जो सोन्धी सी ख़ुशबू बिखेर जाती है।
जो मेरी बालकोनी की फ़र्श आईना बना
मेरा अक्स अपने वजूद में झलका जाती है।

Topic- YourQuote
जो सोन्धी सी ख़ुशबू बिखेर जाती है।
जो मेरी बालकोनी की फ़र्श आईना बना
मेरा अक्स अपने वजूद में झलका जाती है।

Topic- YourQuote
ऊपर वाले ने दुनिया बनाते-बनाते, उस में थोड़ा राग-रंग डालना चाहा .
बड़े जतन से रंग-बिरंगी, ढेरों रचनाएँ बनाईं.
फिर कला, नृत्य भरे एक ख़ूबसूरत, सौंदर्य बोध वाले मोर को भी रच डाला.
धरा की हरियाली, रिमझिम फुहारें देख मगन मोर नृत्य में डूब गया.
काले कागों….कौओं को बड़ा नागवार गुज़रा यह नया खग .
उन जैसा था, पर बड़ा अलग था.
कागों ने ऊपर वाले को आवाज़ें दी?
यह क्या भेज दिया हमारे बीच? इसकी क्या ज़रूरत थी?
बारिश ना हो तो यह बीमार हो जाता है, नाच बंद कर देता है।
बस इधर उधर घुमाता अौ चारा चुंगता है.
वह तो तुम सब भी करते हो – उत्तर मिला.
कागों ने कोलाहकल मचाया – नहीं-नहीं, चाहिये।
जहाँ से यह आया है वहीं भेज दो. यहाँ इसकी जगह नहीं है.
तभी काक शिशुअों ने गिरे मयूर पंखों को लगा नृत्य करने का प्रयास किया.
कागों ने काकदृष्टि से एक-दूसरे को देखा अौर बोले –
देखो हमारे बच्चे कुछ कम हैं क्या?
दुनिया के रचयिता मुस्कुराए और बोले –
तुम सब तो स्वयं भगवान बन बैठे हो.
तुम्हें शायद मेरी भी ज़रूरत नहीं.

#SushantSinghRajput,
#BollywoodNepotism
सागर के दिल पर तिरती- तैरती नावें,
याद दिलातीं हैं – बचपन की,
बारिश अौर अपने हीं लिखे पन्नों से काग़ज़ के बने नाव।
नहीं भूले कागज़ के नाव बनाना,
पर अब ङूबे हैं जिंदगी-ए-दरिया के तूफान-ए-भँवर में।
तब भय न था कि गल जायेगी काग़ज की कश्ती।
अब समझदार माँझी
कश्ती को दरिया के तूफ़ाँ,लहरों से बचा
तलाशता है सुकून-ए-साहिल।
वर्षा की बूँदों को लिखने की ख़्वाहिश……
आकाश के काले मेघ से टपकते
बारिश की सुरीले संगीत ने
धरती के आँचल पर लिख
अपने आप पूरी कर दी .

सारे इत्रों की खुशबू,आज मन्द पड़ गयी…
मिट्टी में बारिश की बूंदे,जो चन्द पड़ गयी…

Unknown
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