर की इन बातों पर यक़ीन करतीं हूँ-
“निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।”
मैंने बहुत से ब्लॉगर मित्रों से आलोचक बनने का अनुरोध कर बड़ा लाभ पाया है . इसलिए मैंने आपकी आलोचना का बुरा नहीं माना है .
बल्कि आपसे मेरा अनुरोध रहेगा आलोचक बनने का . आपकी कविता में मेरे सरनेम होने से मुझे ऐसा कहना पड़ा .
रविंद्र जी , जहाँ तक जानाने की बात है , तो ब्लॉग की अपनी दुनिया है . जिससे हमारे सम्बंध बनते हैं पाठक , मित्र और आलोचक बन कर .
आपकी टीस को मैं समझ सकती हूँ और मेरी पूरी सहानुभूति आपके साथ है . सच यह है की सभी लोग इस घटना से दुखी और व्यथित हैं.
मेरी शिकायत व्यवस्था और राजनीतिज्ञों से ज़रूर है . इस कविता के बाद इसी विषय पर Indiblog ब्लॉग से आए आमंत्रण मेल के अनुरोध पर मैं एक और कविता पोस्ट करने वालीं हूँ . आशा है यह आपकी व्यथा पर मरहम का काम करेगा . अगर कुछ कमी लगे तो आवश्यक इंगित करेंगे .
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जी , मैं समझ रहा था कि शायद उसी कारणवश बात अधिक गहरी हो गयी, पर ये संजोग है की help के लिए आपका Surname उचित लग रहा था ! 😊! मैं बहुत आसानी से अपनी बात आपको समझा पाया , एक बड़े ह्रदय वाला ही इतनी सहजता से सारी बात समझता ! धन्यवाद ! आपकी नई प्रस्तुती का इन्तजार रहेगा !
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आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार .
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बिल्कुल सही।
प्रकृति की मेज सीमित हैं।
छोटा परिवार सुखी परिवार,सुखी संसार।
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ठीक कह रहे है आप. हम प्रकृति को अपने अनुसार चलाने लगते है और तब यह रूष्ट हो जाती है .
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ye kerla ka apki kavita padhkar hi sanket kiya hai.
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Acchaa. Bahut aabhar.
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बहुत सही कहा आपने
ग़लतियाँ हम से ही होती हैं और उसका परिणाम बहुत भयंकर होता है
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बहुत शुक्रिया अफ़ज़ल.
कुछ राज्यों में लगभग हमेशा बाढ़ आता है , जैसे बिहार असम वग़ैरह . ना हम प्रकृति से ताल मेल करना सीख रहे है ना disaster management के विशेष ठोस क़दम उठाए जातें हैं. मुझे यह बड़ा तकलीफ़देह लगता है .
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तक़लीफ़दह तो होता है। लेकिन हमारे पास करने को सीमित कार्य हैं। दुःख तो और ज़्यादा तब होता है जब कि हम सहायता न कर सकें । या जो सहायता कर सकते हैं वो न करें । अक्सर देखने,सुनने में आता है कि पीड़ितों से लोग निर्धारित मूल्य से अधिक की माँग करते हैं ₹2 की वस्तु के ₹20-₹25 लेते हैं और दूसरी ओर लोग मुफ्त में सुविधा उपलब्ध कराते है। तब और दुःख होता है । हमारी ईश्वर से प्रार्थना होनी चाहिये।
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साफ़ मन से , दिल से दुआ करना भी सहायता है , भले नज़र ना आए . जो हम सब कर रहे हैं.
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क्या ही अच्छा विचार है
बिल्कुल मैम
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शुक्रिया अफ़ज़ल. 😊
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बिल्कुल सहमत…
प्रकृति के संग रोज हो रही छेड़छाड़ पर विध्वंस संग विरोध दर्ज तो करेगी ही।
अब भी नही चेते, तो हम आप कोई नही बचेगा पृथ्वी पर।
प्रार्थना करते हैं,
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया🙏🙏
Sorry, Kafi dino se passive mode me hu… Jisase rachnayen padh nhi paa raha aapki…
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हाँ मुझे भी यह बात कष्ट पहुँचाती हैं. आख़िरकार हम कब सुधरेंगे ?
अगर देश की तरक़्क़ी चाहिये तो सभी का समझदारी भरा योगदान चाहिए .
इस नासमझी का कारण केरल जैसा सबसे पढ़ा लिखा और ख़ूबसूरत राज्य तकलीफ़ झेल रहा है . लाखों लोग कष्ट में हैं. उनसे मेरी दिली सहानुभूति है .
बहुत बहुत आभार पवन अपने विचार लिखने के लिए .
Sorry की ज़रूरत नहीं हैं. 😊व्यस्तता तो जीवन में लगी रहती है .
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बहुत बहुत ❤️🙏
हिंदुस्तान भारत, जब से इंडिया बना हैं। भुखमरी मानसिकता, सबकुछ तबाह- स्वाहा करने में विचित्र योगदान दे रही हैं।
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आज़ादी के बाद देश के लिए जो ज़रूरी था उस पर ध्यान हीं नहीं दिया गया . कुछ देशों ने बेहद तरक़्क़ी की और हम आज भी उन्ही समस्याओं में उलझे है , जो तब थे – बाढ़ , ग़रीबी , बढ़ती आबादी , आशिक्षा ….
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तुम्हारी प्रार्थना मैं अपने ब्लॉग में डाल रही हूँ
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सौभाग्य हैं मेरा ये🙏
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धन्यवाद 😊
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आपकी प्रतिक्रिया हमेशा मुझे प्रोत्साहित करती है मैम। कम शब्दों में सब -कुछ बयां करना मेरी कला तो नही पर मैं आपके अनुरोध को स्वीकार करता हूँ। 🙂
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धन्यवाद कुमार .
तुम्हारे सारे लेख मुझे बहुत पसंद आते हैं . तुम हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दों पर लिखते हो .
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बहुत सही लिखा आपने…रेखा जी
प्रकृति से जितना खेलेंगे
प्रकृति उतना हमे वापस देगी
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हाँ और यह हम सब जानते हैं पर मानते नहीं . इतने dams and deforestation करते हीं जा रहें हैं.
बहुत आभार जय .
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सु स्वागतम् रेखा जी😊
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धन्यवाद जय !
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