हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी

अनजानी चाह में,

ना दे बिसार जो है हाथ में।

कई धोखे…वहम भरी

आँख-मिचौली खेलती,

शोख़ ख्वाहिशें हम सब

उम्र भर रहते हैं तलाशते।

मिलने पर ग़र ना आए रास तो?

कहते हैं – हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी

कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन

फिर भी कम निकले।

साँस

हर साँस के साथ ज़िंदगी कम होती है.

फिर भी क्यों ख़्वाहिशें अौर हसरतें कम नहीं होतीं?