अकेलापन

जश्न-ए-चराग

नुज़ूम

जो इश्क़ तुमने सिखाये

ज़िंदगी में जो इश्क़ तुमने सिखाये।

जीने के जो आदाब तुमने सिखाये।

ज़माने में यूँ अकेला छोड़,

जीवन के अधूरे सफ़र में साथ छोड़,

वस्ल-ओ-हिज्र के जो तरीक़े सिखाये।

इस हिज्र ने गुरु बन ऊपरवाले से मिलाये।

वस्ल-ए-इश्क़ गुरु बन मुझे मेरा पता बताए।

अर्थ –

* वस्ल-ओ-हिज्र – मिलन और वियोग, प्रेमी

और प्रेमिका का आपस में मिलना और बिछुड़ना।

* हिज्र – अकेलापन, जुदाई, विरह, वियोग,

विछोह, त्याग।

अपना पीछा करते करते

अपना पीछा करते करते,

मुलाक़ात हुई अपनी परछाईं-ए-नक़्श से।

मिले दरिया के बहते पानी में अपने अक्स से।

मिले आईने में जाने पहचाने अजनबी शख़्स से।

मुस्कुरा कर कहा आईने ने –

बड़ी मुद्दतों के बाद मिली हो अपने आप से।

वक्त तो लगेगा जानने में, पहचानने में।

उलझे जीवन रक़्स में,

बिंब-प्रतिबिंब देख बे-‘अक्स

हो खो ना जाए यह शख़्स।

अर्थ – रक़्स – नृत्य

नीम-बाज़

कमल की अधखिली कलियाँ हों नीम-बाज़।

या नींद में डूबी आँखें नर्गिस-ए-नीम-बाज।

ख़ूबसूरती और ख़ुशबू से दोनों की कर देतीं है

दिल ख़ुश मिज़ाज।

अर्थ

*नर्गिस-ए-नीम-बाज -half opened eye (like narcissus flower)

* नीमबाज़ अध-खुला, आधा खुला आधा बंद, अधखुली,नशीली, मदहोश, मंत्रमुग्ध (प्रायः पलक, पुत्ली, आँख, कली आदि की विशेषता के लिए प्रयोग )

आईने और अक्स

किसे तलाश रहें हो?
अपने आप को?तन्हाई में देखो गौर से आइने को।
मिलो और बातें करो, पहचानो अपने आप को।
अपना अक्स देखो।
अपनी आँखों में देखो।अपने साथ सारी ज़िंदगी है गुज़ारनी।
जैसे हो, वैसे स्वीकारो अपने-आप को।
मन में भरे सवालों के जवाब मिलने लगेंगे।

अपने-आप से ज़्यादा कोई अपना नहीं लगेगा।

Positive Psychology- Psychologists and
neuroscience researchers say, honestly
gazing Your Own Reflection in a mirror
brings Authenticity, emotional awareness
and a new, more positive perspective of
your self.

नीर या बर्फ के फूल ?

रंग बदलते मौसम, रंग बदलती दुनिया,

रस्ते बदलते दरिया और नादियाँ देख,

हर साँचे में ढलने वाले पानी के कहा – देख

वक़्त के साथ बदलना नहीं है मीनमेख।

नीर ने कहा, हर हाल में ख़ुश रहना सीख।

हमने तो सीख लिया हर हाल में ढलना।

भाप, बुलबुले बर्फ, नीर बन बह चलना।

ठंड में नाचते बर्फ के क्रिस्टल बन पलना।

बुलबुले से विलीन हो सम्मोहन बर्फ के फूल में खिलना।

जब अपना समय आएगा, बर्फ फिर नीर बन जाएगा।

छोड़ आयी हूँ

छोड़ आयी हूँ उस दरवाज़े तक।

लौट कर आओगे नहीं उस फ़लक

वापस कभी इस जहान तक।

फिर भी हर आहट पर होता है शक।

नज़रें उठ जाती है इस ललक,

शायद लौट आओ, दिल कहता है बहक।

सूनी राहें देख कदम रह जाते हैं ठिठक।

रूह में रह जाती है कसक।

अंतरराष्ट्रीय मानव एकता दिवस! Happy International Human Solidarity Day 20 December

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शुभ अंतरराष्ट्रीय मानव एकता दिवस!

“वसुधैव कुटुम्बकम्” हमारी संस्कृति का चरमबिन्दु।

“समस्त धरती है परिवार” भारत का यह विचार मृदु।

तुम्हें अब आया ख़्याल, विश्व के सब नागरिक है एक!

अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता दिवस मनाना किया शुरू।

हमारे विचारधारा सिखाते और मनाते हैं इसे हर रोज़।

हमारे संस्कार रूपी डएनए में यह है अंकित बन्धु।

यह वाक्य भारतीय संसद कक्ष में है अंकित साधु।

हमारे महा उपनिषद ग्रन्थों में है यह लिपिबद्ध बन्धु।

मानो या ना मानो हम हैं विश्व गुरु!

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

( महोपनिषद्, अध्याय ६, मंत्र ७१)

अर्थ – यह मेरा अपना है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।

English meaning- “Vasudhaiva Kutumbakamis a Sanskrit phrase found in Hindu texts such as the Maha Upanishad, which means “The World Is One Family”. Vedic tradition mentions “Vasudhaiva Kutumbakam” meaning all living beings on the earth are a family.