भाषा बाधा नहीं, अभिव्यक्ति है – कविता #EnglishAttacks

Language is not a barrier but a medium of expression.


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भाषा बाधा नहीं, अभिव्यक्ति है।

वैश्विक होती दुनिया के सिमटने  से,

एक -दूसरे से बातचीत करने के लिये

एक  आम माध्यम तो चाहिये।

              कभी

एक समय था जब अँग्रजी राज में सूरज डूबता नहीं था।

तभी से उनकी भाषा ने भी  राज किया।

अँग्रेज  तो चले गये,

पर अगर आज भी हम उनकी भाषा की गुलामी

करते हैं , तब यह हमारी कमजोरी है।

  क्योंकि

भाषा कोई भी हो, चमक बोलनेवाले में होती है।

मातृभाषा से ज्यादा  मधुर कुछ भी नहीं ।

भाषा बाधा नहीं, अभिव्यक्ति है !!!!!

शब्दार्थ / word meaning

अभिव्यक्ति – medium of expression.

वैश्विक-global.

आम – common.

l

IndiSpire Topic –

Does speaking well in English add a sparkle to the personality of a person? If ‘yes’, then do you feel it is right? Share your views. #EnglishAttacks

42 thoughts on “भाषा बाधा नहीं, अभिव्यक्ति है – कविता #EnglishAttacks

  1. रेखा जी, सही कहा आपने, भाषा कभी भी बाधा नहीं हो सकती। सुंदर प्रस्तुति।

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    1. भाषा को मान-सम्मान से जोङ कर देखने के बदले, हम इसे आदान-प्रदान का माध्यम मानें तो ज्यादा सही होगा। कविता पसंद करने के लिये धन्यवाद ज्योति जी।

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  2. Angrezi me zaroor baat kare kyunki agar koi humara bhasha nahi jaanta ho to unko apni baatein samjhane me asaani hogi. Parantu maatru bhasha ko na bhoole aur na kam samjhe.. Jaise aapne kaha us se madhur aur kaunsi ho sakti hain

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    1. हर भाषा का सम्मान करना चाहिये। तभी लोग हमारी भाषा का सम्मान करेगें। सच यही है कि अपनी भाषा सुनने अौर बोलने के सुख का अहसास अलग हीं होता है।

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  3. कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कहने के लिए हमें कोई भाषा जानने के जरूर नहीं होती….

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  4. ‘भाषा कोई भी हो, चमक बोलने वाले में होती है’ । बिलकुल ठीक कहा रेखा जी आपने ।

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    1. धन्यवाद जितेंद्र जी. हमारे विविधता भरे देश में ढेर सी भाषायें बोली जाती है. फ़िर किसी भाषा को कम या ज्यादा महत्व देना उचित है क्या?

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  5. और चन्दन दास की गाई हुई एक सुंदर ग़ज़ल के बोल हैं – ‘ मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई, जुबान सब समझते हैं जज़्बात की’ ।

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  6. बात सही है पर हमारे देश के लोगो की मानसिकता बदल चुकी है इसलिए अंग्रेजी बोलने वाले को ज्यादा ज्ञानी समझा जाता है । नकल करते करते हम अपनी ही भाषा को महत्वहीन मानने लगे हैं ।

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    1. कुछ हद तक आपकी बात सही है. पर जो वास्तव में विद्वान है और अँग्रेजी के जानकार है , वे सभी भाषा को समान इज्जत देते है.

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      1. हर भाषा और उसका साहित्य अच्छा है हमें उनसे अपना ज्ञानवर्धन करते हुए अपनी भाषा और साहित्य की उन्नति हेतु विशेष प्रयत्न करना चाहिए ।

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      2. बिलकुल सही. मेरे ख़याल में, नई भाषायें ज़रूर सीखना चहिये. नई भाषायें सीखना दिमागी कसरत ( Brain exercise ) का काम करता है. पर अपनी मातृ भाषा का सम्मान ज़रूर करना चाहिये. 😊😊

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  7. “भाषा कोई भी हो, चमक बोलने वाले में होती है” । बात तो सही है। और ये चमक लाने के लिए भी अपने संस्कारों और अपने व्यक्तित्व पर काम करना आवश्यक है। भाषा और संस्कृति का जो गहरा सम्बन्ध है उसे समझना भी अति आवश्यक है।

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    1. आपकी बातें बहुत अच्छी लगी. बोलने वाले को अगर अपनी भाषा पर अच्छी पकड़ हो तब वह कोई भी भाषा प्रभावशाली ढंग से बोल सकता है. अँग्रेजी का लाभ यह है कि यह पूरे विश्व में बोली जाती है.

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    1. “अँग्रजी राज में सूरज डूबता नहीं था ” इसका तत्पर्य है , 1946 तक सैद्धान्तिक रूप से भारत ब्रितानी रियासत माना जाता था। कभी सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश, बर्मा, सिंगापुर ब्रितानी ताज के अधिन थे और वहाँ मुद्रा के रूप में रुपया काम में लाया जाता था। इस विस्तृत राज में वास्तव में कहीं ना कहीं सूरज उदित रहता था।

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  8. यह एक बहुत बडा प्रश्न है जिसका सही-सही उत्तर शायद किसी के पास नहीं है । इस प्रकार के विचार-विमर्श मात्र हिन्दी ही नहीं, अपितु बंगाली, मराठी और गुजराती में भी देखे हैं । आश्चर्य कि बात है कि इस दिशा में कदम मात्र एक नई पत्रिका, एक नई समिति स्थापित करके समाप्त हो जाते हैं । किसी विषय या वस्तु पर गर्व होने के लिए कारण होना चाहिए । समकालीन हिन्दी साहित्य (व्यापक अर्थ में) की हालत बहुत ही खराब है । गत एक वर्ष से सभी साहित्यिक पत्रिकाओं का अनुसरण कर रहा हूँ, हिन्दी पत्रिकाएँ अन्य भाषाओं की तुलना में कहीं भी खडी नहीं होतीं । बहुत बुरा लगता है । इसके अतिरिक्त आप अखबारों का भी उदाहरण ले सकती हैं – अन्य भाषाओं, विशेषकर अंग्रेजी के अखबारों से तुलना करके देखिए । इस दिशा में गुणवत्ता सुधारने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय मेरी समझ में तो नहीं है । इसके अतिरिक्त नौकरी और कैरियर तो है ही । सभी कंपनियाँ अंग्रेजी पर जोर देती हैं क्योंकि इससे उनकी पहुँच अधिक विस्तृत हो सकती है । विज्ञान और तकनीक के क्षेत्रों की कहानी अलग ।

    अंग्रेजी के विषय में एक-दो बातें जोडूँगा । यहाँ केवल उपनिवेशवाद ही नहीं, बल्कि राजनीति, कूटनीति, भाषा-ज्ञान आदि की भी भूमिका थी । विश्व-युद्धों के दौरान जर्मन-भाषी वैज्ञानिकों पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा दिया गया था । विश्व-युद्ध समाप्त होने पर व्यापक पैमाने पर दूसरी भाषाओं, विशेषकर रूसी, से अनुवाद का कार्य किया गया (आप समझ सकती हैं, क्यों) । यह कार्यक्रम अब भी जारी है, तथा दूसरी भाषाओं में भी अपनाया गया है । अन्य भाषाओं के साहित्य का तुरन्त अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध हो जाता है ।

    इस विषय पर लिखने के लिए तो बहुत कुछ है । बाकी फिर कभी . . .

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    1. आपकी बातों से स्पष्ट है कि आपने इस विषय पर गहरी चिंतन मनन की है. यह बात मुझे अच्छी लगी.
      मेरे ख़याल में किसी भाषा का व्यापक प्रयोग उसके विस्तार पर निर्भर करता है. अँग्रेज राज़ के लम्बे चौड़े विस्तार के कारण यह वैश्विक हो गया. जैसा आपने लिखा है कूटनीति , राजनीति आदि का भी प्रभाव रहा है. आज अँग्रेजी ज्ञान इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे बहुभाषी देश में व विश्व में यह किसी अन्य भाषा से ज्यादा बोली /पसंद की जाती है. आज के प्रतिस्पर्धा वाले युग में परिवर्तन को रोकना ( change resistance ) व्यर्थ है.
      हाँ , हिन्दी या अपनी किसी भाषा को बनाये रखने के लिये हम सबों का प्रयास जारी रखना ज़रूरी है. संस्कृत कुछ वर्षों पूर्व मृतप्राय ( dying language ) कही जाने लगी थी. आज देश विदेश में हमारी देव भाषा संस्कृत के महत्वपूर्ण शोध बता रहे है की यह वैज्ञानिक और प्रभावशाली है.
      विभिन्न भाषाओं के बुरे हाल का एक कारण छपाई जगत (print industry ) का धीरे धीरे कम होते जाना भी है.

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