मंदिर- कविता

मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे….

में हम सब के  जलाये , 

अगरबत्ती, मोमबत्ती, दीप……..

जलने के बाद

इनकी  धूम्र रेखाएं अौर  रौशनी

आपस में   ऐसे घुलमिल जातीं हैं,

अगर चाहो भी तो अलग नहीं कर सकते।

हम कब ऐसे घुलना-मिलना सीखेंगे?

 

image courtesy internet.

 

20 thoughts on “मंदिर- कविता

  1. हम तब मिलना सीखेंगे या यूं कहु की तब मिल जाएंगे जब हम अपने ईगो को साइड में रख कर एक रिश्ता बनाने की कोशिश करेंगे सही तो यही है और सच भी की आज भी हम स्वार्थ से इतना क्यों जुड़े है ?जबकि हमे सच और नैतिकता के साथ जीवन जीना चाहिए तभी वास्तविक खुशी और आनंद मिल सकेगा अन्यथा कभी नही ……..!

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  2. हम एेसे मिलना तब सिखेंगे ???
    जब लोग जाती वाद मिटा देंगे,
    उच निच का रिश्ता तोड़ देंगे !
    जब लोग इंसानियत को समझेंगे
    उस दिन हम दिन आग को आग मे मिलाना सिखा देंगे!!!

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      1. मोहब्बत ने इतिहास बनाया है, हिर को रांझा से मिलाया है.
        अगर मन सच्चा है ,तो कोशिश कर
        क्यो की इंसान ने ही इंसान को बनाया है !!

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  3. मोहब्बत जब सिर झुकवा सकती है,
    तो जाती वाद भी मिटा सकती है

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