बेमौत मरती नदियां -कविता Dying Rivers- poem

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The river’s ecosystem has left 65 percent of the world’s rivers in danger of losing biodiversity due to various factors.   The Sarasvati River is one of the main Rigvedic rivers mentioned in the scripture Rig Veda and ancient Sanskrit texts. Around ,  70 per cent of the sites that have been discovered to contain archaeological material dating to this civilization’s period are located on the banks of the now dried out Saraswati river.

 

पौराणिक कथा के अनुसार सरस्वती नदी शुष्क हो तिरोहित हो गई। इसका गहरा प्रभाव मानव जाति पर पड़ा। वर्तमान सूखी हुई सरस्वती नदी के समानांतर खुदाई में ५५००-४००० वर्ष पुराने शहर मिले हैं जिन में पीलीबंगा, कालीबंगा और लोथल भी हैं। यहाँ कई यज्ञ कुण्डों के अवशेष भी मिले हैं, जो महाभारत में वर्णित तथ्य को प्रमाणित करते हैं।ऋग्वेद के नदी सूक्त के अनुसार यह पौराणिक नदी पंजाब के पर्वतीय भाग से निकलकर कुरुक्षेत्र और राजपूताना से होते हुए प्रयाग या इलाहाबाद आकर यह गंगा तथा यमुना में मिलकर पुण्यतीर्थ त्रिवेणी कहलाती है।

 

 हम,

प्रकृति से   लेना जानते हैं पर संभालना नहीं जानते।

ना अपना भविष्य ना  अपने संतति का भविष्य,

ना इतिहास से सबक लेना चाहते है।

पौराणिक कथा के अनुसार सरस्वती नदी

शुष्क हो तिरोहित हो गई।

इस नदी के साथ ना जाने कितने

 ज्ञान , विज्ञान , सभ्यतायें लुप्त हो गईं ।

                                                          कितने नासमझ हैं हम?

 

प्रकाश प्रदूषण- नविनतम खोज

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अधिक कृत्रिम रोशनी प्रकाश प्रदूषण पैदा करता है। नविनतम खोज प्रकाश प्रदूषण गणना प्रस्तुत करते हैं। दुनिया के 80% से अधिक है और अमेरिका और यूरोपीय आबादी के 99% से अधिक लोग प्रकाश प्रदूषित माहौल में रहते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यता आज अपने ही बनाए प्रकाश की चादर में ढंक गई है। जो कोहरे की चादर जैसी हमारे चारों ओर छा गइ है। यह हमारी दृष्टि के लिए बाधा है।

विकसित माने जाने देशों में प्रकाश प्रदूषण सबसे ज़्यादा है. संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के देशों में 99 प्रतिशत लोगों के लिए आकाशगंगा अदृश्य हो चुकी है।

images from internet.

चेरापुंजी ( खूबसूरत यात्रा वृतांत )

शिलांग के पास, चेरापुंजी विश्व की सबसे ज्यादा बारिश वाली जगह है। इस स्थान का वास्तविक नाम सोहरा है। सोहरा बड़ी साफ-सुथरी जगह है। यहाँ के इको पार्क से पहाड़, और घाटियाँ का नज़ारा खूबसूरत लगता है।

यहाँ की एक और लाजवाब चीज़ है- पेडों की सजीव जड़ों से बना झूलता पुल। यहाँ की ख़ासी जन जातियों के लोग अपने अद्भुत योग्यता का इस्तेमाल करते हुए इस तरह के पुल बना लेते हैं। जब किसी नदी के ऊपर यह पुल बनाना होता है, तब ये सुपारी के पेड़ के लंबे-लंबे तनों को बीच से चीर कर नदी के ऊपर इस पार से उस पार तक रख देते है। यहाँ के रबर के पेड़ों की नई पतली जड़ों को उस दिशा में बढ़ने देते है। यहाँ का मौसम और हमेशा होने वाली बारिश इन जड़ों को सुपारी के तनों पर बढ्ने में मदद करती है। बढ़ते-बढ़ते दूसरे किनारे पर जा कर ये जड़ें मिट्टी में जड़ें जमा लेतीं हैं। धीरे-धीरे ये जड़ें मजबूत हो जाती है। इस तरह ये जड़ें मजबूत पुलों का रूप का ले लेती है।

इन पर से आसानी से नदी पार किया जा सकता है। ये पुल बहुत मजबूत होतें हैं। इस तरह के पुल मानव मस्तिष्क की अद्भुत देन है। पूरे विश्व में ये पुल अनोखे हैं। ऐसे पुल और कहीं नहीं पाए जाते हैं।

हुगली की उल्टी धार और डॉलफिन ( यात्रा अनुभव )

कोलकाता के प्रवास के दौरान एक ऐसे होटल में रुकने का अवसर मिला जो हुगली नदी पर है। यह होटल दावा करता है, कि यह भारत भर में नदी पर बना अकेला होटल है। यह वास्तव में अनोखा होटल है। इसमें रहने का अपना मज़ा है। सबसे ख़ास बात है हुगली के पल-पल बदलते रंग को इतने निकट से देखने का अवसर मिलता है। यह होटल हुगली नदी के बीच जहाज के रूप में बना है। इसलिए दिन और रात हर समय नदी को करीब से देखा जा सकता है।
सुबह की लालिमा, जाल लगाते मछुआरे, दिन भर चलती छोटी-बड़ी नावों को देखने का आनंद लाजवाब है। कभी-कभी साधारण नावों और जहाजों के बीच चमचमाता आधुनिक स्टीमार तेज़ गति से इन्हे पीछे छोड़ता तेज़ी से गुजर जाता है। नदी में थोड़ी-थोड़ी दूर पर जेट्टी या घाट बने हैं। जहां से यात्री जहाज चलते रहते हैं। कोलकाता में नाव और जल जहाज यातायात के महत्वपूर्ण साधन है।जो सस्ती और सुविधाजनक है।
इस होटल से नया और पुराना दोनों हावड़ा पुल नज़र आता है। दूर, नदी के दूसरे किनारे पर हावड़ा रेलवे-स्टेशन नज़र आता है। नदी के दूसरे तट पर मंदिर और अनेकों जेट्टी/ घाट नज़र आते हैं। यहाँ रात का एक अलग मनमोहक नज़ारा होता है। बहुत से नाव, जहाज और बजरे सजे-धजे, रंगीन रौशनी से नहाए इधर-उधर पानी पर तैरते दिखते हैं। ये पर्यटकों से भरे होते हैं। एक जहाज तो जलपरी के आकार और सजावट वाला है।
इस चहल-पहल को देखने की चाहत में एक और दुर्लभ चीज़ नज़र आई। वह है हुगली/ गंगा डॉलफिन। मेरी छोटी पुत्री चाँदनी ने फोन पर मुझसे कहा था कि गंगा में डॉलफिनें हैं। पर मुझे वे नज़र नहीं आई थीं। इस होटल में रहने के दौरान मैंने अनेक बार डॉलफिनों को देखा। गंगा की डॉलफिनें शायद थोड़ी शर्मीली हैं। वे जल सतह पर कम समय के लिए आ कर तुरंत ही डुबकी लगा लेती हैं। अक्सर वे पानी की सतह पर तभी दिखती हैं जब पानी साफ-सुथरा हो। शायद गंदगी से उन्हें भी घुटन होती है।
इस होटल में रुक कर एक अजीब नज़ारा हुगली नदी में देखने को मिला। हुगली नदी बड़ी विशाल है। अक्सर इसकी सतह पर कुछ न कुछ कचरा तैरता नज़र आ जाता है। पर यह नदी चौड़े पाट में बड़ी शांति से कुड़े-कचरे के बोझ को लिए बहते रहती है। जल प्रवाह बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित होती रहती है। पर अचानक मैंने देखा कि जल प्रवाह उल्टी दिशा में होने लगा। अर्थात गंगा (हुगली) उल्टी बहने लगी। गंगा उल्टी बहना मुहावरे में जरूर कहा जाता है, पर वास्तव में ऐसा देख कर हैरानी होने लगी। लोगों के बताया कि यहाँ ऐसा अक्सर होता है। साथ ही नदी का जल स्तर या पानी का उतरना चढ़ना होता रहता है। दरअसल समुद्र यहाँ से बिलकुल करीब है। अतः यह समुद्र के ज्वार-भाटा का असर है। पर यह दृश्य मेरे लिए किसी अजूबे से कम नहीं था। इस उल्टी धार में सारे कुड़े कर्कट पानी के साथ वापस आने लगा। शायद समुद्र इन्हे लौटा रहा था। काश हम सब इस इशारे को समझ नदी और जल जीवों की मदद कर सकें।