जिन्दगी के रंग — 39

जीवन की परिभाषा 

और जीवन  मेंअपनी  परिभाषा

 ढूँढते ढूँढते   कई परिभाषाएँ बनी,  

बनती गई……  और  कई मिटी भी ……

पर यात्रा जारी हैँ 

किसी  शाश्वत और सम्पूर्ण 

परिभाषा  की खोज में …….

6 thoughts on “जिन्दगी के रंग — 39

  1. बहुत खूब लिखा आपने।।
    कोई राम कोई कृष्ण बना,
    कोई बुद्ध बन
    समझा और समझाया,
    युग बीते सदियाँ गुजर गई
    मगर आज भी
    शाश्वत और सम्पूर्ण परिभाषा की
    खोज जारी है।।

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    1. आप मेरी कविताअों को , उने अर्थ अौर मर्म को बङे अच्छे से समझते हैं अौर उसके अनुकूल काव्यात्मक उत्तर देतें हैं जो मेरे लिये बङे सम्मान की बात है। आपका बहुत आभार इन सौंदर्यपुर्ण पंक्तियों के लिये !!! 🙂

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