
नये सफ़र

William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!





ज़िंदगी में जो इश्क़ तुमने सिखाये।
जीने के जो आदाब तुमने सिखाये।
ज़माने में यूँ अकेला छोड़,
जीवन के अधूरे सफ़र में साथ छोड़,
वस्ल-ओ-हिज्र के जो तरीक़े सिखाये।
इस हिज्र ने गुरु बन ऊपरवाले से मिलाये।
वस्ल-ए-इश्क़ गुरु बन मुझे मेरा पता बताए।
अर्थ –
* वस्ल-ओ-हिज्र – मिलन और वियोग, प्रेमी
और प्रेमिका का आपस में मिलना और बिछुड़ना।
* हिज्र – अकेलापन, जुदाई, विरह, वियोग,
विछोह, त्याग।

अपना पीछा करते करते,
मुलाक़ात हुई अपनी परछाईं-ए-नक़्श से।
मिले दरिया के बहते पानी में अपने अक्स से।
मिले आईने में जाने पहचाने अजनबी शख़्स से।
मुस्कुरा कर कहा आईने ने –
बड़ी मुद्दतों के बाद मिली हो अपने आप से।
वक्त तो लगेगा जानने में, पहचानने में।
उलझे जीवन रक़्स में,
बिंब-प्रतिबिंब देख बे-‘अक्स
हो खो ना जाए यह शख़्स।
अर्थ – रक़्स – नृत्य

कमल की अधखिली कलियाँ हों नीम-बाज़।
या नींद में डूबी आँखें नर्गिस-ए-नीम-बाज।
ख़ूबसूरती और ख़ुशबू से दोनों की कर देतीं है
दिल ख़ुश मिज़ाज।
अर्थ
*नर्गिस-ए-नीम-बाज -half opened eye (like narcissus flower)
* नीम–बाज़ – अध-खुला, आधा खुला आधा बंद, अधखुली,नशीली, मदहोश, मंत्रमुग्ध (प्रायः पलक, पुत्ली, आँख, कली आदि की विशेषता के लिए प्रयोग )

किसे तलाश रहें हो?
अपने आप को?तन्हाई में देखो गौर से आइने को।
मिलो और बातें करो, पहचानो अपने आप को।
अपना अक्स देखो।
अपनी आँखों में देखो।अपने साथ सारी ज़िंदगी है गुज़ारनी।
जैसे हो, वैसे स्वीकारो अपने-आप को।
मन में भरे सवालों के जवाब मिलने लगेंगे।
अपने-आप से ज़्यादा कोई अपना नहीं लगेगा।
Positive Psychology- Psychologists and
neuroscience researchers say, honestly
gazing Your Own Reflection in a mirror
brings Authenticity, emotional awareness
and a new, more positive perspective of
your self.

रंग बदलते मौसम, रंग बदलती दुनिया,
रस्ते बदलते दरिया और नादियाँ देख,
हर साँचे में ढलने वाले पानी के कहा – देख
वक़्त के साथ बदलना नहीं है मीनमेख।
नीर ने कहा, हर हाल में ख़ुश रहना सीख।
हमने तो सीख लिया हर हाल में ढलना।
भाप, बुलबुले बर्फ, नीर बन बह चलना।
ठंड में नाचते बर्फ के क्रिस्टल बन पलना।
बुलबुले से विलीन हो सम्मोहन बर्फ के फूल में खिलना।
जब अपना समय आएगा, बर्फ फिर नीर बन जाएगा।

छोड़ आयी हूँ उस दरवाज़े तक।
लौट कर आओगे नहीं उस फ़लक
वापस कभी इस जहान तक।
फिर भी हर आहट पर होता है शक।
नज़रें उठ जाती है इस ललक,
शायद लौट आओ, दिल कहता है बहक।
सूनी राहें देख कदम रह जाते हैं ठिठक।
रूह में रह जाती है कसक।
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