हमेशा की तरह,
आज भी शाम की दहलीज़ पे,
आफ़ताब आसमान में सिंदूर फैलाए
इंतज़ार करता रहा चाँद का और तारों की बारात का.
क्या वह जानता नहीं
उसके तक़दीर में इंतज़ार और ढलना लिखा है?


जागता रहा चाँद सारी रात साथ हमारे.
पूछा हमने – सोने क्यों नहीं जाते?
कहा उसने- जल्दी हीं ढल जाऊँगा.
अभी तो साथ निभाने दो.
फिर सवाल किया चाँद ने –
क्या तपते, रौशन सूरज के साथ ऐसे नज़रें मिला सकोगी?
अपने दर्द-ए-दिल औ राज बाँट सकोगी?
आधा चाँद ने अपनी आधी औ तिरछी मुस्कान के साथ
शीतल चाँदनी छिटका कर कहा -फ़िक्र ना करो,
रात के हमराही हैं हमदोनों.
कितनों के….कितनी हीं जागती रातों का राज़दार हूँ मैं.
प्रतिपदा का कमज़ोर, क्षीण चाँद
थका हारा सा अपनी
पीली अल्प सी चाँदनी ,
पलाश के आग जैसे लाल फूलों पर
बिखेरता हुआ बोला –
बस कुछ दिनो की बात है .
मैं फिर पूर्ण हो जाऊँगा।
मेरी चाँदी सी चाँदनी हर अोर बिखरी होगी .
क्यों आज चुप है चाँद ?
ना जाने कितनी बातों का गवाह
कितने रातों का राज़दार
फ़लक से पल पल का हिसाब रखता,
कभी मुँडेर पर ,
कभी किसी शाख़-ए-गुल को चूमता,
गुलमोहर पर बिखरा कर अपनी चाँदनी अक्सर
थका हुआ मेरी बाहों में सो जाता था.
किस दर्द से बेसबब
चुप है चाँद ?

मेरे ख्याल में दिल की सच्ची अभिव्यक्ति ही सही लेखन है। यह कविता किसी ब्लॉगर द्वारा की गई सराहना का परिणाम है- Aapki kavitayein bahot hi achi lagti hai hamein!!
The secret of good writing is telling the truth. – Gordon Lish
कुछ जिंदगी की हकीकत, कुछ सपने,
थोङी कल्पनाअों के ताने-बाने
जब शब्दों में ढल कर
अंगुलियों से टपकते हैं पन्ने पर।
तब बनती हैं कविता।
जो अंधेरा हो ना हो फिर चांद अौर बिखरी चाँदनीं दिखाती हैं।
जो लिखे शब्दों से दिल में सच्चा एहसास जगाती हैं।
ऐसे जन्म लेती हैं कविताएँ -कहानियाँ।

चाँद चुराया
अरमानों को पूरा करने के लिए .
कई रातों की नींद अौर
साज़िश ख़्वाबों की
पूरी नहीं होने दीं।
ज़ुबा बया करती रही अपने ज़ज़्बात।
पर……….
तेज़ बयार चली और अरमानों का चाँद
छुप गया बादलों के आग़ोश में.
आवाज़ बिखर गई
टूटे काँच की किरचियों की तरह,
साथ हीं बिखर गए अरमानों के टुटे टुकड़े।
पूनम का धृष्ट चाँद बिना पूछे,
बादलों के खुले वातायन से
अपनी चाँदनी को बड़े अधिकार से
सागर पर बिखेर गगन में मुस्कुरा पड़ा .
सागर की लहरों पर बिखर चाँदनी
सागर को अपने पास बुलाने लगी.
लहरें ऊँचाइयों को छूने की कोशिश में
ज्वार बन तट पर सर पटकने लगे .
पर हमेशा की तरह यह मिलन भी
अधूरा रह गया.
थका चाँद पीला पड़ गया .
चाँदनी लुप्त हो गई .
सागर शांत हो गया .
पूर्णिमा की रात बीत चुकी थी .
पूरब से सूरज झाँकने लगा था .
खुशबू ने सीखाया बिखरना,
चाँद ने खामोशी।
खुद से गुफ्तगू करना सीखाया निर्झर ने,
ख्वाहिशों ने सीखाया सज़्दा – इबादत करना।
तनहाई, अकेलेपन ने फरियाद, शिकवा
पर
दुनिया के भीङ में भटकते- भटकते भूल जाते हैं सारे तालीम
शायद रियाज़ों की कमी है।
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