आज कोई जनक नहीं सीता के लिए

लाख जतन के बाद भी,

समाज में लड़कियों की स्थिति

में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं.

आज भी मिट्टी के सीत…

बर्तन में, माटी तले दबी

सीताएँ मिलती है.

पर अफ़सोस आज

जनक नहीं होते

उसे पुत्री जानकी बना

राजकन्या का दर्जा देने के लिए .

UP: Man digs pit to bury daughter at cremation site, finds infant girl alive in pot three feet below-

In a bizarre twist of fate, a trader here in Uttar Pradesh found a newborn girl in an earthen pot, which was buried almost three feet below the ground, while he had gone to inter his daughter, who died minutes after being born prematurely.

Hitesh Kumar Sirohi, the trader, rescued the girl and fed her milk using cotton. The girl is currently admitted to a private hospital.

News in detail

The Guest House

This being human is a guest house.
Every morning a new arrival.

A joy, a depression, a meanness,
some momentary awareness comes
as an unexpected visitor.

Welcome and entertain them all!
Even if they are a crowd of sorrows,
who violently sweep your house
empty of its furniture,
still, treat each guest honorably.
He may be clearing you out
for some new delight.

The dark thought, the shame, the malice.
meet them at the door laughing and invite them in.

Be grateful for whatever comes.
because each has been sent
as a guide from beyond.

 

— Rumi,
translation by Coleman Barks

सोने का मुल्लमा

किताब-ए-ज़िंदगी

का पहला सबक़ सीखा।

रिश्तों को निभाने के लिए,

अपनों की गिलाओ पर ख़ामोशी के

सोने का मुल्लमा चढ़ना अच्छा है।

पर अनमोल सबक़ उसके बाद के

पन्नों पर मिला –

सोने के पानी चढ़ाने से पहले

देखो तो सही…

ज़र्फ़….सहनशीलता तुम्हारी,

कहीं तुम्हें हीं ग़लत इल्ज़ामों के

घेरे  में ना खड़ा कर दे.

दफ्न पन्ने और बंद किताबें

यादें धुंधली पड़ती हैं समय के साथ,
आंखों की रोशनी धुंधली पड़ती है समय के साथ,
पर
यादों से 
तारीखे   क्यों नहीं धुंधली पड़ती?
जिंदगी के किताब से?
ना जाने क्यों हम खोलते हैं ,
दफ्न पन्नों और बंद किताबों को बारंबार ।

 

अक्स-ए-किरदार

चटकी लकीरें देख समझ नहीं आया

आईना टूटा है या

उसमें दिखने वाला अक्स-ए-किरदार?

 

अंश

कई बार मर- मर कर जीते जीते,
मौत का डर नहीं रहता.
पर किसी के जाने के बाद
अपने अंदर कुछ मर जाता है.
….शायद एक अंश अपना.
वह ज़िंदगी का ना भरने वाला
सबसे बड़ा ज़ख़्म, नासूर  बन जाता है.

 

तुम हो कहीं !!

श्रद्धांजलि Tribute to my husband 12.10.2018
I lost him in an accident. We donated his eyes. I am sure he is still here, watching this beautiful world.

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जब देखा तुम्हें,

शांत, नींद में डूबी बंद आँखें

शीतल चेहरा …..

चले गए ऐसा तो लगा नहीं.

वह पल, वह समय, वह दिन ….

लगा वहीं रुक गया।

वह ज़िंदगी के कैलेंडर का असहनीय दिन बन गया .

उस दिन लगा

ऐसा क्या करूँ कि तुम ना जाओ?

कुछ तो उपाय होगा रोकने का.

रोके रखने का, लौटाने का ……

कुछ समझ नहीं आ रहा था.

कुछ भी नहीं ….

पर इतना पता था

रोकना है, बस रोकना है .

तुम्हें जाने से रोकना है .

और रोक भी लिया ………

अब किसी भी अजनबी से मिलती हूँ

तब उसकी आँखों में देखतीं हूँ ….

कुछ जाना पहचाना खोजने की कोशिश में .

कहीं तुम तो नहीं …….

शायद किसी दिन कहीं तुम्हें देख लूँ.

किसी की आँखों में जीता जागता .

बस दिल को यही तस्सली है ,

तुम हो, कहीं तो हो, मालूम नहीं कहाँ ?

पर कहीं, किसी की आँखों में.

हमारी इसी दुनिया में.

या क्षितिज के उस पार ………?

श्रद्धा सुमन हैं ये अश्रु बिंदु

जो लिखते वक़्त आँखों से टपक

इन पंक्तियों को गीला कर गए .

गुमशुदगी की शिकायत

कहते हैं- सुबह का भूला,

शाम को लौट आए तो …

लौटने का इंतज़ार करते रहे.

पर वह शाम आती हीं नही.

गुमशुदगी की शिकायत दर्ज करनी है,

ऐ ऊपर वाले!!

तारीखें चुभती है!!

जाना जरूरी था,
तो कम से कम इतनी राहत
इतना अजाब तो दे जाते…
आँखों में सैलाब दे जानेवाले,
कैलेंडर के जिन पन्नों के साथ हमारी जिंदगी अटकी है।
उसमें से कुछ तारीखें तो मिटा जाते ।
ये तारीखें चुभती है।