मौन अौर चीखें

 

कभी लगता है हम शब्दों से परे हैं।

हम मौन में जीते हैं।

पर फिर लगता है,

कुछ कानों तक

हवा में घुली चीखें भी  नहीं पँहुचती

फिर  मौन की आवाज़

सुनने का अवकाश किसे है????

24 thoughts on “मौन अौर चीखें

  1. मौन की भाषा को प्रेम, भावनाओं और विचारों की गहनता को आत्मसात् करने वाले ही बूझ सकते हैं और उसका आनंद ले सकते हैं । एक ग़ज़ल की पंक्तियां हैं – ‘अधरों पर शब्दों को लिखकर मन के भेद न खोलो, मैं आँखों से सुन सकता हूँ, तुम आँखों से बोलो’ । इसी बात पर मुझे अमित कुमार जी और आशा भोसले जी द्वारा गाया हुआ योगेश जी द्वारा रचित और राजेश रोशन जी द्वारा संगीतबद्ध युगल गीत याद आ रहा है – ‘ न बोले तुम न मैंने कुछ कहा, मगर न जाने ऐसा क्यूँ लगा कि धूप में खिला है चाँद दिन में रात हो गई, कि प्यार की बिना कहे-सुने ही बात हो गई’ । सच तो यह है रेखा जी कि जो संवेदनशील है, वह मौन पीड़ा को भी अनुभव कर लेता है और जो संवेदनहीन है, उस पर तीव्र आर्तनाद का भी कोई प्रभाव नहीं होता । मौन की भाषा उसी के लिए है जिसके हृदय में संवेदना व्याप्त है ।

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    1. आप हमेशा इतने सुलझे -सहज शब्दों में काव्यमय रुप में अपनी बातों को रखते है कि सारे अर्थ खुद ब खुद स्पष्ट हो जाते है .

      यह ग़ज़ल तो मेरे लिये नई है पर बड़ी सुंदर है . ना बोले तुम ….गीत मुझे बड़ी पसंद है .

      आज के परिपेक्ष्य को देखते हुए मैंने इस कविता को लिखा है . आपकी बातों से मैं पूर्ण रुप से सहमत हूँ . सम्वेदनाएँ जैसे कम होती जा रहीं है . तहे दिल से आपका आभार .

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      1. आभार रेखा जी । साहिर लुधियानवी साहब की एक बहुत पुरानी मगर दिल को छू लेने वाली नज़्म है – ‘तुमने कितने सपने देखे, मैने कितने गीत बुने; इस दुनिया के शोर मे लेकिन दिल की धड़कन कौन सुने ?’

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      2. बहुत खूब !!! काश मेरे पास भी शायरियोँ, गीतों का संकलन होता, वे मेरे लेखन में प्रेरणास्रोत बन जाते। आभार।

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  2. मौन की आवाज सुनने के लिये दिल का होना जरूरी है । मौन पर मौन रखने से मौन की चीख सुनना मुमकिन नहीं। मौन को शब्द से ही सुना जा सकता है।

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    1. आपकी बात बिलकुल सही है, लेकिन कुछ लोग आवाज़ भी नहीं सुनते हैं। या सुनना नहीं चाहते हैं।

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      1. After revealing and getting revealed and relieved about various intellectual and emotional associations (esp literary , musical ) why a pseudo address … so I requested .. otherwise the Bard (Skp ) already said there is nothing in the name …

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      2. वैसे लोग तो खुद की अंदर की आवाज भी नही सुनते तो दूसरोंकी आवाज क्या वो खाक सुनेंगे । नोबेल विजेता लेखक कवि पाबलो नेरूदा कहता है :

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      3. *नोबेल पुरस्कार विजेता स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता “You Start Dying Slowly” का हिन्दी अनुवाद..*

        1) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:*
        – करते नहीं कोई यात्रा,
        – पढ़ते नहीं कोई किताब,
        – सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
        – करते नहीं किसी की तारीफ़।

        2) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप:*
        – मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
        – नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।

        3) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:*
        – बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
        – चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
        – नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
        – नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
        – आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।

        4) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:*
        – नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।

        5) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:*
        – नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
        – अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
        – अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
        – अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..।
        *तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं..!!*

        *इसी कविता के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

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      4. इस कविता Share करने के लिये दिली आभार ! लाजवाब कविता है , हर शब्द में सच्चाई है .
        बहुत पहले यह कविता पढ़ी थी . फ़िर से पढ़ कर अच्छा लगा .😊😊

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      5. I knew you must have read it , it was just in association with the theme of your poem ‘maun aur cheekhe’ that I quoted it here … great men and women think and feel alike

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