स्वर्गीय शैलेंद्र जी का लिखा हुआ, शंकर-जयकिशन द्वारा संगीतबद्ध और तलत महमूद साहब द्वारा अपनी रेशमी आवाज़ में देव आनंद के लिए गाया हुआ ‘पतिता’ (1953) फ़िल्म का अमर गीत है – ‘हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’ । इसी गीत के अंतिम अंतरे के शब्द हैं : ‘पहलू में पराये दर्द बसा के हँसना-हँसाना सीख ज़रा, तू हँसना-हँसाना सीख ज़रा; तूफ़ान से कह दे, घिर के उठे, हम प्यार के दीप जलाते हैं’ । शायद खलील जिब्रान भी कुछ इससे मिलती-जुलती बात ही कह रहे हैं रेखा जी । सुरीलेपन का सोज़ से गहरा नाता है । और यह सोज़ किसी नेक के दिल में ही उभरता है ।
स्वर्गीय शैलेंद्र जी का लिखा हुआ, शंकर-जयकिशन द्वारा संगीतबद्ध और तलत महमूद साहब द्वारा अपनी रेशमी आवाज़ में देव आनंद के लिए गाया हुआ ‘पतिता’ (1953) फ़िल्म का अमर गीत है – ‘हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’ । इसी गीत के अंतिम अंतरे के शब्द हैं : ‘पहलू में पराये दर्द बसा के हँसना-हँसाना सीख ज़रा, तू हँसना-हँसाना सीख ज़रा; तूफ़ान से कह दे, घिर के उठे, हम प्यार के दीप जलाते हैं’ । शायद खलील जिब्रान भी कुछ इससे मिलती-जुलती बात ही कह रहे हैं रेखा जी । सुरीलेपन का सोज़ से गहरा नाता है । और यह सोज़ किसी नेक के दिल में ही उभरता है ।
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आपने तो खलील जिब्रान के शब्दों को जीवंत कर दिया इस गीत के माध्यम से। सही कहा आपने – दर्द अौर खुशी एक साथ महानता का हीं परिचायक है।
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Ah, so lovely I exhaled a sigh 🙂
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Thank you 😊Diana.
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