उठो द्रौपदी

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो

अब गोविन्द न आयेंगे।

कब तक आस लगाओगी तुम

बिके.. हुए अखबारों से।

कैसी रक्षा मांग रही हो

दु:शासन…. दरबारों से।

स्वंय… जो लज्जाहीन पड़े हैं

वे क्या लाज बचायेंगे।

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो

अब गोविन्द न आयेंगे।Il१॥

कल तक केवल अंधा राजा

अब गूंगा बहरा भी है।

होंठ सिल दिये हैं जनता के

कानों पर पहरा भी है।

तुम्ही कहो ये अश्रु तुम्हारे

किसको क्या समझायेंगे।

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो

अब गोविन्द न आयेंगे।ll२॥

छोड़ो मेंहदी भुजा संम्भालो

खुद ही अपना चीर बचा लो।

द्यूत बिछाये बैठे शकुनि

मस्तक सब बिक जायेंगे।

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो

अब गोविद न आयेंगे। Il३॥

– अटलबिहारी वाजपेयी

ज़िंदगी के रंग- 89

एक टुकड़ा ज़िंदगी का

बानगी है पूरे जीवन के

जद्दोजहद का .

उठते – गिरते, हँसते-रोते

कभी पूरी , कभी स्लाइसों

में कटी ज़िंदगी

जीते हुए कट हीं जाती है .

इसलिए मन की बातें

और अरमानों के

पल भी जी लेने चाहिये.

ताकि अफ़सोस ना रहे

अधूरे हसरतों ….तमन्नाओं …. की.

ज़िंदगी के रंग – 88

ज़िंदगी के दो छोरों

को बाँधने की कोशिश

ना करना.

हमने इस कोशिश में

जाया किया है

सुनहरे पलों को.

और हाथ आया सिफ़र .

यह तो वह बहाव है .

जो अपना रास्ता

ख़ुद ही ढूँढ लेती है .

तमन्ना

तमन्ना हमसे अक्सर पूछती है-

“मैं कब पूरी होऊंगी..?

हम भी हँस कर जवाब दे देते हैं,

जो पूरी हो जाये ..

वो तमन्ना ही क्या..??

Unknown

एहसास

कई बार दिल वह देख लेता हैं

जो आँखें नहीं देख पातीं .

प्यार के एहसास का जादू

कभी ना कभी सभी के दिलो

को छू जाता है.

भले हीं इस प्यार का रंग

सब की नज़र में अलग- अलग हो .

इस भीड़ भरी दुनिया में,

उलझनों , परेशानियों , ख़ुशी-ग़म

रोशनी-अंधेरे में अक्सर

प्यार की रौशनी हीं राह सुझातीं हैं …..

आश्रु भरे नयन

धीरे धीरे , आहिस्ता – आहिस्ता

सारे पल बीत गये,

समय को पकड़ने की

कोशिश मेंरह गईं रिक्त मुट्ठी …..

और कुछ ख़्वाब, यादें और ख़्याल .

विवश कुमहलाया चेहरा

और आश्रु भरे नयन ……

इंद्रधनुष

बरसात की झड़ी

बादलों का गरजना ,

बरसती बूँदों की झड़ी

से प्यार हो जाता हैं ,

जब नीले आसमान में

छिटके इंद्रधनुष की सतरंगी

छँटा खिड़की तक उतर आती हैं.

धनक दिल और धड़कनों को अपने रंग में रंग जाती है.

 

ज़िंदगी के रंग- 87

ज़िंदगी में जंग

और ज़िंदगी से जंग

चलती रहती है.

अगर लड़ाई जारी रखो बिना डरे……

कोई साथ दे या ना दे तब भी ….

जीत मिल ही जाती है.

 

 

ज़िंदगी के रंग – 86

अगर आपने झुकना ना सीखा हैं,

तब खटकोगे कुछ लोगों की नज़रों में.

क्योंकि कुछ लोग

सभी को झुकाना पसंद करते हैं,

झुकना नहीं ,

सही ग़लत की परवाह के बग़ैर .

 

ज़िंदगी के रंग – 85

रिश्ते ईमानदारी से

निभाए जाय तो नियामत हैं ,

वरना बोझ बन जाते हैं.

क्योंकि कोई भी रिश्ता

एक तरफ़ा नहीं निभता हैं.

वैसे ही जैसे ताली

एक हाथ से नहीं बजती .