कहते हैं-
हम सब खाली हाथ आये थे।
खाली हाथ जायेंगें।
पर हसरते-अरमानों का क्या होगा?
ना जाने कितनी अधुरी -बाकी
तमन्नायें, अरमान, चाहतें, हसरतें …..
सभी साथ जायेंगीं।
कहते हैं-
हम सब खाली हाथ आये थे।
खाली हाथ जायेंगें।
पर हसरते-अरमानों का क्या होगा?
ना जाने कितनी अधुरी -बाकी
तमन्नायें, अरमान, चाहतें, हसरतें …..
सभी साथ जायेंगीं।
हसरतों को ना पालों ज़िन्दगी मे
ये ज़िन्दगी को मुसीबत बना देते हैं
काटते है ज़िन्दगी जो सुकून से
वो अरमानों के साये में नही जीते हैं।
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बेहद खूबसूरत ! ! ! किसकी लिखी पंक्तियाँ हैं ये क्या मैं इन्हें share कर सकती हूँ ?
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मैने खुद लिखी है। आपको पसन्द आयी, शुक्रिया । आप शेयर करें।
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Thank you 🙂
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बिलकुल सही कहा है रेखा जी आपने । टी.वी. धारावाहिक हसरतें के एक गीत का ज़िक्र तो मैंने आपकी एक दूसरी पोस्ट पर किया ही है : ‘हसरतें ही हसरतें हैं और क्या है, ज़िंदगी का नाम ये ही दूसरा है’; इस बात पर मुझे सुरेन्द्र चतुर्वेदी जी की एक ग़ज़ल भी याद आ रही है जिसका पहला शेर है : ‘पलकों में उसने इस तरह सपना छुपा लिया, जैसे किसी ग़रीब ने दुखड़ा छुपा लिया; मुरदे के साथ ख़्वाहिशें सब दफ़्न हो गईं, मिट्टी के इक मकान ने क्या-क्या छुपा लिया’ । बाज़ लोगों की ज़िंदगी में वो वक़्त भी आता है रेखा जी जब न हसरतें रहती हैं, न ही उनके पूरे होने की उम्मीद ।
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सुरेंद्र जी की ग़ज़ल बड़ी अच्छी है . मैं इंटरनेट पर खोजकी कोशिश करूँगी .
आपकी लिखी अंतिम पंक्तियाँ सही और मर्म को छूने वाली हैं .
बहुत शुक्रिया अपने विचार share करने के लिये .
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Ji!
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Thank you so much.
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Sahi hai
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Thank you 🙂
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