
अपने अंदर की आग हीं
मोमबत्ती को
जलाती
गलाती और
रूलाती है .
पर जलते हुए यह राह रोशन कर जाती है .
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!

अपने अंदर की आग हीं
मोमबत्ती को
जलाती
गलाती और
रूलाती है .
पर जलते हुए यह राह रोशन कर जाती है .

पतझड़ के नग्न होते पेड़ों से
आँसू से गिरते तरु पत्र .
निशा के चाँद के ओस अश्रु
या
उसके नयनों से टपकते अश्कों में …
किस में ज्यादा दर्द छुपा था
पता नहीं .
टूटना और बिछुड़ना तो प्रकृति का नियम है .
कच्ची उम्र के उफानों में बह जाए वो इश्क ही क्या?
झुर्रियों में भी खिलखिलाए वो इश्क कमाल होता है.
Anonymous

ज़िंदगी बहती नदी सी लगती है हमेशा.
कभी भँवर सी गोल गहरी घुमाती जिंदगी .
कभी किनारे पर सर पटकती जल लहरों सी.
कभी शांत पर बेहद गहरी जैसे
पैरो के नीचे जमीं ना होने का एहसास हो .
कभी ऊपर…… कभी नीचे…..
कभी छिछली सी जलधार सी लगाती है .
अपनी मुक्त नीलम नीलाभ जल की ख़ुशियों से भरी छलकती छलछलाती .
और फिर मानो बरसात की झड़ी से सब कुछ मलिन मटमैला होता जीवन .
सरल सहज बहती जिंदगी जल प्रपात का कब रूप ले लेती है पता हीं नहीं चलता .
प्रकृति के साथ बंधी हुई ……
सागर तक …..अनंत तक …..ना जाने कब तक?
ऐसे हीं चलती है यह जीवन यात्रा …..यह जिंदगी .

पतझड़ के सूखे पत्तों पर चलता हुआ
चाँद नभ पर उतर आया .
और आंखों में आँखे डाल पूछा –
नींद खो किस सोंच में हो ?
हमने कहा –
सच्चा विश्वास सच्चा साथ होता है क्या ?
हँस पड़ा चाँद –
हाँ मैं हूँ सारी रात तुम्हारे साथ .
सारी कथा व्यथा सुना डालो .
ना जाने कितने राज, अफसाने , दोस्ताने दफन है
सदियोँ से दिल में हमारे .
निभाता आ रहा हूँ .
यह तो आदत है हमारी .
पद्मावत कहें या पदमावती क्या फर्क पड़ता है ?
हम सब शोर कर रहे है सिर्फ
मृत इतिहास और उसके प्रमाणिकता की .
कोई क्यों नहीं सोचता इसके वर्तमान व भविष्य प्रभावों को ?
नारी अग्निदाह उत्सव का पुनर्जन्म तो नहीं है यह?
कुछ दशको पहले तक रूपकंवर की दर्दनाक सती
कथा त्याग कही जा रही थी .
बड़ी कठिनाईयों से हमारी आँखे खुलीं .
कहीं पद्मावती की सती कथा फिर इस आग
को लौ दिखा भड़का ना दे .
तब के जौहर की बात अौर थी।
कहने वाले कहते हैं –
अब – वैधव्य के बाद सती होने के
लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाते थे .
चिता अग्नि के चारों ओर सजे मेले…..दर्शकोँ के
भीड़ -कोलाहल में सती की हृदयविदारक करूंण क्रंदन
दव जाती थी
या
क्या दबा दी जाती थी?
उनकें चिता पलायन प्रयास को पास खड़े कुछ लोग
विफल कर देते थे – लम्बे बाँस के सहारे उसे
लपलपाती अग्नि शिखा में वापस ढकेल कर
एक जीवित जलती नारी मंदिर की देवी बन जाती .
अगर यह स्वर्ग गमन का .… पूज्यनीय दैवी पथ है
तब मात्र नारी के लिये हीं क्यों ?
स्मिता सहाय के विचारों से प्रेरित.
जीवन में किसी ने जब कभी
धोखा दिया,
समझदार बना दिया,
धक्का दिया ,
तैराक बना दिया।
समय–जमाने की ठोकरें
जीवन तराश देती है
किसी मूर्तिकार की तरह ।
धागा हो जिंदगी हो या जीवन की उलझी डोर
सुलझाना कभी कभी कठिन हो जाता है .
कभी उलझने सुलझाने में और उलझ जाती है .
और कभी लगता है डोर हीं ना टूट जाये .

पद्मावत कहें या पदमावती क्या फर्क पड़ता है ?
हम सब शोर कर रहे है सिर्फ
मृत इठिहास और उसके प्रमाणिकता की .
कोई क्यों नहीं सोचता इसके वर्तमान व भविष्य प्रभावों को ?
नारी अग्निदाह उत्सव का पुनर्जन्म तो नहीं है यह?
कुछ दशको पहले तक रूपकंवर की दर्दनाक सती
कथा त्याग कही जा रही थी .
बड़ी कठिनाईयों से हमारी आँखे खुलीं .
कहीं पद्मावती की सती कथा फिर इस आग
को लौ दिखा भड़का ना दे .
तब के जौहर की बात अौर थी।
कहने वाले कहते हैं –
अब – वैधव्य के बाद सती होने के
लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाते थे .
चिता अग्नि के चारों ओर सजे मेले…..दर्शकोँ के
भीड़ -कोलाहल में सती की हृदयविदारक करूंण क्रंदन
दव जाती थी
या
क्या दबा दी जाती थी?
उनकें चिता पलायन प्रयास को पास खड़े कुछ लोग
विफल कर देते थे – लम्बे बाँस के सहारे उसे
लपलपाती अग्नि शिखा में वापस ढकेल कर
एक जीवित जलती नारी मंदिर की देवी बन जाती .
अगर यह स्वर्ग गमन … पूज्यनीय दैवी पथ है
तब मात्र नारी के लिये हीं क्यों ?
स्मिता सहाय के विचारों से प्रेरित.

images courtesy Google.
बंद आँखें ….
कंधे पर ले बोझ ,
जलते अौर चलते जाना जीवन नहीं !!!
दिल की धङकने
और अपनी अंदर जल रही लौ
का दर्पण,
खुले पंख ,
खुशी अौर दर्द के साथ जीना ….
….उङना,
ऊपर उठना सीखा देती है!!!!!
You must be logged in to post a comment.