पूरे आस-विश्वास के साथ वह लौटी पितृ घर,
पिता की प्यारी-लाङली
पर ससुराल की व्यथा-कथा सुन,
सब ने कहा- वापस वहीं लौट जा।
किसी से कुछ ना बता,
वर्ना लोग क्या कहेगगें ?
इतने बङे लोगों के घर की बातें बाहर जायेगी, तो लोग क्या कहेगें?
( लोग सोचतें हैं, घर की बेटियों को परेशानी में पारिवारिक सहायता मिल जाती है। पर पर्दे के पीछे झाकें बिना सच्चाई जानना मुशकिल है। कुछ बङे घरों में एेसे भी ऑनर किलिंग होता है)
छाया चित्र इंटरनेट के सौजन्य से।

एक बात साफ हो गई है कि रेखा दीदी अब चुप नहीं बैठेंगी । वे अब बोलेंगी और खूब बोलेंगी पर दबे स्वर में। उन्होंने अपने लिए एक सुरक्षित और तटस्थ बंकर बनाया है जहाँ से वह लोगों को उद्देलित कर सकें पर सामने आकर सीधा और प्रत्यक्ष हमला नहीं करेंगी। लोग क्या कहेंगे वाली मानसिकता से उनके खुद के लेखन को मुक्त होने मे अभी समय लगेगा। मध्यमवर्गीय मूल्यों की रजाई छोडने का रिस्क कोई रातों-रात नही ले लेता यही कारण है कि अभी जब भी वें इन मूल्यों की देहरी लाँघने की हिम्मत जुटाती हैं असफल हो जाती हैं। प्रतिरोध की भाषा प्राकृत शब्दों से नही रची जा सकती। प्रतिरोध का स्वर देशज शब्दों में काफी “इंटेंस्ड” हो जाता है जिसे सुनने की वे आदी नही हैं। दी, आप लिखते जाइए, उम्मीद है आप इन अवरोधोे का बहुत जल्द अतिक्रमण कर जाएँगी। मुद्दों की पहचान और उनके बारीक डिटेलिंग की क्षमता अचूक है पर कभी-कभी चाक पर घूमते लोंदे को हल्की चपत भी लगानी पडती है। कविता में आप ज्यादा सहज और सुलझी लगती हैं पर मुश्किल ये है कि रचना को खुद से स्वतंत्र होने ही नही देना चाहतीं और इसी जद्दोजेहद में कविता आधे रास्ते जाकर दम तोड देती है। हम कविता को बच्चों की तरह ट्रीट नहीं कर सकते…………..।
देखिए ना दी, सोचा था सिर्फ अच्छा ही लिखूँगा पर जब लिखने बैठा तो दुनियाभर की शिकायतें यहीं लेकर बैठ गया। हे भगवान् मुझे सद्बुद्धि दो !
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धन्यवाद त्रिपाठी जी. बहुत दिनों से किसी ईमानदार समीक्षक की खोज थी. आज मेरी खोज पूरी हुई. आपका कॉमेंट अच्छा लगा. उम्मीद करती हूँ, आप ऐसे ही मेरे लेखन के सुधि पाठक और समीक्षक बने रहेंगे.
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I do not understand. Even with Google Translate I do not understand. I do not thing it is about language.
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Hi buddy , thanks for showing interest. This is about human nature -ego , false feeling of superiority. Time turns a mountain rock into sand particle. So , my question is – whether too much ego is good? Isn’t it better to be humble ?
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It is difficult to be humble when, on a universal scale, I am the equivalent of a dust mote.
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