यूं तो जिंदगी में आवाज देने वाले,
ढेरों मिल जायेंगे …….
लेकिन बैठिए वहीं,जहां
अपनेपन का अहसास हो…..

Unknown
यूं तो जिंदगी में आवाज देने वाले,
ढेरों मिल जायेंगे …….
लेकिन बैठिए वहीं,जहां
अपनेपन का अहसास हो…..

Unknown
शाम की शाम
ढलती हँस रही है ,
ज़िंदगी गुज़रती ,
हँस रही है .
पर क्या है
जो अधूरा है ?
क्या तृष्णा है ?
दिल की बेचैनी
क्या खोज रही है ?

कभी आ भी जाना
बस वैसे ही जैसे
परिंदे आते है आंगन में
या अचानक आ जाता है
कोई झोंका ठंडी हवा का
जैसे कभी आती है सुगंध
पड़ोसी की रसोई से
आना जैसे बच्चा आ जाता
है बगीचे में गेंद लेने
या आती है गिलहरी पूरे
हक़ से मुंडेर पर
जब आओ तो दरवाजे
पर घंटी मत बजाना
पुकारना मुझे नाम लेकर
मुझसे समय लेकर भी मत आना
हाँ अपना समय साथ लाना
फिर दोनों समय को जोड़
बनाएंगे एक झूला
अतीत और भविष्य के बीच
उस झूले पर जब बतियाएंगे
तो शब्द वैसे ही उतरेंगे
जैसे कागज़ पर उतरते है
कविता बनके
और जब लौटोतो थोड़ा
मुझे ले जाना साथ
थोड़ा खुद को छोड़े जाना
फिर वापस आने के लिए
खुद को एक-दूसरे से पाने
के लिए.

गुलज़ार ~~
स्वभाव की सरलता भय नहीं
संस्कारो की देन है ……
जैसे समीर की सरलता ,
जल की शीतलता .
पर उनका रौद्र रूप
विध्वंस भी ला
सकता है .
दिलों दिमाग़ के जद्दो जहद में
कभी दिल जीतने लगता है
और कभी दिमाग़ .
समझ नहीं आता कहाँ से
छुप कर ये हमें
चलाते हैं….
पर यह तय है ये
कम ही साथ साथ दोस्ती निभाते है .
अक्सर ये हमें
बड़ा नचाते हैं.

मौन वह कहता है,
जो शब्द नहीं
दिल से जो दिया जाए
वह दिया नहीं जा सकता हाथों से ….

ख्वाहिशें कम हों,
तो आ जाती है नींद
पत्थरों पर भी,
वरना बहुत चुभता है,
मखमल का बिस्तर भी.

Unknown
अजनबी सी है ये जिंदगी,
और वक्त की तेज़ है रफ्तार.
रात इकाई,
नींद दहाई
ख्वाब सैंकडा,
दर्द हजार
फिर भी है जिँदगी मजेदार.

Unknown
बाहर जाने का रास्ता खोजती
काँच और असली खुली
खिड़की की मृग मरिचिका
में उलझी काँच पर सर पटकती
कीट या मक्षिका को देख कर क्या
नहीं लगता कि हम भी अक्सर
ऐसे ही किसी उलझन में फँस
किसी भ्रम के पीछे
सिर पटकते रहते हैं ?

रोज़ हँसाती- रुलाती ,
भगाती – दौड़ती ,
परेशानियों में रूबरू कराती
ज़िंदगी से परेशान हो कर
आख़िरकार पूछ ही लिया –
छः माही , सालाना परीक्षाओं
की तो आदत सी है .
पर तुमने तो हद ही कर दिया .
जब देखो परखती जाँचती रहती हो…..
यह सिलसिला कब रोकोगी?
ज़िंदगी की खिलखिलाहट
झंकार सी खनक उठी बोली –
फिर ज़िन्दगी हीं क्या होगी ?
इन्हीं से तो बनी हो
तुम और तुम्हारी ज़िंदगी.

You must be logged in to post a comment.