पसंद

पसंद

हम चाहें ना चाहें,

सब हमें चाहें।

हम कबूलें या ना क़बूलें लोगों को,

पर हमें सब क़बूल करें।

यह ज़िद्द क्यों, सब पसंद करें तुम्हें?
क्या कायनात मे सभी पसंद हैं तुम्हें?

बिखरे शब्द 

इधर उधर बिखरे  शब्दोँ  को बटोरकर

उनमें  दिल के एहसास  और

जीवन के कुछ  मृदु कटु अनुभव डाल

बनती है सुनहरी

काव्यमय  कविता ……

कभी तो यह दिल के बेहद करीब होती है

सुकून भरी …मीठी मीठी निर्झर सी ….

और कभी जब यह  पसंद नहीं आती

मिटे पन्नों में कहीं दफन हो जाती है -ऐसी कविता !

जीवन के रंग – 42

हम सभी के पास

अपनी -अपनी कहानियाँ हैं…..

हम सब किसी ना किसी दौर से गुजरें हैं।

प्यार, नफरत, पसंद, नापसंद,

पछतावा दर्द , दुःख,  खुशी……

जो शायद दूसरे ना समझें।

यह सब तो जीवन के रंग हैं।

जो हमें तोङने के लिये नहीं

जोङने के लिये होते हैं।