
दरिया में सैलाब (04.02.2024)



यह तो वक़्त वक़्त की बात है।
टिकना हमारी फ़ितरत नहीं।
हम तो बहाव ही ज़िंदगी की।
ना तुम एक से रहते हो ना हम।
परिवर्तन तो संसार का नियम है।
पढ़ लो दरिया में
बहते पानी की तहरीरों को।
बात बस इतनी है –
बुरे वक़्त और दर्द में लगता है
युग बीत रहे और
एहसास-ए-वक़्त नहीं रहता
सुख में और इश्क़ में।

तहरीर
कभी ज़िंदगी की हर
लहर डराती थीं।
लगता था बहा ले जाएँगी
अपनी रवानी में।
एक दिन दरिया
कानों में फुसफुसाया –
मैं तो दरिया हूँ ।
कभी कभी ज़िंदगी
समुंदर लगेगी।
पर डरो नहीं।
ज़िंदगी की तहरीरों….
लिखावट को पढ़ना सीखो लो।
समय पर, अपने आप पर
भरोसा करना सीख लो।
अपने आप से प्यार
करना सीख लो।
मज़बूत बनाना सीख लो।
हर दरिया समुंदर में गिरता है,
सागर दरिया में नहीं।
दरिया की बातें सुन,
ज़िंदगी की दरिया में
तैरना सीख रहें हैं।
अब गोते लगा कर डूबते
नहीं, उभर जातें हैं ।
अब लोग परेशान है –
यह अक्स किस का है?
क्यों इतनी रौशनी है
पानी में ….
इनकी ज़िंदगानी में।
सागर के दिल पर तिरती- तैरती नावें,
याद दिलातीं हैं – बचपन की,
बारिश अौर अपने हीं लिखे पन्नों से काग़ज़ के बने नाव।
नहीं भूले कागज़ के नाव बनाना,
पर अब ङूबे हैं जिंदगी-ए-दरिया के तूफान-ए-भँवर में।
तब भय न था कि गल जायेगी काग़ज की कश्ती।
अब समझदार माँझी
कश्ती को दरिया के तूफ़ाँ,लहरों से बचा
तलाशता है सुकून-ए-साहिल।

नासमझी…नादानी क्या बया करे समझदारों की?
जंगल…धरा तो जल हीं रहें हैं.
दुनिया ने तरक़्क़ी इतनी कर ली नदी …पानी पर भी आग लगा दी.
अपने घर में आग लगे, दो पल भी बर्दाश्त नहीं.
बेज़ुबान जलचरों का घर- नदियाँ जलती रहें, चिंता नहीं.
यह समझदारी समझ नहीं आती.

हसरतों -अरमानों को पूरी करने की उम्र में, जब जिंदगी सबक सिखाने लगे,
तब समझ लो जिंदगी रंग दिखाने लगी है, तुम्हें दरिया सा गहरा बनाने लगी है।
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