क़ौन सुने अनकही

झोंके ने मुआफ़ी माँग भी ली तो क्या,

दरख़्त से टूटे पत्तों ने कहा —

हम तो बिखर ही गए यहाँ।

ज़ख़्म भर भी जाएँ तो क्या,

निशान तो रहते हैं सदा।

कौन सुने अनकही दिल की दास्ताँ,

हर कोई अपने आप में गुम यहाँ।

आग़ाज़

दिन की दहलीज़

संवेदनशीलता बनी रहे !!

Topic given by YourQuote.

जीते अपने हार से!

कुछ पल ग़ैर मामूली

क्षणिक ज़िंदगी

ज़ख्मों से तराशे!!

ख़ुद को आज़माते रहो!

आइने की फ़ितरत