
शर्मिंदा विषधर ( व्यंग)



कहते हैं,
शादियाँ बिकने लगीं हैं।
जब देखने वाले ख़रीदार बैठे है,
ज़रूर बिकेंगी।
टिकें या ना टिकें,
क्या फ़र्क़ पड़ता है?
नई हुईं फिर बिकेंगी।
शादियों में, दिखावे के
बाज़ार बिकेंगे।
नई-नई अदायें बिकेंगी।
शो बिज़नेस की दुनिया है।
सिंपल लिविंग हाई थिंकिंग,
सादा जीवन उच्च विचार
का नहीं है बाज़ार।
ग़र हो निहारने वाली हुजूम,
तो क्या ग़म है?
शादियाँ बिकेंगी।
सुना है राम और रावण की राशि एक हीं थी,
पर कर्म अलग।
ऐसा हीं हाल है मीडिया का,
कुछ हैं पर्दाफ़ाश और कुछ सनसनीबाज़।
जनता है हैरान,
कैसे जाने कौन ईमानदार कौन चालबाज़ ?
किसकी खबरें सच मानें ?
किसकी बातें बेमानी ?
कुछ मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक जज बन
मिनटों में हत्या-आत्महत्या सुलझाते हैं।
शांत रहने,
सुशांत ना बनने की चेतावनी दे जाते हैं।
कम सुनाते है अपराध,
ड्रग्स, मर्डर, चाइल्ड ट्रैफ़िकिंग या फ़्लेश ट्रेडिंग की खबरें।
सर्वाधिक अख़बारों अौर खबरों वाले हमारे देश का यह हाल क्यों?
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ – मीडिया
टिका है कलम या कि तलवार पर?
शक्ति, धन या राजनेताअों पर?
चैनलों की टीआरपी या रेटिंग पर?
गर कलम खो देती है अपनी ताकत,
जागरुकता अौर सच्चाई ।
तब जाने अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा?
यहाँ तो कई शाख़ पर उल्लू बैठे हैं।
#व्यंग

Shocking video emerges from Karnataka govt hospital; 50 pigs found roaming hospital corridor in Kalaburagi
Charity begins at home…….????

शाश्वत रूप से अनुत्तरित एक प्रश्न है – जान की कीमत इतनी कम क्यों ?
पर अब एक नया प्रश्न है – जान की कीमत है भी या नहीं ?
और करनी है प्रिय वस्तु की कुर्बानी तब
अपनी जान अनमोल है ना ?
होगा वरना स्वार्थ पूर्ण।
सबसे मार्मिक स्थिति है उस बच्चे की है,
जो अपने घर में अपनों के साथ सुरक्षित नहीं महसूस कर रहा हो–
ना जाने कब क्या हो जाए ?
courtesy- Inserts & News 18.
Aim of Election – Elections enable voters to select leaders and to hold them accountable for their performance in office. … As a result, elections help to facilitate social and political integration. Finally, elections serve a self-actualizing purpose by confirming the worth and dignity of individual citizens as human beings.


चुनाव क्या गज़ब का खेल है?
वैसे तो मालुम नहीं ये भगवान को कितना याद करते हैं ?पर हर पाँच साल पर धर्म, मंदिर-मस्जिद मुद्दा याद कराते हैं।
झगङे बढ़ जाते हैं, मामला वहीं का वहीं रह जाता है।
वैसे तो नहीं पता ये इंसानियत को कितना याद करते हैं?
पर हर पाँच साल पर रिजर्वेशन-आरक्षण का खेल खेलाते हैं।
कभी भारत- पाक भँजाते हैं।
छींटाकशी, टीका-टिप्पणी, आरोप- प्रत्यारोप, एक दूसरे की टाँग खिचाईं में मस्त,
अँग्रेज ‘ङिवाइङ ऐंङ रुल’ का गुरुमंत्र दे गये।
बरसों बीते, अरसे बीते …………
मुद्दा वही पुराना हिट है।
मजे की बात है पक्षी आज भी जाल में फँस जाते हैं,
काश कुछ ऐसे मुद्दे होते –
स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, देश के उज्जवल भविष्य की बातें,
हमें यह लगता – अरे ! इस बार हम छले नहीं गये।

सुप्रसिद्ध हस्तियों की तरह, जुर्म करने वालों की ऐसी खबरों को क्या महत्व दिया जाना चाहिये?

सब जानते हैं कि
शादी ब्याह बराबरी वालों में होता है .
फिर क्या हम नासमझ है?
आप कुंडली मिलाते हो ,
रिश्ता करने से पहले .
हमने भी क्रेडेंशियल मिलाया है .
दोनों परिवार को जुर्म के क्षेत्र में एक सा पाया।
तब ऐसा सम्बंध बनाया है .
तब तो समाचार बन नाम कमाया है .
English news in detail –All in the ‘family’: Yakub Memon’s daughter weds 1993 Mumbai blasts accused Aziz Bilakhia’s son
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