जिंदगी के रंग – 52

अपने अंदर की आग हीं

मोमबत्ती को

जलाती

गलाती और

रूलाती है .

पर जलते हुए यह राह रोशन कर जाती है .

आँसू अश्रु या अश्क

पतझड़ के नग्न होते पेड़ों से

आँसू से गिरते तरु पत्र .

निशा के चाँद के ओस अश्रु

या

उसके नयनों से टपकते अश्कों में …

किस में ज्यादा दर्द छुपा था

पता नहीं .

टूटना और बिछुड़ना तो प्रकृति का नियम है .

इश्क़

कच्ची उम्र के उफानों में बह जाए वो इश्क ही क्या?

झुर्रियों में भी खिलखिलाए वो इश्क कमाल होता है.

Anonymous

जिंदगी के रंग – 50

ज़िंदगी बहती नदी सी लगती है हमेशा.

कभी भँवर सी गोल गहरी घुमाती जिंदगी .

कभी किनारे पर सर पटकती जल लहरों सी.

कभी शांत पर बेहद गहरी जैसे

पैरो के नीचे जमीं ना होने का एहसास हो .

कभी ऊपर…… कभी नीचे…..

कभी छिछली सी जलधार सी लगाती है .

अपनी मुक्त नीलम नीलाभ जल की ख़ुशियों से भरी छलकती छलछलाती .

और फिर मानो बरसात की झड़ी से सब कुछ मलिन मटमैला होता जीवन .

सरल सहज बहती जिंदगी जल प्रपात का कब रूप ले लेती है पता हीं नहीं चलता .

प्रकृति के साथ बंधी हुई ……

सागर तक …..अनंत तक …..ना जाने कब तक?

ऐसे हीं चलती है यह जीवन यात्रा …..यह जिंदगी .

पतझड़ का चाँद

पतझड़ के सूखे पत्तों पर चलता हुआ

चाँद नभ पर उतर आया .

और आंखों में आँखे डाल पूछा –

नींद खो किस सोंच में हो ?

हमने कहा –

सच्चा विश्वास सच्चा साथ होता है क्या ?

हँस पड़ा चाँद –

हाँ मैं हूँ सारी रात तुम्हारे साथ .

सारी कथा व्यथा सुना डालो .

ना जाने कितने राज, अफसाने , दोस्ताने दफन है

सदियोँ से दिल में हमारे .

निभाता आ रहा हूँ .

यह तो आदत है हमारी .

मृत्यु उत्सव  – सती प्रथा

NEWS TOI- Women from the Rajput community on Thursday warned Sanjay Leela Bhansali that he would have to commit Jauhar (self-immolation) if his film ‘Padmaavat’ is released.

पद्मावत कहें या पदमावती क्या फर्क पड़ता है ?

हम सब शोर कर रहे है सिर्फ

मृत इतिहास और उसके प्रमाणिकता की .

कोई क्यों नहीं सोचता इसके वर्तमान व भविष्य प्रभावों को ?

नारी अग्निदाह उत्सव का पुनर्जन्म तो नहीं है यह?

कुछ दशको पहले तक रूपकंवर की दर्दनाक सती

कथा त्याग कही जा रही थी .

बड़ी कठिनाईयों से हमारी आँखे खुलीं .

कहीं पद्मावती की सती कथा फिर इस आग

को लौ दिखा भड़का ना दे .

तब के जौहर की बात अौर थी।

कहने वाले कहते हैं –

अब – वैधव्य के बाद सती होने के

लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाते थे .

चिता अग्नि के चारों ओर सजे मेले…..दर्शकोँ के

भीड़ -कोलाहल में सती की हृदयविदारक करूंण क्रंदन

दव जाती थी

या

क्या दबा दी जाती थी?

उनकें चिता पलायन प्रयास को पास खड़े कुछ लोग

विफल कर देते थे – लम्बे बाँस के सहारे उसे

लपलपाती अग्नि शिखा में वापस ढकेल कर

एक जीवित जलती नारी मंदिर की देवी बन जाती .

अगर यह स्वर्ग गमन का .… पूज्यनीय दैवी पथ है

तब मात्र नारी के लिये हीं क्यों ?

स्मिता सहाय के विचारों से प्रेरित.

ठोकर

जीवन में किसी ने जब कभी 

धोखा दिया,

 समझदार बना दिया,

धक्का  दिया ,

तैराक बना दिया।

समय–जमाने की ठोकरें     

जीवन  तराश देती है 

 किसी मूर्तिकार की तरह ।

डोर 

धागा हो   जिंदगी हो  या   जीवन की उलझी डोर 

सुलझाना कभी कभी कठिन हो जाता है .

कभी उलझने  सुलझाने में और उलझ जाती है .

और कभी लगता है डोर हीं ना टूट जाये .

मृत्यु उत्सव  – सती प्रथा

पद्मावत कहें या पदमावती क्या फर्क पड़ता है ?

हम सब शोर कर रहे है सिर्फ

मृत इठिहास और उसके प्रमाणिकता की .

कोई क्यों नहीं सोचता इसके वर्तमान व भविष्य प्रभावों को ?

नारी अग्निदाह उत्सव का पुनर्जन्म तो नहीं है यह?

कुछ दशको पहले तक रूपकंवर की दर्दनाक सती

कथा त्याग कही जा रही थी .

बड़ी कठिनाईयों से हमारी आँखे खुलीं .

कहीं पद्मावती की सती कथा फिर इस आग

को लौ दिखा भड़का ना दे .

तब के जौहर की बात अौर थी।

कहने वाले कहते हैं –

 अब  – वैधव्य के बाद सती होने के

लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाते थे .

चिता अग्नि के चारों ओर सजे मेले…..दर्शकोँ के

भीड़ -कोलाहल में सती की हृदयविदारक करूंण क्रंदन

दव जाती थी

या

क्या दबा  दी जाती थी?

उनकें चिता पलायन प्रयास को पास खड़े कुछ लोग

विफल कर देते थे – लम्बे बाँस के सहारे उसे

लपलपाती अग्नि शिखा में वापस   ढकेल कर

एक जीवित जलती नारी मंदिर की देवी बन जाती .

अगर यह स्वर्ग गमन … पूज्यनीय दैवी पथ है

तब मात्र नारी के लिये हीं क्यों ?

 

स्मिता सहाय के विचारों से प्रेरित.

images courtesy Google.

जिँदगी के रंग – 48

बंद आँखें …. 

कंधे पर ले बोझ ,

जलते अौर चलते जाना जीवन नहीं !!!

दिल की धङकने 

और अपनी अंदर जल रही लौ

का दर्पण,  

खुले  पंख , 

खुशी  अौर दर्द  के साथ  जीना ….

….उङना,

ऊपर उठना सीखा देती है!!!!!