ठोकर

जीवन में किसी ने जब कभी 

धोखा दिया,

 समझदार बना दिया,

धक्का  दिया ,

तैराक बना दिया।

समय–जमाने की ठोकरें     

जीवन  तराश देती है 

 किसी मूर्तिकार की तरह ।

डोर 

धागा हो   जिंदगी हो  या   जीवन की उलझी डोर 

सुलझाना कभी कभी कठिन हो जाता है .

कभी उलझने  सुलझाने में और उलझ जाती है .

और कभी लगता है डोर हीं ना टूट जाये .

मृत्यु उत्सव  – सती प्रथा

पद्मावत कहें या पदमावती क्या फर्क पड़ता है ?

हम सब शोर कर रहे है सिर्फ

मृत इठिहास और उसके प्रमाणिकता की .

कोई क्यों नहीं सोचता इसके वर्तमान व भविष्य प्रभावों को ?

नारी अग्निदाह उत्सव का पुनर्जन्म तो नहीं है यह?

कुछ दशको पहले तक रूपकंवर की दर्दनाक सती

कथा त्याग कही जा रही थी .

बड़ी कठिनाईयों से हमारी आँखे खुलीं .

कहीं पद्मावती की सती कथा फिर इस आग

को लौ दिखा भड़का ना दे .

तब के जौहर की बात अौर थी।

कहने वाले कहते हैं –

 अब  – वैधव्य के बाद सती होने के

लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाते थे .

चिता अग्नि के चारों ओर सजे मेले…..दर्शकोँ के

भीड़ -कोलाहल में सती की हृदयविदारक करूंण क्रंदन

दव जाती थी

या

क्या दबा  दी जाती थी?

उनकें चिता पलायन प्रयास को पास खड़े कुछ लोग

विफल कर देते थे – लम्बे बाँस के सहारे उसे

लपलपाती अग्नि शिखा में वापस   ढकेल कर

एक जीवित जलती नारी मंदिर की देवी बन जाती .

अगर यह स्वर्ग गमन … पूज्यनीय दैवी पथ है

तब मात्र नारी के लिये हीं क्यों ?

 

स्मिता सहाय के विचारों से प्रेरित.

images courtesy Google.

जिँदगी के रंग – 48

बंद आँखें …. 

कंधे पर ले बोझ ,

जलते अौर चलते जाना जीवन नहीं !!!

दिल की धङकने 

और अपनी अंदर जल रही लौ

का दर्पण,  

खुले  पंख , 

खुशी  अौर दर्द  के साथ  जीना ….

….उङना,

ऊपर उठना सीखा देती है!!!!!

अँधेरा

समय  चक्र चलता रहता है,

अँधेरा …. अौर फिर उजाला….

कहते हैं –

अँधेरे को उजाला हराता है।

पर अक्सर लगता है –

रात के अँधेरे अनोखे….  अद्भुत…… विचार देते हैं।

शायद

मौन अंधेरा आँखों

की ताकत भी दिलो दिमाग में भर देता है।

शायद

स्वयं को देखने अौर आत्म मंथन

के हालात बना नवल -नये विचारों को जगाता है।

परिंदे

इन परिंदों की उङान देख,

चहचहाना सुन ,

रश्क होता है।

कितने आज़ाद हैं……

ना बंधन, ना फिक्र  कि …….

कौन सुनेगा ….क्या कहेगा…….

बस है खुली दुनिया अौर आजाद जिंदगी।

यह बयार

यह बयार गजब ढातीं हैं

कभी बुझती राख की चिंगारी को हवा दे

आग बना देतीं है।

दिल आ जाये तो , खेल-खेल में

जलते रौशन दीप अौ शमा  बुझ देती है

जिंदगी के रंग -47

चाहो जरुर अपने आप को ।

पर इतना भी ना चाहो कि

किसी अौर को चाहने की

जगह हीं ना रहे दिल में।

अौर

चाहो जरुर दूसरों को ।

पर इतना भी ना चाहो कि

खुद को चाहने की जगह ही ना रहे दिल में।

 

कविता की अंतिम तीन   पंक्तियाँ   सआभार ब्लॉगर मित्र  अभय  के सौजन्य से ।

जिंदगी के रंग – 46 Non-perfect Life

गैर मुकम्मल सी  इस जिंदगी में समय अौर हालात तय करते हैं

सब अपने हैं !!

या

कोई अपना नहीं है !!

  word meaning –
गैर मुकम्मल – Non-perfect

जीवन के  उजाले

जीवन के  उजाले में

साथ निभाने वाले कई  मिलते हैं

मज़ा तो तब है

जब  अंधेरे में भी साथ बैठने वाला…..

साथ देने वाला कोई हो।

असल रौशनी तो तब दिखती है।