ज़िंदगी के रंग -73

बाहर जाने का रास्ता खोजती

काँच और असली खुली

खिड़की की मृग मरिचिका

में उलझी काँच पर सर पटकती

कीट या मक्षिका  को देख कर क्या

नहीं लगता कि हम भी अक्सर

ऐसे ही किसी उलझन में फँस

किसी भ्रम के पीछे

सिर पटकते रहते हैं ?

ज़िंदगी के रंग – 72

रोज़ हँसाती- रुलाती ,

भगाती – दौड़ती ,

परेशानियों में रूबरू कराती

ज़िंदगी से परेशान हो कर

आख़िरकार पूछ ही लिया –

छः माही , सालाना परीक्षाओं

की तो आदत सी है .

पर तुमने तो हद ही कर दिया .

जब देखो परखती जाँचती रहती हो…..

यह सिलसिला कब रोकोगी?

ज़िंदगी की खिलखिलाहट

झंकार सी खनक उठी बोली –

फिर ज़िन्दगी हीं क्या होगी ?

इन्हीं से तो बनी हो

तुम और तुम्हारी ज़िंदगी.

जिंदगी जीना सीखा गए

कुछ गैर ऐसे मिले,

जो मुझे अपना बना गए।

कुछ अपने ऐसे निकले,

जो गैर का मतलब बता गए।

दोनो का शुक्रिया

दोनों जिंदगी जीना सीखा गए।

Unknown

उम्र चाहे जो भी हो…..

उम्र चाहे जो भी हो मनचाहे रिश़्ते,

अपने आप हमउम्र हो जाते हैं।

Unknown

ज़िंदगी के रंग -71

कभी कभी समझ नहीं आती ,

क्यों है ज़िंदगी इतनी उलझन भरी ?

जितनी सुलझाओ उतनी

ही उलझती जाती है .

रंग बिरंगे उलझे धागों की तरह

कहीं गाँठे कहीं उलझने हीं उलझने

और टूटने का डर …..

क्या यही है ज़िंदगी ?

हुनर

कोई हुनर ,

कोई राज ,

कोई राह ,

कोई तो तरीका बताओ….

दिल टूटे भी न,

साथ छूटे भी न , कोई रूठे भी न ,

और ज़िन्दगी गुजर जाए।

Unknown

ज़िंदगी के रंग -64

तहज़ीब के ख़िलाफ़ हुआ,

सच का बोलना..!!

अब झूठ ज़िन्दगी के ,

सलीक़े में आ गया…!!

– Unknown

अपने लिए खड़े होना

कहते है –

जीत कर, फिर से हार जाना..

यही तो रवायत है, रिश्ता निभाने की…

पर जब किसी को सिर्फ़ जीतने की

आदत हो जाए .

झुकना नहीं सिर्फ़ झुकाना

ही नियम बन जाय……..

तब ?????

हारते और झुकते रहने

से अच्छा है –

अपने लिए खड़े होना सीखना ……

गुज़र जाने दो !

वक़्त बहुत कुछ दिखलाता है .

कभी ख़ुशियों की बरसात ,

कभी ग़मों की धूल भरी आँधी .

ख़ूबी तो तब है , जब

अपने ऊपर से …….

हर आँधी को बस गुज़र जाने दें

घास की तरह .

वृक्ष की तरह तने रहे तो

टूट भी सकते है .

जन्नत

Best I have ever read on Kashmir situation…

उम्र जन्नत में रह कर,

उसे उजाड़ने में गुज़ार दी,

और जिहाद बस इस बात का था,

की मरने के बाद जन्नत मिले…!!!