मैं गंगा…….( प्रदूषण )

मैं गंगा…….
मैं बहुत खुश हूँ। सागर से मिलने का समय आ रहा है। बड़ी दूर से, बड़ी देर से मैं इस समय का इंतज़ार कर रही हूँ। आज़ मैं उसके बहुत करीब हूँ। मेरे दिल में उठते ख़ुशी की तरंगों को तुम सब भी देख सकते हो। मेरे पास सागर से कहने की ढेरों बातें हैं। क्या बताऊँ, उससे क्या-क्या कहना है। पूरी जिंदगी उससे मिलने की अरमान में काटा है। बस अब वह पल आने ही वाला है। क्या तुम सब तक मेरी आवाज़ जा रही है? क्या तुम मेरी खुशी को मससूस कर सकते हो? मैं गंगा…….

अचानक ख्याल आ रहा है – सागर से मिलने से पहले अपने को सजा-सँवार तो लूँ। इतनी लंबी यात्रा में मैंने तो खुद की कोई सुध ही नहीं ली। दूसरों के लिए ही जीती रही। पर आज़ तो समय है सजने का। मैंने अपने विशाल और विस्तृत रूप पर नज़र डाला और मैं अवाक रह गई। यह क्या??? ऐसी तो तो मैं नहीं हूँ। यह काला- गंदला रंग मेरा तो नहीं है। ताजगी भरी, खिली-खिली, साफ- सुथरी, खिलखिलाती, जीवन से भरपूर मेरे रूप को क्या हो गया। सिर्फ गंदगी ही गंदगी है। बिखरे कूड़े, छहलाते कचरे, सड़े फूल पत्ते, विसर्जित प्रतिमाओं के अवशेष, शमशान घाट की गंदगी, प्लास्टिक की बोतलें और सामान, मिट्टी के खंडित पात्र, शैवाल-काई, सतह पर तैरते मृत अवशेष और ना जाने क्या-क्या है। तुम मुझे गंगा कहो या हुगली, पर मैं ऐसी तो नहीं थी।

किसने किया यह सब? तुम लोगों ने तो नहीं? नहीं- नहीं, तुम सब ऐसा नहीं कर सकते हो। तुम तो मुझे जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी माँ कहते हो। मेरी पवित्रता की कसमें खाते हो।

अब मैं क्या करूँ? किसकी सहायता लूँ? शाम हो रही है। सूरज से मेरा दुख देखा नहीं जा रहा है। आसमान में चमकते हुए सूरज ने मेरा दुख बाँटना चाहा। शाम होते ही बेचारे ने अपनी लालिमा मेरे जल पर बिखेर दिया। मेरे जल की कालिमा और मटमैलापल उसमें छुप गया है। पर अपने सीने पर फैले इस गंदगी का क्या करूँ? इस डूबते सूरज के अंधेरे में अपनी गंदगी छुपा कर सागर से मिलना होगा क्या? क्या सागर मेरे इस घृणित रूप के साथ मुझे स्वीकार करेगा? कोई तो मेरी मदद करो। क्या कोई मेरी आवाज़ सुन रहा है। मैं गंगा…….

एक नन्ही परी ( कन्या भ्रुण हत्या पर आधारित मार्मिक कहानी )

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विनीता सहाय गौर से कटघरे मे खड़े राम नरेश को देख रही थीं। पर उन्हे याद नहीं आ रहा था, इसे कहा देखा है? साफ रंग, बाल खिचड़ी और भोले चेहरे पर उम्र की थकान थी। साथ ही चेहरे पर उदासी की लकीरे थीं।वह कटघरे मे अपराधी की हैसियत से खड़ा था।वह आत्मविश्वासविहीन था।

लग रहा था जैसे उसे दुनिया से कोई मतलब ही नहीं था। वह जैसे अपना बचाव करना ही नहीं चाहता था।कंधे झुके थे।शरीर कमजोर था। वह एक गरीब और निरीह व्यक्ति था। लगता था जैसे बिना सुने और समझे हर गुनाह कबूल कर रहा था। ऐसा अपराधी तो उन्होंने आज तक नहीं देखा था। उसकी पथराई आखों मे अजीब सा सूनापन था, जैसे वे निर्जीव हों।

लगता था वह जानबूझ कर मौत की ओर कदम बढ़ा रहा था। जज़ साहिबा को लग रहा था- यह इंसान इतना निरीह है। यह किसी का कातिल नहीं हो सकता है।क्या इसे किसी ने झूठे केस मे फँसा दिया है? या पैसों के लालच मे झूठी गवाही दे रहा है?नीचे के कोर्ट से उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई थी।
विनीता सहाय ने जज़ बनने के समय मन ही मन निर्णय किया था कि कभी किसी निर्दोष और लाचार को सज़ा नहीं होने देंगी। झूठी गवाही से उन्हे सख़्त नफरत थी। अगर राम नरेश का व्यवहार ऐसा न होता तो शायद जज़ विनीता सहाय ने उसपर ध्यान भी न दिया होता।

दिन भर मे न-जाने कितने केस निपटाने होते है। ढेरों जजों, अपराधियों, गवाहों और वकीलों के भीड़ मे उनका समय कटता था। पर ऐसा दयनीय कातिल नहीं देखा था। कातिलों की आखों मे दिखनेवाला गिल्ट या आक्रोश कुछ भी तो नज़र नहीं आ रहा था। विनीता सहाय अतीत को टटोलने लगी। आखिर कौन है यह?कुछ याद नहीं आ रहा था।
विनीता सहाय शहर की जानी-मानी सम्माननीय हस्ती थीं।

गोरा रंग, छोटी पर सुडौल नासिका, ऊँचा कद, बड़ी-बड़ी आखेँ और आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व वाली विनीता सहाय अपने सही और निर्भीक फैसलो के लिए जानी जाती थीं। उम्र के साथ सफ़ेद होते बालों ने उन्हें और प्रभावशाली बना दिया था। उनकी बुद्धिदीप्त,चमकदार आँखें एक नज़र में ही अपराधी को पहचान जाती थीं। उन्हे सुप्रींम कोर्ट की पहली महिला जज़ होने का भी गौरव प्राप्त था। उनके न्याय-प्रिय फैसलों की चर्चा होती रहती थी।

पुरुषो के एकछत्र कोर्ट मे अपना करियर बनाने मे उन्हें बहुत तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। सबसे पहला युद्ध तो उन्हें अपने परिवार से लड़ना पड़ा था। वकालत करने की बात सुनकर घर मेँ तो जैसे भूचाल आ गया। माँ और बाबूजी से नाराजगी की तो उम्मीद थी, पर उन्हें अपने बड़े भाई की नाराजगी अजीब लगी। उन्हें पूरी आशा थी कि महिलाओं के हितों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले भैया तो उनका साथ जरूर देंगे। पर उन्हों ने ही सबसे ज्यादा हँगामा मचाया था।

तब विनी को सबसे हैरानी हुई, जब उम्र से लड़ती बूढ़ी दादी ने उसका साथ दिया। दादी उसे बड़े लाड़ से ‘नन्ही परी’ बुलाती थी। विनी रात मेँ दादी के पास ही सोती थी। अक्सर दादी कहानियां सुनाती थी। उस रात दादी ने कहानी तो नहीं सुनाई परगुरु मंत्र जरूर दिया। दादी ने रात के अंधेरे मे विनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- मेरी नन्ही परी, तु शिवाजी की तरह गरम भोजन बीच थाल से खाने की कोशिश कर रही है। जब भोजन बहुत गरम हो तो किनारे से फूक-फूक कर खाना चाहिए।

तु सभी को पहले अपनी एल एल बी की पढाई के लिए राजी कर। न कि अपनी वकालत के लिए। ईश्वर ने चाहा तो तेरी कामना जरूर पूरी होगी। विनी ने लाड़ से दादी के गले मे बाँहे डाल दी। फिर उसने दादी से पूछा- दादी तुम इतना मॉडर्न कैसे हो गई? दादी रोज़ सोते समय अपने नकली दाँतो को पानी के कटोरे मे रख देती थी। तब उनके गाल बिलकुल पिचक जाते थे और चेहरा झुरियों से भर जाता था।

विनी ने देखा दादी की झुरियों भरे चेहरेपर विषाद की रेखाएँ उभर आईं और वे बोल पडी-बिटिया, औरतों के साथ बड़ा अन्याय होता है। तु उनके साथ न्याय करेगी यह मुझे पता है। जज बन कर तेरे हाथों मेँ परियों वाली जादू की छड़ी भी तो आ जाएगी न। अपनी अनपढ़ दादी की ज्ञान भरी बाते सुन कर विनी हैरान थी। दादी के दिये गुरु मंत्र पर अमल करते हुए विनी ने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली। तब उसे लगा – अब तो मंज़िल करीब है।
पर तभी न जाने कहा से एक नई मुसीबत सामने आ गई। बाबूजी के पुराने मित्र शरण काका ने आ कर खबर दी। उनके किसी रिश्तेदार का पुत्र शहर मे ऊँचे पद पर तबादला हो कर आया है। क्वाटर मिलने तक उनके पास ही रह रहा है। होनहार लड़का है। परिवार भी अच्छा है। विनी के विवाह के लिए बड़ा उपयुक्त वर है। उसने विनी को शरण काका के घर आते-जाते देखा है। बातों से लगता है कि विनी उसे पसंद है। उसके माता-पिता भी कुछ दिनों के लिए आनेवाले है।

शरण काका रोज़ सुबह,एक हाथ मे छड़ी और दूसरे हाथ मे धोती थाम कर टहलने निकलते थे। अक्सर टहलना पूरा कर उसके घर आ जाते थे। सुबह की चाय के समय उनका आना विनी को हमेशा बड़ा अच्छा लगता था। वे दुनियां भर की कहानियां सुनाते। बहुत सी समझदारी की बातें समझाते।

पर आज़ विनी को उनका आना अखर गया। पढ़ाई पूरी हुई नहीं कि शादी की बात छेड़ दी। विनी की आँखें भर आईं। तभी शरण काका ने उसे पुकारा- ‘बिटिया, मेरे साथ मेरे घर तक चल। जरा यह तिलकुट का पैकेट घर तक पहुचा दे। हाथों मेँ बड़ा दर्द रहता है। तेरी माँ का दिया यह पैकेट उठाना भी भारी लग रहाहै।

बरसो पहले भाईदूज के दिन माँ को उदास देख कर उन्हों ने बाबूजी से पूछा था। भाई न होने का गम माँ को ही नही, बल्कि नाना-नानी को भी था। विनी अक्सर सोचती थी कि क्या एक बेटा होना इतना ज़रूरी है? उस भाईदूज से ही शरण काका ने माँ को मुहबोली बहन बना लिया था। माँ भी बहन के रिश्ते को निभाती, हर तीज त्योहार मे उन्हेंकुछ न कुछ भेजती रहती थी।आज का तिलकुट मकर संक्रांति का एडवांस उपहार था। अक्सर काका कहते- विनी की शादी मे मामा का नेग तो मुझे ही निभाना है।
शरण काका और काकी मिनी दीदी की शादी के बाद जब भी अकेलापन महसूस करते , तब उसे बुला लेते थे। अक्सर वे अम्मा- बाबूजी से कहते- मिनी और विनी दोनों मेरी बेटियां हैं। देखो दोनों का नाम भी कितना मिलता-जुलता है।जैसे सगी बहनों के नाम हो। शरण काका भी अजीब है। लोग बेटी के नाम से घबराते है। और काका का दिल ऐसा है, दूसरे की बेटी को भी अपना मानते है।

मिनी दीदी के शादी के समय विनी अपने परीक्षा मे व्यस्त थी। काकी उसके परीक्षा विभाग को रोज़ कोसती रहती। दीदी के हल्दी के एक दिन पहले तक परीक्षा थी। काकी कहती रहती थी- विनी को फुर्सत होता तो मेरा सारा काम संभाल लेती। ये कालेज वालों परीक्षा ले-ले कर लड़की की जान ले लेंगे। शांत और मृदुभाषी विनी उनकी लाड़ली थी।

वे हमेशा कहती रहती- ईश्वर ने विनी बिटिया को सूरत और सीरत दोनों दिया है।
आखरी पेपर दे कर विनी जल्दी-जल्दी दीदी के पास जा पहुची। उसे देखते काकी की तो जैसे जान मे जान आ गई। दीदी के सभी कामों की ज़िम्मेवारी उसे सौप कर काकी को बड़ी राहत महसूस हो रही थी। उन्होंने विनी के घर फोन कर ऐलान कर दिया कि विनी अब मिनी के विदाई के बाद ही घर वापस जाएगी।

शाम मे विनी दीदी के साथ बैठ कर उनका बक्सा ठीक कर रही थी, तब उसे ध्यान आया कि दीदी ने कॉस्मेटिक्स तो ख़रीदा ही नहीं है। मेहँदी की भी व्यवस्था नहीं है। वह काकी से बता कर भागी भागी बाज़ार से सारी ख़रीदारी कर लाई। विनी ने रात मे देर तक बैठ कर दीदी को मेहँदी लगाई। मेहँदी लगा कर जब हाथ धोने उठी तो उसे अपनी चप्पलें मिली ही नहीं। शायद किसी और ने पहन लिया होगा।

शादी के घर मे तो यह सब होता ही रहता है। घर मेहमानों से भरा था। बरामदे मे उसे किसी की चप्पल नज़र आई। वह उसे ही पहन कर बाथरूम की ओर बढ़ गई। रात मे वह दीदी के बगल मे रज़ाई मे दुबक गई। न जाने कब बाते करते-करते उसे नींद आ गई।
सुबह, जब वह गहरी नींद मे थी। किसी उसकी चोटी खींच कर झकझोर दिया।कोई तेज़ आवाज़ मे बोल रहा था- अच्छा, मिनी दीदी, तुम ने मेरी चप्पलें गायब की थी। हैरान विनी ने चेहरे पर से रज़ाई हटा कर अपरिचित चेहरे को देखा। उसकी आँखें अभी भी नींद से भरी थीं।

तभी मिनी दीदी खिलखिलाती हुई पीछे से आ गई। अतुल, यह विनी है। सहाय काका की बेटी और विनी यह अतुल है। मेरे छोटे चाचा का बेटा। हर समय हवा के घोड़े पर सवार रहता है। छोटे चाचा की तबीयत ठीक नहीं है। इसलिए छोटे चाचा और चाची नहीं आ सके तो उन्हों ने अतुल को भेज दिया। अतुल उसे निहारता रहा, फिर झेंपता हुआ बोला- “मुझे लगा, दीदी, तुम सो रही हो। दरअसल, मैं रात से ही अपनी चप्पलें खोज रहा था।“
विनी का को बड़ा गुस्सा आया। उसने दीदी से कहा- मेरी भी तो चप्पलें खो गई हैं। उस समय मुझे जो चप्पल नज़र आई मैं ने पहन लिया। मैंने इनकी चप्पलें पहनी है,किसी का खून तो नहीं किया । सुबह-सुबह नींद खराब कर दी। इतने ज़ोरों से झकझोरा है। सारी पीठ दर्द हो रही है। गुस्से मेँ वह मुंह तक रज़ाई खींच कर सो गई। अतुल हैरानी से देखता रह गया। फिर धीरे से दीदी से कहा- बाप रे, यह तो वकीलों की तरह जिरह करती है।

काकी एक बड़ा सा पैकेट ले कर विनी के पास पहुचीं और पूछने लगी – बिटिया देख मेरी साड़ी कैसी है? पीली चुनरी साड़ी पर लाल पाड़ बड़ी खूबसूरत लग रही थी। विनी हुलस कर बोल पड़ी- बड़ी सुंदर साड़ी है। पर काकी इसमे फॉल तो लगा ही नहीं है। हद करती हो काकी। सारी तैयारी कर ली हो और तुम्हारी ही साड़ी तैयार नहीं है। दो मै जल्दी से फॉल लगा देती हूँ।

विनी दीदी के पलंग पर बैठ कर फॉल लगाने मे मसगुल हो गई। काकी भी पलंग पर पैरों को ऊपर कर बैठ गई और अपने हाथों से अपने पैरों को दबाने लगी। विनी ने पूछा- काकी तुम्हारे पैर दबा दूँ क्या?वे बोलीं – बिटिया, एक साथ तू कितने काम करेगी? देख ना पूरे काम पड़े है और अभी से मैं थक गई हूँ। साँवली -सलोनी काकी के पैर उनकी गोल-मटोल काया को संभालते हुए थक जाए, यह स्वाभाविक ही है। छोटे कद की काकी के लालट पर बड़ी सी गोल लाल बिंदी विनी को बड़ी प्यारी लगती थी।विनी को काकी भी उसी बिंदी जैसी गोल-मटोल लगती थीं।

तभी मिनी दीदी की चुनरी मे गोटा और किरण लगा कर छोटी बुआ आ पहुचीं। देखो भाभी, बड़ी सुंदर बनी है चुनरी। फैला कर देखो ना- छोटीबुआ कहने लगी। पूरे पलंग पर सामान बिखरा था। काकी ने विनी की ओर इशारा करते हुई कहा- इसके ऊपर ही डाल कर दिखाओ छोटी मईयां।

सिर झुकाये फॉल लगाती विनी के ऊपर लाल चुनरी बुआ ने फैला दिया। चुनरी सचमुच बड़ी सुंदर बनी थी। काकी बोल पड़ी- देख तो विनी पर कितना खिल रहा है यह रंग।विनी की नज़रें अपने-आप ही सामने रखे ड्रेसिंग टेबल के शीशे मे दिख रहे अपने चेहरे पर पड़ी। उसका चेहरा गुलाबी पड़ गया। उसे अपना ही चेहरा बड़ा सलोना लगा।

तभी अचानक किसी ने उसके पीठ पर मुक्के जड़ दिये- “ तुम अभी से दुल्हन बन कर बैठ गई हो दीदी” अतुल की आवाज़ आई। वह सामने आ कर खड़ा हो गया। अपलक कुछ पल उसे देखता रह गया। विनी की आँखों मेँ आंसू आ गए थे। अचानक हुए मुक्केबाज़ी के हमले से सुई उसकी उंगली मे चुभ गई थी। उंगली के पोर पर खून की बूँद छलक आई थी।

अतुल बुरी तरह हड्बड़ा गया। बड़ी अम्मा, मैं पहचान नहीं पाया था। मुझे क्या मालूम था कि दीदी के बदले किसी और को दुल्हन बनने की जल्दी है। पर मुझ से गलती हो गई- वह काकी से बोल पड़ा। फिर विनी की ओर देख कर ना जाने कितनी बार सॉरी-सॉरी बोलता चला गया। तब तक मिनी दीदी भी आ गई थी।

विनी की आँखों मेँ आंसू देख कर सारा माजरा समझ कर, उसे बहलाते हुए बोली- “अतुल, तुम्हें इस बार सज़ा दी जाएगी।“ बता विनी इसे क्या सज़ा दी जाए? विनी ने पूछा- इनकी नज़रे कमजोर है क्या? अब इनसे कहो सभी के पैर दबाये। यह कह कर विनी साड़ी समेट कर, पैर पटकती हुई काकी के कमरे मे जा कर फॉल लगाने लगी।

अतुल सचमुच काकी के पैर दबाने लगा, और बोला- वाह! क्या बढ़िया फैसला है जज़ साहिबा का। बड़ी अम्मा, देखो मैं हुक्म का पालन कर रहा हूँ। “तू भी हर समय उसे क्यों परेशान करता रहता है अतुल?”-मिनी दीदी की आवाज़ विनी को सुनाई दी। दीदी, इस बार भी मेरी गलती नहीं थी- अतुल सफाई दे रहा था।

फॉल का काम पूरा कर विनी हल्दी के रस्म की तैयारी मेँ लगी थी। बड़े से थाल मे हल्दी मंडप मे रख रही थी। तभी मिनी दीदी ने उसे आवाज़ दी। विनी उनके कमरे मे पहुचीं। दीदी के हाथों मे बड़े सुंदर झुमके थे। दीदी ने झुमके दिखाते हुए पूछा- ये कैसे है विनी? मैं तेरे लिए लाई हूँ। आज पहन लेना। मैं ये सब नही पहनती दीदी- विनी झल्ला उठी। सभी को मालूम है कि विनी को गहनों से बिलकुल लगाव नहीं है। फिर दीदी क्यों परेशान कर रही है? पर दीदी और काकी तो पीछे ही पड़ गई।

दीदी ने जबर्दस्ती उसके हाथों मेँ झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके ड्रेसिंग टेबल पर पटक दिये। फिसलता हुआ झुमका फर्श पर गिरा और दरवाज़े तक चला गया।तुनकते हुए विनी तेज़ी से पलट कर बाहर जाने लगी। उसने ध्यान ही नहीं दिया था कि दरवाजे पर खड़ा अतुल ये सारी बातें सुन रहा था। तेज़ी से बाहर निकालने की कोशिश मे वह सीधे अतुल से जा टकराई। उसके दोनों हाथों में लगी हल्दी के छाप अतुल के सफ़ेद टी-शर्ट पर उभर आए।

वह हल्दी के दाग को हथेलियों से साफ करने की कोशिश करने लगी। पर हल्दी के दाग और भी फैलने लगे। अतुल ने उसकी दोनों कलाइयां पकड़ ली और बोल पड़ा- यह हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। ऐसे तो यह और फ़ैल जाएगा। आप रहने दीजिये। विनी झेंपती हुई हाथ धोने चली गई।

बड़े धूम-धाम से दीदी की शादी हो गई। दीदी की विदाई होते ही विनी को अम्मा के साथ दिल्ली जाना पड़ा। कुछ दिनों से अम्मा की तबियत ठीक नहीं चल रही थी। डाक्टरों ने जल्दी से जल्दी दिल्ली ले जा कर हार्ट चेक-अप का सुझाव दिया था। मिनी दीदी के शादी के ठीक बाद दिल्ली जाने का प्लान बना था। दीदी की विदाई वाली शाम का टिकट मिल पाया था।
***
एक शाम अचानक शरण काका ने आ कर खबर दिया। विनी को देखने लड़केवाले अभी कुछ देर मे आना चाहते हैं। घर मे जैसे उत्साह की लहर दौड़ गई। पर विनी बड़ी परेशान थी। ना-जाने किसके गले बांध दिया जाएगा?

उसके भविष्य के सारे अरमान धरे के धरे रह जाएगे। अम्मा उसे तैयार होने कह कर किचेन मे चली गईं। तभी मालूम हुआ कि लड़का और उसके परिवारवाले आ गए है। बाबूजी, काका और काकी उन सब के साथ ड्राइंग रूम मेँ बातें कर रहे थे। अम्मा उसे तैयार न होते देख कर, आईने के सामने बैठा कर उसके बाल संवारे। अपने अलमारी से झुमके निकाल कर दिये। विनी झुंझलाई बैठी रही।

अम्मा ने जबर्दस्ती उसके हाथों मे झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके पटक दिये। एक झुमका फिसलता हुआ ड्राइंग रूम के दरवाजे तक चला गया। ड्राइंग-रूम उसके कमरे से लगा हुआ था।
परेशान अम्मा उसे वैसे ही अपने साथ ले कर बाहर आ गईं। विनी अम्मा के साथ नज़रे नीची किए हुए ड्राइंग-रूम मेँ जा पहुची। वह सोंच मे डूबी थी कि कैसे इस शादी को टाला जाए। काकी ने उसे एक सोफ़े पर बैठा दिया। तभी बगल से किसी की ने धीरे से पूछा- आज किसका गुस्सा झुमके पर उतार रही थी? आश्चर्यचकित नज़रों से विनी ने ऊपर देखा। उसने फिर कहा- मैं ने कहा था न, हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। सामने अतुल बैठा था।

अतुल और उसके माता-पिता के जाने के बाद काका ने उसे बुलाया। बड़े बेमन से कुछ सोंचती हुई वह काका के साथ चलने लगी। गेट से बाहर निकलते ही काका ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “विनी, मैं तेरी उदासी समझ रहा हूँ। बिटिया, अतुल बहुत समझदार लड़का है। मैंने अतुल को तेरे सपने के बारे मेँ बता दिया है। तू किसी तरह की चिंता मत कर। मुझ पर भरोसा कर बेटा।

काका ने ठीक कहा था। वह आज़ जहाँ पंहुची है। वह सिर्फ अतुल के सहयोग से ही संभव हो पाया था। अतुल आज़ भी अक्सर मज़ाक मेँ कहते हैं –“मैं तो पहली भेंट मेँ ही जज़ साहिबा की योग्यता पहचान गया था।“ उसकी शादी मेँ सचमुच शरण काका ने मामा होने का दायित्व पूरे ईमानदारी से निभाया था। पर वह उन्हें मामा नहीं, काका ही बुलाती थी। बचपन की आदत वह बादल नहीं पाई थी।
***
कोर्ट का कोलाहल विनीता सहाय को अतीत से बाहर खींच लाया। पर वे अभी भी सोच रही थीं – इसे कहाँ देखा है। दोनों पक्षों के वकीलों की बहस समाप्त हो चुकी थी। राम नरेश के गुनाह साबित हो चुके थे। वह एक भयानक कातिल था। उसने इकरारे जुर्म भी कर लिया था।

उसने बड़ी बेरहमी से हत्या की थी। एक सोची समझी साजिश के तहत उसने अपने दामाद की हत्या कर शव का चेहरा बुरी तरह कुचल दिया था और शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर जंगल मे फेंक दिया था। वकील ने बताया कि राम नरेश का अपराधिक इतिहास है। वह एक क्रूर कातिल है।

पहले भी वह कत्ल का दोषी पाया गया था। पर सबूतों के आभाव मे छूट गया था। इसलिए इस बार उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। वकील ने पुराने केस की फाइल उनकी ओर बढ़ाई। फ़ाइल खोलते ही उनके नज़रों के सामने सब कुछ साफ हो गया। सारी बातें चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूमने लगी।

लगभग बाईस वर्ष पहले राम नरेश को कोर्ट लाया गया था। उसने अपनी दूध मुहीं बेटी की हत्या कर दी थी। तब विनीता सहाय वकील हुआ करती थी। ‘कन्या-भ्रूण-हत्या’ और ‘बालिका-हत्या’ जैसे मामले उन्हें आक्रोश से भर देते थे। माता-पिता और समाज द्वारा बेटे-बेटियों में किए जा रहे भेद-भाव उन्हें असह्य लगते थे।

तब विनीता सहाय ने रामनरेश के जुर्म को साबित करने के लिए एड़ी चोटी की ज़ोर लगा दी थी। उस गाँव मेँ अक्सर बेटियों को जन्म लेते ही मार डाला जाता था। इसलिए किसी ने राम नरेश के खिलाफ गवाही नहीं दी। लंबे समय तक केस चलने के बाद भी जुर्म साबित नहीं हुआ।

इस लिए कोर्ट ने राम नरेश को बरी कर दिया था। आज वही मुजरिम दूसरे खून के आरोप में लाया गया था। विनीता सहाय ने मन ही मन सोचा- ‘काश, तभी इसे सज़ा मिली होती। इतना सीधा- सरल दिखने वाला व्यक्ति दो-दो कत्ल कर सकता है? इस बार वे उसे कड़ी सज़ा देंगी।

जज साहिबा ने राम नरेश से पूछा- ‘क्या तुम्हें अपनी सफाई मे कुछ कहना है?’ राम नरेश के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान खेलने लगी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा – “हाँ हुज़ूर, मुझे आप से बहुत कुछ कहना है। मैं आप लोगों जैसा पढ़ा- लिखा और समझदार तो नहीं हूँ। पता नहीं आपलोग मेरी बात समझेगें या नहीं। पर आप मुझे यह बताइये कि अगर कोई मेरी परी बिटिया को जला कर मार डाले और कानून से भी अपने को बचा ले। तब क्या उसे मार डालना अपराध है?”

मेरी बेटी को उसके पति ने दहेज के लिए जला दिया था। मरने से पहले मेरी बेटी ने अपना आखरी बयान दिया था, कि कैसे मेरी फूल जैसी सुंदर बेटी को उसके पति ने जला दिया। पर वह पुलिस और कानून से बच निकला। इस लिए उसे मैंने अपने हाथों से सज़ा दिया। मेरे जैसा कमजोर पिता और कर ही क्या सकता है? मुझे अपने किए गुनाह का कोई अफसोस नहीं है।

उसका चेहरा मासूम लग रहा था। उसकी बूढ़ी आँखों मेँ आंसू चमक रहे थे, पर चेहरे पर संतोष झलक रहा था। वह जज साहिबा की ओर मुखातिब हुआ-“ हुज़ूर, क्या आपको याद है? आज़ से बाईस वर्ष पहले जब मैं ने अपनी बड़ी बेटी को जन्म लेते मार डाला था, तब आप मुझे सज़ा दिलवाना चाहती थीं।

आपने तब मुझे बहुत भला-बुरा कहा था। आपने कहा था- बेटियां अनमोल होती हैं। उसे मार कर मैंने जघन्य पाप किया है।“

आप की बातों ने मेरी रातो की नींद और दिन का चैन ख़त्म कर दिया था। इसलिए जब मेरी दूसरी बेटी का जन्म हुआ तब मुझे लगा कि ईश्वर ने मुझे भूल सुधारने के मौका दिया है। मैंने प्रयश्चित करना चाहा। उसका नाम मैंने परी रखा। बड़े जतन और लाड़ से मैंने उसे पाला।

अपनी हैसियत के अनुसार उसे पढ़ाया और लिखाया। वह मेरी जान थी। मैंने निश्चय किया कि उसे दुनिया की हर खुशी दूंगा। मै हर दिन मन ही मन आपको आशीष देता कि आपने मुझे ‘पुत्री-सुख’ से वंचित होने से बचा लिया। मेरी परी बड़ी प्यारी, सुंदर, होनहार और समझदार थी। मैंने उसकी शादी बड़े अरमानों से किया। अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी।

मित्रो और रिश्तेदारों से उधार ली। किसी तरह की कमी नहीं की। पर दुनिया ने उसके साथ वही किया जो मैंने बाईस साल पहले अपनी बड़ी बेटी के साथ किया था। उसे मार डाला। तब सिर्फ मैं दोषी क्यों हूँ? मुझे खुशी है कि मेरी बड़ी बेटी को इस क्रूर दुनिया के दुखों और भेद-भाव को सहना नहीं पड़ा। जबकि छोटी बेटी को समाज ने हर वह दुख दिया जो एक कमजोर पिता की पुत्री को झेलना पड़ता है। ऐसे मेँ सज़ा किसे मिलनी चाहिए? मुझे सज़ा मिलनी चाहिए या इस समाज को?

अब आप बताइये कि बेटियोंको पाल पोस कर बड़ा करने से क्या फायदा है? पल-पल तिल-तिल कर मरने से अच्छा नहीं है कि वे जन्म लेते ही इस दुनिया को छोड़ दे। कम से कम वे जिंदगी की तमाम तकलीफ़ों को झेलने से तों बच जाएगीं। मेरे जैसे कमजोर पिता की बेटियों का भविष्य ऐसा ही होता है।

उन्हे जिंदगी के हर कदम पर दुख-दर्द झेलने पड़ते है। काश मैंने अपनी छोटी बेटी को भी जन्म लेते मार दिया होता। आप मुझे बताइये, क्या कहीं ऐसी दुनिया हैं जहाँ जन्म लेने वाली ये नन्ही परियां बिना भेद-भाव के एक सुखद जीवन जी सकें? आप मुझे दोषी मानती हैं। पर मैं इस समाज को दोषी मानता हूँ। क्या कोई अपने बच्चे को इसलिए पालता है कि यह नतीजा देखने को मिले? या समाज हमेँ कमजोर होने की सज़ा दे रहा है? क्या सही है और क्या गलत, आप मुझे बताइये।

विनीता सहाय अवाक थी। मुक नज़रो से राम नरेश के लाचार –कमजोर चेहरे को देख रही थीं। उनके पास कोई जवाब नहीं था। पूरे कोर्ट मे सन्नाटा छा गया था। आज एक नया नज़रिया उनके सामने था? उन्होंने उसके फांसी की सज़ा को माफ करने की दया याचिका प्रेसिडेंट को भिजवा दिया।

अगले दिन अखबार मे विनीता सहाय के इस्तिफ़े की खबर छपी थी। उन्होंने वक्तव्य दिया था – इस असमान सामाजिक व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है। जिससे समाज लड़कियों को समान अधिकार मिले। अन्यथा न्याय, अन्याय बन जाता है, क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।गलत सामाजिक व्यवस्था और करप्शन न्याय को गुमराह करता है और लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा ख़त्म करता है। मैं इस गलत सामाजिक व्यवस्था के विरोध मेँ न्यायधिश पद से इस्तीफा देती हूँ।
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आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी )

(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है।यह कहानी बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है।)

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नन्हा आशु थोड़ी देर पहले ही जागा था। वह कमरे से बाहर आया, तभी उसने दादी को बाहर से आते देखा। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे, तू जाग गया है?” आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? दादी ने कहा- “मैं रोज़ सुबह मंदिर जाती हूँ बेटा। ये ले प्रसाद।” दादी ने उसके हथेली पर बताशे और मिश्री रख दिये। आशु को बताशे चूसने में बड़ा मज़ा आ रहा था। यह तो नए तरह की टाफ़ी है। उसने मन ही मन सोंचा।

उसके मन में ख्याल आया कि अगर वह दादी के साथ मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। कुछ सोचते हुए उसने दादी से पूछा – ‘दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या?” दादी ने उसे गौर से देखते हुए कहा –“तुम सुबह तैयार हो जाओगे तो जरूर ले चलूँगी।‘ दादी पूजा की थाली लिए पूजा-घर की ओर बढ़ गईं। “दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? बताओ ना”- आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम रोज़ सुबह कैसे जाग जाती हो?

दादी ने हँस कर पूछा-“और बताशे-मिश्री चाहिए क्या?” आशु ने सिर हाँ में हिलाया। दादी ने उसके मुँह में बताशे डाल कर कहा – ‘मेरे तकिये में जादुई घड़ी है बेटा। वही मुझे सुबह-सुबह जगा देती है। अगर तुम्हें सुबह जागना है। तब रात में मुझ से वह तकिया ले लेना। सोते समय सच्चे मन से तकिये को अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। रात में देर तक मत जागना। क्यों दादी?– आशु ने पूछा। दादी ने जवाब दिया – “वह इसलिए ताकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। वरना तकिये के जगाने के बाद भी तुम्हें बिस्तर से निकलने का मन नहीं करेगा।“

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आशु मम्मी-पापा के साथ दादा-दादी के पास आया था। उसके स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थी। वह दादी के जादुई तकिये की बात से बड़ा खुश था क्योंकि उसे रोज़ सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। जल्दीबाजी में तैयार होना पड़ता। मम्मी से डांट भी पड़ती। कभी-कभी स्कूल की बस भी छूट जाती थी।

रात में वह दादी के पास पहुँचा। बड़े ध्यान से उनके बिस्तर पर रखे हुए तकियों को देख कर सोंच रहा था – इनमें से कौन सा तकिया जादुई है? देखने में तो सब एक जैसे लग रहे हैं। तभी मम्मी ने पीछे से आ कर पूछा – ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो आशु? तुम्हारा प्रिय कार्टून कार्यक्रम टीवी पर आ रहा है।“ आशु ने जवाब दिया – “नहीं मम्मी, मैं आज देर रात तक टीवी नहीं देखूंगा। आज मुझे समय पर सोना है।“ मम्मी हैरानी से उसे देखती हुई बाहर चली गईं।

आशु ने दादी की ओर देखा। दादी ने एक छोटा तकिया उसकी ओर बढ़ाया और पूछा – “तुमने खाना खा लिया है ना?” आशु ने खुशी से तकिये को बाँहों में पकड़ लिया और चहकते हुए कहा –“हाँ दादी। मैंने खाना खा कर ब्रश भी कर लिया है दादी।“ वह अपने कमरे में सोने चला गया। वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।

अगले दिन सचमुच वह सवेरे-सवेरे जाग कर दादी के पास पहुँच गया। दोनों तैयार हो कर मंदिर चले गए। मंदिर में एक बड़ा बरगद का पेड़ था। बरगद के लंबी-लंबी जटाएँ जमीन तक लटकी हुईं थीं। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु को यह सब देखने मे बड़ा मज़ा आ रहा था। दादी नदी से लोटे में जल भरने सीढ़ियों से नीचे उतर गईं। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। दादी लोटे में जल ले कर मंदिर की ओर बढ़ गईं। आशु दौड़ कर दादी के पास पहुँच कर पूछा – ‘दादी तुम मेरे लिए जल नहीं लाई क्या?” दादी मुस्कुरा पड़ी। उन्होंने पूजा की डलिया से एक छोटा जल भरा लोटा निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह दादी का अनुसरण करने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।

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आशु दादी के साथ रोज़ मंदिर जाने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। दरअसल आशु को सवेरे का लाल सूरज, ठंडी हवा, पेड़, पंछी, नदी, प्रसाद और मंदिर की घंटिया सब बड़े लुभावने लगने लगे थे। आज मंदिर जाते समय दादी ने गौर किया कि आशु कुछ अनमना है। उन्हों ने आशु से पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा?” आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – “दादी, अब तो मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो रही है। घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।‘

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दादी उसका हाथ पकड़ कर नदी की सीढ़ियों पर बैठ गईं। दादी प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहने लगी – “आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है। यह तुम्हारे मजबूत इच्छा शक्ति का कमाल है। जब हम मन में कुछ करने का ठान लेते है, तब हमारी मानसिक शक्तियाँ उसे पूरा करने में मदद करती हैं। हाँ आशु, एक और खास बात तुम्हें बताती हूँ। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हम नियत समय पर सोते-जागते है। हमें नियत समय पर भोजन की जरूरत महसूस होती है। जिसे हम मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकते हैं। यह घड़ी प्रकृतिक रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।“

आशु हैरानी से दादी की बातें सुन रहा था। उसने दादी से पूछा –“ इसका मतलब है दादी कि मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था? मैं अपनी इच्छा शक्ति से बॉडी क्लॉक को नियंत्रित कर सवेरे जागने लगा हूँ?” दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – “आज रात तुम अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना। ताकिया की मदद मत लेना। रात में सोते समय आशु नें वैसा ही किया, जैसा दादी ने कहा था। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसने अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया था।

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(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है।यह कहानी बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि  बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है।)

सौन्दर्य (blog related)

मेरी सहेलियाँ सजती-सँवरती और मुझे भी नए-नए फैशन समझातीं। मुझे सजने- सँवरने का बिलकुल मन नहीं करता था। मेरी सहेलियाँ मेरी समस्या समझती ही नहीं थीं। उनके चिकने, साफ- सुथरे चेहरे दमकते रहते थे। मेरा चेहरा मुंहासों से भरा था। मुझे इन मुंहासों की वजह से बड़ी शर्मिंदगी होती थी। उन्हें छुपाते-छुपाते मैं थक गई थी। मेरा आत्मविश्वास भी कम हो गया था। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। मैं रोज़ एक ही जींस और टॉप में कालेज़ पहुँच जाती। मैं ना किसी से ज्यादा बातें करतीं ना किसी लडके से मेरी दोस्ती थी।

मुझे राधिका के साथ अपना प्रोजेक्ट का काम करना था। बालों को आगे कर अपने गाल पर मैंने फैला लिया, जिससे मेरे गाल छुप जाये।फिर अपनी सहेली राधिका के घर पहुँची। राधिका ने नाराजगी से पूछा- “कमल ने मुझे तुम्हें कैंटीन में भेजने कहा था। पर तुमने फोन कर कमल को मना क्यों कर दिया? वह अच्छा लड़का है। तुमसे दोस्ती करना कहता है। तुम सबलोगों से इतनी कटी-कटी क्यों रहती हो?

मेरी बड़ी-बड़ी आँखों मेँ आँसू भर आए। मैंने अपने गालों पर से बाल हटा कर अपने मुँहासे राधिका को दिखाए। मेरे दोनों गाल लाल-गुलाबी मुहांसों से भरे थे। राधिका ने मुस्कुरा कर कहा-“ बस, यही तुम्हारी समस्या है? वह उठी और अपने अलमारी से कुछ निकाल कर मेरे हाथों में थमा दिया। मेरे हाथों में गार्नियर प्योर एक्टिव नीम फ़ेस वाश की सफ़ेद-हरे रंग की ट्यूब थी। मैंने कहा-“ इससे क्या होगा?” राधिका ने हँसते हुए कहा- “लगा कर तो देख।“

लगभग एक सप्ताह बाद मैं बहुत खुश थी। गार्नियर का जादू देख कर मैं हैरान थी। मेरा चेहरा मुंहासों से मुक्त दमक रहा था। हमेशा पहननेवाले जींस को हटा कर एक सुंदर से सलवार-कुर्ते में मैं तैयार हो गई। बालों को खूबसूरती से क्लिप से लगा कर बाँधा और कॉलेज कैंटीन में राधिका से मिलने पहुँची। मैं उसे धन्यवाद देना चाहती थी। कैंटीन मेँ हम दोनों सहेलियाँ बैठ कर गप्पें कर रहीं थीं। तभी कमल वहाँ आया और हमारे साथ बैठ गया। उसकी आँखों मेँ मेरे लिए प्रशंसा दिख रही थी। उसने मुझ से पूछा-“ तुम अर्चना की छोटी बहन हो क्या? तुम दोनों काफी मिलती-जुलती हो। इसलिए मैंने अनुमान लगा लिया। पर तुम उससे ज्यादा ग्लैमरस हो। मैं और राधिका खिलखिला कर हंस पड़े। सच्चाई जान कर कमल झेंप गया। आज मैं और कमल अच्छे दोस्त हैं। मैं और राधिका इसे गार्नियर-मैजिक कहतें है। अब मैं पहले जैसी सहमी-सिमटी नहीं बल्कि आत्मविश्वाश से भरी अर्चना हूँ। सभी कहते हैं मैं हर पार्टी की जान हूँ। हम सभी सहेलियों को त्वचा समस्या होने पर गार्नियर-लक विश करते हैं।

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क्रिसमस की पूर्वसंध्या (यात्रा संस्मरण)

कड़ाके की ठंड थी। इस ठंड में सुबह-सुबह तैयार होना एक बड़ा काम था। पर समय पर हवाई-अड्डा पहुँचना था। जल्दी-जल्दी तैयार हो कर सुबह 8 बजे हमलोग घर से निकले। हमें लखनऊ से पुणे जाना था। गनीमत थी कि हम समय पर पहुँच गए। घड़ी देख कर चाँदनी, अधर और मैं खुश हुए, चलो देर नहीं हुई।
आधे घंटे के बाद फोन पर खबर मिली कि कोहरे के कारण हवाई जहाज 30 मिनट देर से जाएगा। लखनऊ में कोहरा कुछ कम है। पर दिल्ली में घना कोहरा है। पर यह देर होने का सिलसिल लगभग दो घंटे चला। हम दो बजे दिल्ली पहुँचे। वहाँ से  पुणे के जहाज का समय दोपहर 2:30 में था। इसलिए हमलोग बेफिक्र थे क्योंकि दोपहर में दिल्ली का मौसम बिलकुल साफ था और पुणे में इतनी ठंड नहीं होती है कि जहाज़ को उतरने में कोहरे की समस्या का सामना करना पड़े। पर किसी कारणवश इस हवाई जहाज के समय में भी देर होने लगा। बार-बार नज़र शीशे के बाहर के मौसम पर जा रही थी। घड़ी की सुइयाँ जैसे-जैसे आगे जा रही थी, कोहरे का असर बढ़ता जा रहा था। अगर कोहरा ज़्यादा हो जाएगा तब ना जाने हवाई जहाज का क्या होगा? ढ़ेरो जहाज इस वजह से स्थगित हो रहे थे।
सूर्य पश्चिम की ओर तेज़ तेज़ी से बढ़ रहा था। लगभग 4:30 बजे शाम का समय हो चुका था। मन ही मन मैं मना रही थी कि जहाज जल्दी यहाँ से उड़ान भर ले। सूरज लाल गोले जैसा दिख रहा था। चारो ओर लाली छा गई थी। क्रिसमस की पूर्वसंध्या बड़ी खूबसूरत थी। धीरे-धीरे पश्चिम में डूबता सूरज बड़ा सुंदर लग रहा था। मैं उसकी सुंदरता को निहार रही थी। पाँच बजे शाम में सूर्य अस्त हो गया। हवाई-अड्डे के शीशे से बाहर धुंध नज़र आ रहा था। कोहरा घना हो रहा था। लगा अब हमारी उड़ान के रद्द होने की सूचना ना आ जाए। पर तभी हमे हवाई जहाज के अंदर जाने की सूचना दी गई। थोड़ी राहत तो हुई। पर अंदर बैठने के बाद भी नज़र खिड़की से बाहर घने हो रहे कोहरे पर थी। समझ नहीं आ रहा था कि इस हल्के धुंध भरे कोहरे में जहाज़ अगर उड़ान भर भी ले तो आगे कैसे जाएगा, क्योंकि अब तो कोहरा बढ़ता ही जाएगा। मैं इसी चिंता में थी और जहाज़ ने उड़ान भरी। मैंने आँखें बंद कर माथा सीट पर टिका लिया।
विमान बहुत ऊंचाई पर आ गया था। थोड़ी देर बाद मेरी नज़रें विमान की खिड़की के बाहर गई। जहाज़ के पंख पर तेज़ रोशनी चमक रही थी।  बाहर तेज़ धूप थी और सूर्य जगमगा रहा था। मैं हैरान थी। नीचे झाँका तो पाया कोहरे की मोटी चादर नीचे रह गई थी। हमारा जहाज कोहरे के मोटी चादर से ऊपर था। ऊंचाई पर कोहरा नहीं था। वहाँ सूरज चमचमा रहा था। संध्या 5:30 में सूर्य फिर से अस्त होता हुआ नज़र आया। यहाँ से सूर्ययास्त और भी लाजवाब लग रहा था। नीचे अंधकार जैसा था। दूर छितिज पर धरती और आकाश मिलते हुए दिख रहे थे। पूरा आसमान डूबते सूरज के लाल और नारंगी रंग में रंगा था। नज़रों के सामने एक और खूबसूरत शाम थी। एक दिन में दो बार सूर्यास्त देख कर रोमांच हो आया। एक सूर्यास्त धरती पर और दूसरा आकाश की ऊंचाइयों पर।  क्रिसमस की यह पूर्वसंध्या मेरे लिए यादगार बन गई।

जंगल ओलंपिक ( प्रेरक बाल कथा )

गिल्लू गिलहरी बहुत दौड़ती थी। वह जंगल ओलंपिक में भाग लेने की तैयारी कर रही थी।हर दिन सुबह उठ कर वह दूर तक दौड़ लगाती थी।उसने अपने भोजन में दूध और मेवे शामिल कर लिए थे।वह स्कूल में भी खेल-कूद में भाग लेने लगी थी।वह चाहती थी कि उसकी चुस्ती-फुर्ती बढ़ जाये।अब वह पहले की तरह हर समय टीवी और कंप्यूटर में व्यस्त नहीं रहती थी।कोच बंकु उसकी मेहनत से बहुत खुश थे।
पर जब भी कोच बंकु बंदर अभ्यास करवाते तब वह पीलू खरगोश से पीछ छूट जाती थी। पीलू ख़रगोश बड़ा घमंडी था। अभ्यास के समय पीलू आगे निकल कर सभी को जीभ चिढ़ाता।अगर कोई उससे आगे निकलने की कोशिश करता, तब वह कोच की नज़र बचा कर उसे धक्का दे कर गिरा देता। गिल्लू को लगने लगा था,वह रेस जीत नहीं पाएगी।
इस साल हिमालय नेशनल पार्क के राजा तेज़ा शेर ने अपनी सभा में जंगल ओलंपिक खेलों की घोषणा की थी। उन्होंने बताया कि खेलों से सदभावना और दोस्ती बढ़ती है। खेल हमें स्वस्थ रखते हैं। इससे हमारे जीवन में अनुशासन आता है। इसलिए जंगल में ओलंपिक खेलों का आयोजन किया जा रहा है।इसमें अन्य जंगलों को भी न्योता दिया गया है। इस ओलंपिक में अनेक  प्रकार के खेलों को शामिल किया गया था।गिल्लू ने छोटे जानवरों के 1000 मीटर लंबी दौड़ मे हिस्सा लिया था।
राजा तेज़ा ने जंगलवासियों को मनुष्यों के ओलंपिक खेलो की जानकारी दी।इस खेल का आयोजन हर चौथे वर्ष किया जाता है।वे चाहते है कि हिमालय नेशनल पार्क के जंगल में ओलंपिक का  आयोजन हो।सभी जानवर इस ऐलान से बहुत खुश थे।  इस आयोजन के लिए खेल के मैदान तैयार किए जाने लगे। दौड़ के लिए रेस-ट्रैक बनाए जा रहे थे।
गिल्लू जी-जान से मेहनत कर रही थी। आज के दौड़ के अभ्यास में वह सबसे आगे थी।जैसे ही उसने पीछे पलट कर पास आते पीलू को देखा,वह घबरा गई। पीलू उसे जीभ दिखाते हुए तेज़ी से आगे निकल गया। गिल्लू की  आँखों में आँसू आ गए। दौड़ के बाद वह आम के पेड़ के पीछे जा कर आँसू पोछने लगी। तभी कोच बंकु वहाँ आए। उन्हों गिल्लू को बिना डरे अभ्यास करने कहा। पर गिल्लू बहुत घबरा गई थी।
अभ्यास के बाद गिल्लू अपने घर पहुची। बड़े पीपल के पेड़ के सबसे ऊपर के ड़ाल के बिल में उसका घर था।पर वह घर के अंदर नहीं गई। बाहर ऊंची ड़ाल पर बैठ गई। वहाँ से सारा जंगल नज़र आता था। उसे अपने दौड़ का ट्रैक नज़र आ रहा था। कल ही प्रतियोगिता है। वह रोने लगी। उसे लग रहा था कि वह कभी पीलू से जीत नहीं पाएगी। तभी पीछे से उसकी माँ ने आवाज़ दिया- बेटा, तू तो सबसे तेज़ दौड़ती है। दौड़ तुम ही जीतोगी। गिल्लू ने हैरानी से पूछा- माँ, तुमने मुझे दौड़ते हुए कब देखा? माँ ने मुस्कुरा कर कहा- हर दिन मैं यहाँ से तुम्हें अभ्यास करते हुए देखती हूँ। गिल्लू ने सुबकते हुए पूछा- पर मैं पीलू से हार क्यों जाती हूँ? माँ ने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा- तुम अपने मन से हार का ड़र निकाल दो, और दौड़ते समय कभी पीछे मत देखो। मेरी सीख याद करते हुए दौड़ना। जीत तुम्हारी होगी।
अगले दिन गिल्लू समय पर तैयार हो कर दौड़ के ट्रैक पर पहुची। माँ ने दूर से हाथ हिलाया। दौड़ शुरू हुई। बिना पीछे देखे वह दौड़ती चली गई और वह रेस जीत गई।
रेस में प्रथम आने के बाद उसने माँ से पूछा – माँ तुमने क्या जादू किया था? माँ ने कहा- मैं ने कुछ भी नहीं किया था। बस तुम्हारे मन का डर निकल गया था। और हाँ, आगे वही बढ़ता है जो पीछे नहीं देखता ।तुम दौड़ के समय बार-बार पीछे देखने मे जो समय लगाती थी। उसमें ही पीलू तुमसे आगे निकल जाता था।गिल्लू बेटा,खेल-कूद प्यार और सद्भावना बढ़ाता है,लड़ाई-झगड़ा नहीं। आज पीलू की दुष्टता रेस-ट्रैक के कैमरे में सभी को नज़र आ गई। आज दौड़ में उसने बिनी बिल्ली को धक्का दिया था। राजा तेजा ने उसे कड़ी सजा देने का ऐलान किया है और तुम्हें प्रथम पुरस्कार मिलेगा।

बर्न-आउट ( एक सामान्य मनोवैज्ञानिक समस्या )

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बर्न-आउट क्या है ?

ज़िंदगी की भागम-भाग, तनाव, काम की अधिकता अक्सर हमे शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती है। जब यह थकान और परेशानी काफी ऊंचे स्तर तक चला जाता है तब ऐसा लगने लगता है जैसे जिंदगी की सामान्य समस्याओ को भी सुलझाना कठिन हो गया है। बर्न-आउट मानसिक या शारीरिक कारणो से हो सकता है। यह लंबे दवाब तथा थकान का परिणाम होता है।बर्न-आउट कार्य-संबंधी या व्यक्तिगत या दोनों कारणो से हो सकता है। ऐसे में मानसिक तनाव व स्ट्रैस बढ़ जाता है। स्वभाव में चिड़चिड़Iपन बढ़ जाता है। व्यक्ति अपने को ऊर्जा-विहीन, असहाय व दुविधाग्रस्त महसूस करने लगता है।

बर्न-आउट कैसे पहचाने ?
ऐसे मे नकारात्मक सोच ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मविश्वास व प्रेरणा मे कमी , अकेलापन, आक्रोश, नशे की लत, जिम्मेदारियो से भागने जैसे व्यवहार बढ़ जाते है। ऐसा व्यक्ति अपना फ्रस्टेशन दूसरों पर उतारने लगता है। ऐसे मे व्यक्ति हमेशा थका-थका व बीमार महसूस करता है। लगातार सिर और मांसपेशिओ मे दर्द, भूख व नींद मे कमी होने लगती है। अपने कार्य मे रुचि मे कमी, हमेशा असफलता का डर, अपना हर दिन बेकार लगने लगता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों के साथ जरूरत से ज्यादा कठोर, असहनशील और चिड़चिड़ा हो जाता  है। गैस्ट्रिक व ब्लड-प्रेशर का उतार-चढ़ाओ असामान्य हो जा सकता है।
ऐसे परिवर्तनो का मतलब है कि अपने शारीरिक व मानसिक कार्य भार को सही तरीके से संभालने की जरूरत है। अगर संभव है तो कार्य-भार को कम कर देना चाहिए। साथ ही अपने लाइफ-स्टाइल को संयमित करना कहिए। अपनी आवश्यकताओ तथा समस्याओं को समझ कर उनका ध्यान रखना चाहिए।

समाधान-
ऐसी समस्याए अक्सर काम को लत (वर्कहोलिक) बना लेने वाले लोगों में ज्यादा पाया जाता है। इसलिए काम के साथ-साथ मनोरंजन, रचनात्मकता, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना भी जरूरी है। जीवन की खुशिया मानसिक तनाव काम करती है। हर काम का ध्येय सिर्फ जीत-हार, जल्दीबाजी या लक्ष्य-प्राप्ति नहीं रखना चाहिए। सकारात्मक सोच और दूसरों को समझने की कोशिश भी आवश्यक है। जिंदगी की परेशानियों  और समस्याओं  को सही नजरिए से समझना भी जरूरी है। समस्याओं  से बचने के बदले उनका सामना करना चाहिए। काल्पनिक दुनिया से हट कर वास्तविकता और जरूरत के मुताबिक कठिनाइयों  को सुलझाना चाहिए। कार्य-स्थल पर  टीम मे काम करना, अपनी समस्यओं  को बताना, नयी जिम्मेदारियों  को सीखना भी सहायक होती है। कुछ लोग ‘ना’ नहीं बोल पाने के कारण अपने को काम के भार तले दबा लेते है। ‘ना’कहना सीखना चाहिए।
प्राणायाम, योग, योगनिद्रा, ध्यान, मुद्रा आदि की  भी मदद  ली  जा सकती है। इससे तनावमुक्ति होती है। स्फूर्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह पूरे व्यक्तित्व को सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। आयुर्वेद मे तुलसी को नर्व-टानिक तथा एंटि-स्ट्रैस कहा गया है। अतः इसका भी सेवन लाभदायक हो सकता है,पर गर्भावस्था में  बिना सलाह इसे ना लें।

यात्रा वृतांत – कालीघाट मंदिर कोलकाता

कोलकाता का विश्व विख्यात कालीघाट मंदिर भारत के किसी सामान्य उत्तर भारतीय मंदिर की तरह नज़र आता है। मंदिर की सड़क पर पहुचते ही पंडो का शोर शुरू हो जाता है। अब यह भक्त के ऊपर है कि पंडो की मदद ले या नहीं। आगे बढ़ने पर वही शोर-शराबा, पूजा सामग्री की ढेरो दुकाने, बिखरे फूल, भीख मांगते लोगों की भीड़। फिर नज़र आया पवित्र मंदिर। मंदिर के अंदर के खूबसूरत सफ़ेद जमीन पर गंदे पैरो के छाप दिखते है। मिट्टी- कीचड़ लगी फर्श नीचे अभी भी सुंदर होगी, यह समझ में आता है। संगमरमरी जमीन कीचड़ सना होने पर भी पर भी पवित्र लगता है। पर मन मे ख्याल आता है- काश यह साफ सुथरा होता। तब लगता है, हम लोग ही तो बार-बार फूल, चन्दन और जल ड़ाल कर मंदिरो का यह हाल करते है- पुनि-पुनि चन्दन, पुनि-पुनि पानी…………….
पंडो की मांगो, भीड़ के धक्को के बाद मंदिर के गर्भ-गृह में पहुँचना एक बड़े उपलब्धि का एहसास दिलाता है। अधर के तीन वर्ष के काली घाट, पंजाब नेशनल बैक कलकत्ता के प्रवास के दौरान बने अच्छे संबंधो का असर साफ नज़र आता है। वहाँ के एक महत्वपूर्ण पंडित जी ने अधर को तुरंत पहचान लिया। उनके सौजन्य से बड़ी सुविधा के साथ हम दोनों एकदम देवी के सामने पहुँच गए। देवी पर चढ़े लाल जवाफूल के बड़े बड़े हार प्रसाद स्वरूप हमारे गले में ड़ाल दिए। साथ ही मिला देवी पर चढ़ा सिंदूर, चुनरी, चूड़ी, आलता और प्रसाद। देवी प्रतिमा देख कर मन श्रद्धा से भर गया। पारस पत्थर की विशाल प्रतिमा भव्य और सुंदर है। देवी के चारो हाथ और लंबी, बाहर निकली जिव्हा स्वर्णमंडित है। एक हाथ मे तलवार है, जो पवित्र दैवी ज्ञान का सूचक है। दूसरे हाथ में नरमुंड है। जो मनुष्य के अहं का सूचक है और यह दर्शाता है कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए ईश्वरीय ज्ञान से अपने अहं का नाश करना जरूरी है। है। देवी के अन्य दो हाथ अभय और आशीर्वाद मुद्रा में है। यानि देवी के सच्चे भक्तों पर उनका आशीर्वाद हमेशा रहता है।
कालीघाट ५१ शक्तिपीठों में एक है। सती के शरीर के विभिन्न हिस्से जहाँ भी गिरे वहा शक्ति पीठों का निर्माण हुआ। मान्यता है कि कालीघाट में सती का दाहिना चरण गिरा था।
बाहर से सामान्य दिखनेवाला मंदिर एक अदभुत शांति और शक्ति का एहसास देता है। लगा जैसे माँ मेरी हर बात सुन रही है और उनका आशीर्वाद हमारे ऊपर सर्वदा से बना है। मैं मन ही मन देवी मंत्र जपने लगी-
ॐ ऐ ह्री क्लीं चामुंडाये विच्चे॥
फिर कामना करने लगी-
देहिसौभाग्यारोग्यम, देहि मे परमसुखम।
रूपं देहि जय देहि यशो देहि द्विषोजहि॥

हम सभी की बचपन से एक आदत बन जाती है। किसी मंदिर प्रांगण में पहुँच कर प्रतिमा के आगे नतमस्तक हो जाना। फिर मन की सभी कामनाएँ हम ईश्वर के सामने दुहराने लगते है। साथ ही अपनी गलतियों को भी स्वीकार करने लगते है।उसे धन्यवाद भी देते हैं।
आखिर ऐसा क्या होता है इन हिम-शीतल प्रस्तर प्रतिमाओ में? ये प्रतिमाएँ हमें सजीवता का अहसास क्यों देती है? दरअसल धर्म मनुष्य के काउन्सेलिंग की एक स्वाभाविक पद्धति है, जो बचपन से धीरे-धीरे अनजाने ही हम सीखते जाते हैं और फिर यह हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाता है। मन तो हमेशा भागता है।पर उसे साधने का कितना सरल तरीका है। बस इसे सीखने की जरूरत है।
ईश्वर की प्रस्तर प्रतिमा हमें अपनी भावनाओ को निर्भीक रूप से व्यक्त करने का अवसर देती है। मन में पूरा विश्वास रहता है कि ये बातें मेरे और ईश्वर के बीच है। हमें अपनी बातों के सुनवाई का पूरा विश्वास होता है। जैसे हम किसी काउंसिलर को निर्भीक रूप से अपनी समस्याओं को बताते है और हमारा मन हल्का हो जाता है।
यह मन अनेक समस्याओं का जड़ है। जब मन में भरी बातें बाहर निकलती है तब मन हल्का लगने लगता है। यह हमारे मन को निर्मलता की भावनाओ और आत्मविश्वास से भर देता है। हमारा धर्म मनुष्य के काउन्सेलिंग की एक स्वाभाविक पद्धति है, जो बचपन से धीरे-धीरे अनजाने ही हम सीखते जाते हैं और फिर यह हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाता है।

एक आईना ( दहेज पर आधारित वास्तविक कहानी )

नवीन कार की स्टेरिंग अपने अपार्टमेंट के रोड़ मे घुमाते हुए मन ही मन सोच रहा था – ये आज़-कल के मल्टी-नेशनल कंपनियाँ भी हद है। पैसा तो ज़्यादा जरूर देती है, पर काम भी कोल्हू के बैल की तरह लेतीं है। न तो काम का समय तय होता है न काम की सीमा है। बस टारगेट पकड़ा देते है। पिछले कुछ दिनों से वह बहुत व्यस्त रह रहा है। मन ही मन सोच रहा था, आज खाना खा कर तुरंत सोने चला जाएगा। कल ऑफिस जल्दी जाना है।
नवीन थका हारा घर पहुचा। बड़ी भूख लगी थी। पर हमेशा की तरह मृदुला टीवी के सामने बैठी सीरियल देख रही थी। वह टीवी देखने में ऐसी व्यस्त थी। जैसे उसे नवीन की उपस्थिती का एहसास ही न हो। नवीन ने परेशान हो कर माला को आवाज़ देते हुए खाना लगाने कहा। माला उसकी पत्नी के साथ दहेज में आई थी। माला ही घर का सारा काम संभालती थी। चाहता तो था वह मृदुला को आवाज़ देना, पर उसके तीखी बातों का सामना करने की ताकत अभी उसमें नहीं थी। कभी-कभी उसकी बड़ी चाहत होती, उसके मित्रों की पत्नियों की तरह मृदुला उस के लिए कुछ बनाए और प्यार से खिलाये। आफिस से लौटने पर दरवाजा खोल उसके गले से लिपट जाए। पर ऐसी उसकी किस्मत कहाँ?
मृदुला से विवाह करने का निर्णय उसका ही था। अम्मा ने एक-दो बार कुछ कहने की कोशिश भी की। पर हमेशा की तरह पापा ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया। नवीन को आज भी याद है। अम्मा ने कहा था- धन नहीं गुण देख बेटा।

अपनी शादी के लिए, पापा के साथ न जाने कितनी लड़कियां उसने देखीं था। उसे सभी में कुछ न कुछ नुक्स नज़र आता। पापा उसकी ऊंची पसंद की तारीफ करते। मृदुला को देखने जब वह पहुँचा। बिना लाग लपेट के होनेवाले ससुर जी ने बात शुरू की। उन्होंने बताया, निर्मला बड़े लाड़ में पली है और वे उसके दहेज में किसी तरह कमी नहीं करना चाहतें है। उनके बताए रकम और सामानों के लिस्ट को देखते हुए नवीन ने निर्णय लेने में देर नहीं की।

पहली बार देखने पर उसे बिलकुल शांत स्वभाव की मृदुला तुरंत पसंद आ गई। यह तो उसे बाद में समझ आया कि यह तूफान के पहले की शांति थी। होनेवाली स्मार्ट सासु ने दहेज में ‘आया’ माला को भेजने की बात कह कर उसे गदगद कर दिया। माला की सारी ज़िम्मेदारी और तंख्वाह ससुराल वालों की ज़िम्मेदारी थी।
मृदुला थोड़ी मोटी, स्वस्थ गालोंवाली श्यामल सुंदरी थी। हाँ, नाक थोड़ी दबी और आगे से फैली थी। उसका मोटा होना नवीन के पापा को भला लग रहा था। दरअसल, खाते-पीते घर की स्वस्थ पुत्री, अति मोटे नवीन के सामने दुबली ही लग रही थी। और उसकी पसरी नाक पिता के वैभव के चमक में नवीन को नज़र ही नहीं आ रही थी। नवीन खाने-पीने का भरपूर शौकीन था। अपनी कमाई का भरपूर प्रभाव उसके सेहत पर नज़र आता था। इस मोटापे ने उसके काले रंगरूप को और बदसूरत बना दिया था। ठुड्डी ने नीचे तह दर तह जमे मोटापा गले तक फैला था।
मृदुला के लिए पिता-पुत्र ने सहमति दे दी। वहाँ से लौट पापा नें बड़े दर्प से अम्मा को सुनाते हुए कहा – मुझे पता था कि नवीन को उसके ओहदे के अनुसार पत्नी और ससुराल जरूर मिलेगा। देखो कैसे भले लोग है। मुँह खोलने की नौबत ही नहीं आने दिया लड़कीवालों ने। बिना माँगे ही घर भरने के लिए तैयार हैं। दरअसल नवीन के ऊँचे पद और बहुत ऊंची तंख्वाह का पापा को बड़ा अहंकार था पर अम्मा दहेज के खिलाफ थीं।
खाना नहीं लगाते देख नवीन ने फिर माला को आवाज़ दी। टीवी से बिना नज़रें हटाये, मृदुला ने फरमाइश पेश कर दी। आज उसे फ़ैशन मॉल के फूड-कोर्ट से चाट और छोले खाने का मन है। नवीन, मृदुला की रोज़-रोज़ की फरमाइशों से परेशान था। पर वह मरे मन से चुपचाप कार में मृदुला को ले कर माल की ओर बढ़ गया।
मॉल पहुँच कर मृदुला ने उसे कुछ ताज़ी सब्जियाँ और फल लेने कहा, और एक ओर खड़ी हो गई। उसे मृदुला पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। पर वह बड़े बेमन से ख़रीदारी करने लगा। तभी सामने लगे बड़े-बड़े आईने में उसने अपने-आप और मृदुला को देखा। रोज़-रोज़ के होटलों के चटपटे भोजन ने उन्हें और गोल-मटोल बना दिया था। मन ही मन सोचने लगा- चलो, कल से माला को घर पर भोजन बनाने कहेगा। हाल में ही डाक्टर ने उन दोनों को वजन कम करने का निर्देश दिया था। अब सेहत पर ध्यान देना जरूरी है।
मृदुला के गुस्से को वह मॉल के कर्मचारियों पर उतारने लगा। हरी-हरी ताज़ी लौकी और तोरई देख कर भी वह झुँझला कर कहने लगा – ये लौकी तो मोटी हैं। मुझे लंबी और पतली लौकी चाहिए। तभी सामने लगे आईने में एक लंबी, छरहरी और आकर्षक महिला को वहाँ के कर्मचारियों को निर्देश देते देखा। चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा, पर कुछ याद नहीं आया। मॉल का कर्मचारी, जो उसकी मदद कर रहा था, उसने बताया, वे यहाँ के मालिक की पत्नी है। बड़े अच्छे स्वभाव की हैं। उनके प्रयास से बहुत कम समय में ही मॉल ने बहुत तरक्की कर ली है।
बड़ी देर तक वह सब्जियों की ख़रीदारी में उलझा रहा, पर उसे कुछ ठीक से समझ ही नहीं आ रहा था। तभी पीछे से किसी महिला की मीठी आवाज़ आई। नवीन ने आईने में ही देखा ,उसकी मदद कर रहे कर्मचारी को उसी महिला ने आवाज़ देता हुए कहा – ये लंबी, मोटी, पतली में ही उलझे रह जायेंग। तुम दूसरे ग्राहकों की भी मदद करो। वह हतप्रभ रह गया। आवाज़ सुनते ही उसे सब याद आ गया। यह तो वीणा थी। उसके विवाह की बात वीणा से चली थी। उसे वीणा पसंद भी आ गई थी। नवीन ने उससे फोन पर बातें भी की थीं। दहेज की रकम और सामानों का लिस्ट देख वीणा के पिता ने असमर्थता जताई। नाराज़ हो कर उसके पापा ने बात रोक दी। चिढ़ कर, झूठमूठ उसके पापा ने वीणा के पापा को फोन पर कह दिया- आपकी लड़की थोड़ी मोटी और छोटी है। हमें लंबी और पतली बहू चाहिए।   हमें आपकी लड़की पसंद नहीं है।
नवीन आईने में कभी वीणा और कभी मृदुला को देखता रह गया। उसे लगा आईना उसे मुँह चिढ़ा रहा है। आज उसे अम्मा की बात बड़ी याद आ रही थी- “ धन नहीं गुण देखो बेटा”

वह कौन थी? ( अद्भुत अनुभव )

28 दिसंबर 2014 की सुबह थी। बीते हुए क्रिसमस की खुमारी थी। यहाँ-वहाँ सजावटी सितारे और क्रिसमस-ट्री नज़र आ रहे थे। आनेवाले नव वर्ष का उत्साह माहौल में छाया था। खुशनुमा गुलाबी जाड़ा पुणे के मौसम को खुशगवार बना रहा था। मैं, अधर और चाँदनी पुणे से मुंबई जाने के लिए टैक्सी से निकले थे। हल्की ठंड की वजह से हमें चाय पीने की इच्छा हुई। टैक्सी ड्राईवर ने पुणे के महात्मा गाँधी रोड के करीब एक ईरानी रेस्टरेंट के चाय-मस्के की बड़ी तारीफ की। हमारे कहने पर वह हमें वहाँ ले गया। यह सैन्य क्षेत्र था।यहाँ चारो ओर बड़े-बड़े हरे-भरे पेड़ थे। सड़क के किनारे करिने से पौधे लगे थे। यहाँ की हरियाली भरी खूबसूरती और शांत वातावरण बड़ी अच्छी लगी। पर टैक्सी रुकते ही पास में एक भिखारिन नज़र आई। गंदे ऊँचे स्कर्ट और लटकी हुई शर्ट के ऊपर फटी पुरानी स्वेटर और बिखरे बाल में बड़ी अजीब लग रही थी।बेहद दुबली पतली थी। शायद पागल भी थी। सड़क के किनारे, रेस्टोरेन्ट के बगल में खड़ी थी। उसने नज़र उठा कर हमारी ओर देखा। मैं उससे बचते हुए तेज़ी से दूसरी तरफ से घूमते हुए रेस्टोरेन्ट की तरफ बढ़ी। वह भी शायद जल्दी में थी। अपनी धुन में वह दूसरी ओर बढ़ गई। मैं ने चैन की साँस ली। सड़कों पर ऐसे भीख माँगनेवाले लोग मुझे असहज बना देते हैं।पता नहीं यह भिक्षावृति कब हमारे देश से ख़त्म होगी। किसी भी खूबसूरत जगह पर ये एक बदनुमा धब्बे की तरह लगते हैं। मेरी समझ में नहीं आता है कि इन्हे भीख दे कर इस प्रवृति को बढ़ावा देना चाहिए या डांट कर हटा देना चाहिए?
रेस्टोरेन्ट के अंदर जा कर मैं उस भिखारिन को भूल गई। ईरानी रेस्टोरेन्ट की चाय सचमुच बडी अच्छी थी। मन खुश हो गया। पूरा रेस्टोरेन्ट चाय पीने वाले लोगों से भरा था। गर्मा-गर्म चाय और साथ मेँ मस्का बड़ा लाजवाब था। पर बाहर निकलते ही फिर वही औरत नज़र आई। मैं तेज़ी से कार की ओर बढ़ी। शायद मैं उसे अनदेखा करना चाहती। तभी उसने शुद्ध अँग्रेजी मेँ मुझे आवाज़ दी और कहा- “मैडम, मैं बहुत भूखी हूँ। मुझे कुछ पैसे मिल जाते तो मस्का खरीद लेती। मेरे पास चाय है।“ उसने अपने हाथ मे पकड़ी हुई प्लास्टिक की गंदी और टेढ़ी-मेढ़ी बोतल दिखलाई। उसमें चाय थी। उसने फिर शालीनता से सलीकेदार भाषा मेँ अपनी बात दोहराई। मैं अवाक उसे देख रही थी। यह पागल सी दिखनेवाली भिखारिन कौन है? इसकी बोली और व्यवहार तो कुछ और ही बता रही थी। मैंने पीछे से आ रहे अपने पति अधर की ओर देखा। उन्होने पॉकेट से कुछ रुपये निकाल कर उस महिला को दिए। अधर ऐसे लोगों के साथ बड़ी सहजता और उदारता से पेश आते हैं। उस महिला ने मुस्कुरा कर मृदु स्वर मेँ धन्यवाद दिया। फिर मेरी ओर देखा और मेरे खुले बालों की प्रशंसा करते हुए नव वर्ष की शुभ कामना दी और कहा –“अपना ख्याल रखना।”
कार मेँ बैठते हुए मैंने अपना आश्चर्य प्रकट किया-“ इतनी सलीकेदार महिला इस हालत मेँ क्यों है?” तब टैक्सी ड्राईवर ने बताया कि वह महिला किसी जमाने के डर्बी किंग की पत्नी है।अति-धनी, जुआरी और रेस के शौकीन पति  की वजह से उसका यह हश्र हुआ। जुआ सिर्फ महाभारत काल का कलंक नहीं है। आज भी कई  निर्दोष परिवारों को  इसका मुल्य चुकाना पड़ा है।
उस दिन पहली बार भिक्षावृति का औचित्य समझ आया और अधर का ऐसे लोगों को मदद करने पर मन मेँ किसी तरह की दुविधा नहीं हुई।दरअसल भिक्षावृति प्राचीन काल से जरूरतमंदों, विद्यार्थियों और संतों के आजीविका का साधन रहा है। पर आज-कल यह एक गलत प्रचलन बन गया है। कुछ बेजरूरत लोगों ने इसे पेशा बना लिया है।