मौसम अौर लोग

किसी को अपनी आदत बनाना ठीक नहीं,

लोगों को मौसम की तरह बदलते देखा है।

अकेलापन

अकेलापन कभी डराता है, कभी सहलाता है।

कभी ख्वाबों ख़यालों में ले जाता है….

तब

कवितायें- कहानियाँ जन्म लेने लगतीं हैं

नये वजूद- चरित्र, मित्र बन

गले में बाहेँ डाल

अपनी दुनिया में खींच ले जाते हैं !!!!!!

ज़िंदगी के रंग – 53

सूरज ङूबने वाला था,

ना जाने क्यों ठिठका ?

अपनी लालिमा के साथ कुछ पल बिता

पलट कर बोला – अँधेरे से ङरना मत ।

यह रौशनी-अधंकार कालचक्र है।

नया सवेरा लेकर

मैं कल फिर आऊँगा !!!!!

 

 

image by Rekha Sahay

यक़ीन

अब शिकायतें तुम से नही

मुझे खुद से हैं,

माना के सारे झूठ तुम्हारे थे,

लेकिन उन पर यक़ीन तो मेरा था!!

 

 

~~~anonymous

जिंदगी के रंग – 52

अपने अंदर की आग हीं

मोमबत्ती को

जलाती

गलाती और

रूलाती है .

पर जलते हुए यह राह रोशन कर जाती है .

आँसू अश्रु या अश्क

पतझड़ के नग्न होते पेड़ों से

आँसू से गिरते तरु पत्र .

निशा के चाँद के ओस अश्रु

या

उसके नयनों से टपकते अश्कों में …

किस में ज्यादा दर्द छुपा था

पता नहीं .

टूटना और बिछुड़ना तो प्रकृति का नियम है .

इश्क़

कच्ची उम्र के उफानों में बह जाए वो इश्क ही क्या?

झुर्रियों में भी खिलखिलाए वो इश्क कमाल होता है.

Anonymous

जिंदगी के रंग – 50

ज़िंदगी बहती नदी सी लगती है हमेशा.

कभी भँवर सी गोल गहरी घुमाती जिंदगी .

कभी किनारे पर सर पटकती जल लहरों सी.

कभी शांत पर बेहद गहरी जैसे

पैरो के नीचे जमीं ना होने का एहसास हो .

कभी ऊपर…… कभी नीचे…..

कभी छिछली सी जलधार सी लगाती है .

अपनी मुक्त नीलम नीलाभ जल की ख़ुशियों से भरी छलकती छलछलाती .

और फिर मानो बरसात की झड़ी से सब कुछ मलिन मटमैला होता जीवन .

सरल सहज बहती जिंदगी जल प्रपात का कब रूप ले लेती है पता हीं नहीं चलता .

प्रकृति के साथ बंधी हुई ……

सागर तक …..अनंत तक …..ना जाने कब तक?

ऐसे हीं चलती है यह जीवन यात्रा …..यह जिंदगी .

पतझड़ का चाँद

पतझड़ के सूखे पत्तों पर चलता हुआ

चाँद नभ पर उतर आया .

और आंखों में आँखे डाल पूछा –

नींद खो किस सोंच में हो ?

हमने कहा –

सच्चा विश्वास सच्चा साथ होता है क्या ?

हँस पड़ा चाँद –

हाँ मैं हूँ सारी रात तुम्हारे साथ .

सारी कथा व्यथा सुना डालो .

ना जाने कितने राज, अफसाने , दोस्ताने दफन है

सदियोँ से दिल में हमारे .

निभाता आ रहा हूँ .

यह तो आदत है हमारी .

मृत्यु उत्सव  – सती प्रथा

NEWS TOI- Women from the Rajput community on Thursday warned Sanjay Leela Bhansali that he would have to commit Jauhar (self-immolation) if his film ‘Padmaavat’ is released.

पद्मावत कहें या पदमावती क्या फर्क पड़ता है ?

हम सब शोर कर रहे है सिर्फ

मृत इतिहास और उसके प्रमाणिकता की .

कोई क्यों नहीं सोचता इसके वर्तमान व भविष्य प्रभावों को ?

नारी अग्निदाह उत्सव का पुनर्जन्म तो नहीं है यह?

कुछ दशको पहले तक रूपकंवर की दर्दनाक सती

कथा त्याग कही जा रही थी .

बड़ी कठिनाईयों से हमारी आँखे खुलीं .

कहीं पद्मावती की सती कथा फिर इस आग

को लौ दिखा भड़का ना दे .

तब के जौहर की बात अौर थी।

कहने वाले कहते हैं –

अब – वैधव्य के बाद सती होने के

लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाते थे .

चिता अग्नि के चारों ओर सजे मेले…..दर्शकोँ के

भीड़ -कोलाहल में सती की हृदयविदारक करूंण क्रंदन

दव जाती थी

या

क्या दबा दी जाती थी?

उनकें चिता पलायन प्रयास को पास खड़े कुछ लोग

विफल कर देते थे – लम्बे बाँस के सहारे उसे

लपलपाती अग्नि शिखा में वापस ढकेल कर

एक जीवित जलती नारी मंदिर की देवी बन जाती .

अगर यह स्वर्ग गमन का .… पूज्यनीय दैवी पथ है

तब मात्र नारी के लिये हीं क्यों ?

स्मिता सहाय के विचारों से प्रेरित.