मिट्टी

विचारों के गहरे सागर में अकेले

ङूबते-उतराते  मन में एक ख्याल,

एक प्रश्न आया।

हम सब मिट्टी से उपज़ें हैं,

एक दिन मिट्टी में मिल जायेंगें।

यह जानते हुए भी,

जीवन से मोह इतना गहरा क्यों होते है?

दरिया पर बरसते बादल !!

दोनों ने एक दूसरे को देखा ग़ौर से,

फिर दरिया पर बरसते बादल से पूछा

दरिया ने –

मुझे मेरा दिया हीं लौटा रहे हो?

या अपने राज मेरे कानों में गुनगुना रहे हो …

क्या अपने दिल की बातें मुझे सुना रहे हो?

 

सूरज ङूबने के बाद

सूरज ङूबने के बाद

क्षितिज़ के ईशान कोण पर

दमकता है एक सितारा…..

शाम का सितारा !

रौशन क़ुतबी सितारा

 ध्रुव तारा…

सूरज डूब जाए तब भी,

अटल और दिव्यमान रहने का देता हुआ संदेश.

तलाश

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा।

 

– बशीर बद्र

रश्क

 

जीवन के रंग – 202

जीवन की परीक्षाओं को हँस कर,

चेहरे की मुस्कुराहट के साथ झेलना तो अपनी-अपनी आदत होती है.

जीवन ख़ुशनुमा हो तभी मुस्कुराहट हो,

यह ज़रूरी नहीं.

 

अनुगच्छतु प्रवाह !

जीवन प्रवाह में बहते-बहते आ गये यहाँ तक।

 माना,  बहते जाना जरुरी है। 

परिवर्तन जीवन का नियम है।

पर जब धार के विपरीत,

 कुछ गमगीन,  तीखा मोङ आ जाये,

  किनारों अौर चट्टानोँ से टकाराने  लगें, 

  जलप्रवाह, बहते आँसुअों से मटमैला हो चले,

   तब?

 तब भी,

जीवन प्रवाह का अनुसरण करो।

यही है जिंदगी।

प्रवाह के साथ बहते चलो।

 अनुगच्छतु प्रवाह ।।  

जिंदगी के रंग – 201

संगेमरमर से पूछो तराशे जाने का दर्द कैसा होता है.

सुंदर द्वार, चौखटों और झरोखों में बदल गई,

साधारण लकड़ी से पूछो काटे जाने और नक़्क़ाशी का दर्द.

सुंदर-खरे गहनों से पूछो तपन क्या है?

चंदन से पूछो पत्थर पर रगड़े-घिसे जाने की कसक,

कुन्दन से पूछो आग की तपिश और जलन कैसी होती है.

हिना से पूछो पिसे जाने का दर्द.

कठोर  पत्थरों से बनी, सांचे में ढली मंदिर की मूर्तियां से पूछो चोट क्या है.

तब समझ आएगा,

तप कर, चोट खा कर हीं निखरे हैं ये सब!

हर चोट जीना सिखाती है हमें.

अौर बार-बार ज़िंदगी परखती है हमें।

 

पता

 

यादों के चंदन

 चंदन के साथ रखे थे कुछ

यादें अौ

ख़्वाब !

कुछ ख़्वाब

पूरे हुए,

कुछ अधूरे हैं।

पर संदल की  ख़ुशबू  से भर गये  हैं।